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क्या ध्यान के माध्यम से कुंडली जागरण किया जा सकता है? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबएक छोटी सी कहानी है रामायण से, की जब भगवान् श्री राम ने माता सीता को लंकापति राक्षस राजा रावण के चंगुल से मुक्त कराया और हंसी-ख़ुशी माता सीता और हनुमान जी के साथ अयोध्या अपने देश लौटकर शाही महल में विश्राम फरमाने लगे | कुछ समय पश्चात भगवान् राम को ज्ञात हुआ की सीता जी को हनुमान जी से कुछ ईर्ष्या हो गयी है क्यूंकि भगवान् राम का ध्यान सीता जी के बनिस्पत हनुमान जी पर ज्यादा रहता था, माता सीता को लगने लगा की श्रीराम, हनुमान जी पर मोहित हो गए हैं | ऐसा सोंचते हुए हर्ष में भरकर श्री राम ने हनुमान जी के शरीर से एक बाल को तोड़ लिया और उस बाल को सीता जी के कान के समीप ले गए | तब माता सीता को उस बाल में से मंत्र सुनाई दिया जो की लगातार गूँज रहा था "राम-राम-राम" तत्पश्चात श्री राम जी ने सीता जी से कहा की यह मैं नहीं जो हनुमान जी की तरफ खिंचा या मोहित हुआ जा रहा हूँ बल्कि यह वह हनुमान जी हैं जो मुझे लगातार अपनी तरफ खींच रहे हैं |तो कुछ ऐसी महिमा है अजपा जप की जिसमें मंत्र सदैव चलता रहता है, अनवरत, निरंतर प्रवाह के साथ, बड़े ही सहज रूप से, चाहे आप जाग रहे हों या सो रहे हों, इसके माध्यम से भगवान् से एक निर्बाध सम्बन्ध स्थापित रहता है इसलिए कहते हैं की मंत्र दोहराते रहो जब तक की अपने दिल में भगवान् को महसूस न करने लगो, यहीं से आपका ईश्वर के प्रति प्रेम, लालसा, जिज्ञासा, एक तड़प पैदा होती है और अन्ततः यह तड़प एक पूर्णता को प्राप्त होती है आपके ईश्वर के मिलने के साथ | तभी कहता हूँ मानसिक जप, अजपा जप की बात ही निराली है और इसको अपने तन-मन में चलाने के लिए हर एक मिनट-सेकंड चेक करते रहिये की राम नाम चल तो रहा है ना, बस फिर क्या कुछ समय बाद यह अजपा-जप स्थिति-प्रग्य अवस्था में सुचारू हो जाएगा |Image from Google !कहा जाता है की हनुमान जी सदा यह सुनिश्चित करने के लिए की उनका अजपा-जप बाधित तो नहीं हो रहा तो वह जम्हाई लेते समय भी राम-राम-राम कहते और चुटकी बजाते जाते थे | आज वर्तमान में जो निष्ठवान और श्रेष्ठ चरित्र ब्राहण हैं वो इस जम्हाई वाली चुटकियों को उपयोग में लाते हैं राम-राम-राम कहते हुए | यह तो रही रामायण की और ध्यान-अजपा-जप जप वाली बात बाकी फिर से मेरा विनम्र आग्रह है, विनती है, प्रार्थना है सभी अनुभवी और विद्वान कोरा लेखकों से की जब भी कोई अच्छा प्रश्न पूंछा जाए तो उसका पर्याप्त निष्ठा से उत्तर दें कृपया नाकि प्रश्नकर्ता को हतोत्साहित करें अपने ज्ञान और विद्वानता के मद में, विषेतः जब कुण्डलिनी, ध्यान, योग, चक्र-साधना, पूजा, पाठ आदि से समबन्धित संदेह मानव मन में घर कर गया हो तो उसका विस्तृत इलाज एक अच्छे उत्तर के रूप में किया जाना तो बनता है न मित्रों |आखिर आप कैसे एक ही पंक्ति का उत्तर देकर चलते बनते हैं जैसे की प्रश्नकर्ता ने कुछ गुनाह कर दिया हो या फिर वह उस जानकारी के लायक ही ना हो क्यूंकि बस एक मैं या आप ही योग्य हैं, लायक हैं, नहीं ना | एक पंक्ति में उत्तर देने का मतलब है या तो आपको प्रश्न के बारे में कुछ पता ही नहीं ? या पता तो बहुत कुछ है लेकिन बताना नहीं चाहते क्यूंकि आपको लगता है की वह जानकारी केवल आपके लिए ही है बस कोई और ना ही जान पाए | उत्तरों को पढ़ने पर मुझे खुद इतना अजीब और अपमानित सा लगा तो जिसने प्रश्न किया उसको कैसा लगा होगा, खैर माफ़ी मांगती हूँ अगर भावनाओं में आकर कुछ गलत लिख दिया हो तो |ऊपर जो लिखा उसके बाद मुख्य टॉपिक पर आती हूँ जो की है ध्यान के द्वारा कुण्डलिनी जागरण किया जा सकता है या नहीं ? देखिये एक बहुत ही बेसिक बात या भ्रान्ति हमारे महान भारत देश में कुण्डलिनी को लेकर यह फ़ैली हुई है कि केवल जो ध्यान, मैडिटेशन, योग करते हैं खासकर कुछ स्थान जैसे कि हिमालय की कन्दराओं, गुफाओं में, या किसी वन, वाटिका, उपवन आदि के नयनाभिरामी आश्रम में, किसी मठ में, मंदिरों में यानी की वो सब स्थान जहाँ हम जैसे आम व्यक्ति को सोंचने में कुछ झिझक होने लगती है और फिर यह मन में अहसास घर कर जाता है की हम लोग इस लायक ही नहीं, नाकाबिल हैं, रोजाना इतने झूंठ बोलते हैं, गलत सोंचते हैं दूसरों का, मन में टनों मैल भरा होता है, पाप कर्मों में फंसे रहने का अहसास तो मतलब ये सब बातें एक आम आदमी को इस सबसे अलग-थलग कर देती हैं और वह बस या तो घर से मंदिर और मंदिर से घर और या फिर घर में ही पूजा अर्चना के जरिये अपने आपको भगवान् से जोड़े हुए रहता है, इस सबसे आगे का सोंचना मतलब की उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात, उसके कर्मों की दीनता का अहसास, केवल पंडे-पुजारी, साधु, महंत, मठाधीश आदि ही यह सब कर सकते हैं, यह अहसास हमे आगे बढ़ने से रोकता है और यहीं से पाखंड और आडंबरों की शुरुआत होती है, हम गुरु ढूंढते हैं और गुरु मिल जाएं तो बात ही क्या, किसी दाढ़ी वाले बाबाजी को देखते हैं तो लगता है की यही वो है जिसको सबका भविष्य, वर्तमान और भूत पता है, यहाँ जब हम इन सबके संपर्क में आते हैं तो कुछ शुरूआती रुझानों के बाद परिणाम आने में देर नहीं लगती और फिर घोर निराशा क्यूंकि गुरु जी कुछ और ही निकले |Image from Google !सबसे पहली बात ये की आज हर छोटे-बड़े शहर की गली-गली में, नुक्कड़ों पर ना जाने कितने ही योगा सेंटर्स, वैलनेस, हीलिंग केंद्र, जिम आदि खुले हुए हैं और इन सभी में रोजाना सुबह-शाम ध्यान ही करवाया जाता बाकी बचे-खुचे अभिलाषी स्त्री और पुरुष अपने घरों पर ही योग और घ्यान करते हैं और करते आ रहे हैं सालों से तो क्या इन सभी का कुंडलिनी जागरण हो चूका है ? सभी बड़ी-बड़ी शक्तियों, सिद्धियों के स्वामी बन गए हैं ? भगवान् के लगातार संपर्क में रहते हैं ? कुछ भी जादू टाइप कर सकते हैं ?कुंडलिनी का मायाजाल कुछ ऐसा ही है की इसको बहुत बड़ा रहस्य बनाकर पेश किया जाता रहा है हालाँकि यह रहस्य वाली बात कुछ हद तक सच है लेकिन उस तरह से नहीं की सामान्य व्यक्ति इसको एक जादुई छड़ी की तरह देखने लगता है | यह बिलकुल भी सही नहीं है |श्रीमद्भागवत गीता में लिखा है की बस भगवान् को स्मरण करते हुए अपने कर्म करते रहो ! अब सोंचिये की भला इससे ज्यादा सरल और क्या है भला ? लेकिन यही आज सबसे कठिन बना दिया गया है, बात ये समझने की है कि सैंकड़ों तरह की पूजा-अर्चना करने के तरीके हैं, ना जाने कितने वेद, ग्रन्थ, काव्य, महाकाव्य, पुराण, शास्त्र, तंत्र, स्तोत्र, मंत्र, साधनायें हैं लेकिन सबका अंतिम उद्देश्य एकमात्र है ईश्वर से जुड़ना, ईश्वर से मिलना तो एक तरह से रास्ते अलग-अलग हैं लेकिन मंजिल सभी की एक ही है, यह केवल आपको चुनना है की आप कैसे जुड़ना चाहते हो भगवान् से ?ध्यान करना अच्छा है, बहुत अच्छा है लेकिन ध्यान-योग-साधना आदि से तो आपको सीधे-सीधे कुण्डलिनी और इसकी सिद्धियों, शक्तियों के भ्रम में डाला हुआ है तो फिर यह तो बिलकुल अलग ही हो गया ना ? भगवान् से जुड़ना है तो सिंपल राम नाम लें, शिवजी का नाम लें, हनुमान जी, गणेश महाराज जी, राधा रानी, सीता मैया, दुर्गा जी, आप एक बार शुरू तो करें !लेकिन ऐसे नहीं जैसे कि आप अभी तक करते हुए आ रहे थे, ऐसे तो बिलकुल भी नहीं ! बस थोड़ा सा तरीका बदलिए और वो तरीका है क्या भला ? तो वह तरीका है अजपा-जप, मानसिक - जप जिसमें जब भी राम जी का नाम लें तो हर कुछ मिनट्स में चेक करें, करते रहे की आप नाम ले रहे हैं या नहीं, अच्छा मैं एक उदाहरण देकर समझाता हूँ एक सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर जब कोडिंग करता है तो लाइन बाई लाइन कोड को चेक करता रहता है की कोड सही तो लिख रहा है ना और उसके बाद उसको कम्पाइल, एक्सीक्यूट करता है बस ऐसे ही राम नाम लेते रहें और चेक करते रहे की राम नाम लिया जा रहा है न, कहीं रुक तो नहीं गया और चूँकि आप हर मिनट्स में चेक कर रहे हैं तो फिर राम नाम लेना रुकेगा नहीं , फिर यह हर सेकण्ड्स में होने लगेगा, आप हर सेकण्ड्स में चेक करने लगेंगे की अरे मैं राम नाम ले रहा हूँ या नहीं !Image From Google !बस फिर क्या यहाँ से आपका ध्यान घटित होने लगेगा मतलब की जब आप हर सेकण्ड्स पर यह चेक करने लगोगे की राम-नाम लिया जा रहा है या नहीं ! तो वह सारा समय जो अभी आप अपने भौतिक कर्मों, भौतिक दिनचर्या के प्रोजेक्ट्स, काम-धन्धे-व्यापार आदि पर से ध्यान हटाकर शिफ्ट कर चुके हो हर उस सेकंड के चेक करने पर और इसको कहा जाता है सिद्दत, इंटेंसिटी, तीव्रता, चाहत, प्रेम, भावना और यहाँ से असली कुण्डलिनी जागरण शुरू होगा क्यूंकि अब शुरुआत हुई है, पहले आप चेक करेंगे, करते रहेंगे, ध्यान शिफ्ट होकर भौतिक से शून्य की तरफ लगेगा तो शून्य आपमें घटित होने लगेगा, आप अब पृथ्वी से थोड़ा ऊपर आ गए हो, गुरुत्वाकर्षण थोड़ा कमजोर होने लगेगा, शून्य यानि की ब्रहांड जब आपमें घटित होगा उसके गुण-धर्म आपमें उतरेंगे तो कथित कुण्डलिनी शक्तियों का एहसास होने लगेगा, शून्य से सूक्ष्म का मिलना होगा, आप बदलने लगोगे, सबकुछ बदल जायेगा जब कुण्डलिनी जागरण होगा संपूर्ण नहीं नहीं पर थोड़ा-थोड़ा ही सही |आपका ध्यान अर्थात एक आम व्यक्ति का ध्यान और एक योग-साधना करने वाले व्यक्ति या योगी के ध्यान में केवल एक अंतर ही है बस की वह योगी डंट कर बैठा हुआ है, हठ में, धूनी रमाकर जैसे कह रहा हो ईश्वर से की ये ले भगवान् मैं बैठ गया हूँ बस तेरे ध्यान में, अब केवल और केवल तू ही है तो आना तो पड़ेगा ही इस योगी से मिलने | और एक आम व्यक्ति अपना काम भी कर रहा है क्यूंकि कर्मयोगी है और साथ में हर एक सेकण्ड्स चेक कर रहा है कि ईश्वर का नाम लिया जा रहा है या नहीं तो यह एक योगी के तुलना में कुछ कठिन है इसलिए मेरी नज़र में हर वो आम इंसान जो अपने भौतिक कर्म करते हुए ध्यान घटित करने पर लगनशील है, ज्यादा सम्माननीय है |बाल वनिता महिला आश्रमहर एक सेकंड चेक करते रहना है | अजपा-जप चलाकर ही दम लेना है | जय श्री राम |धन्यवाद !ॐ नमः शिवाय !

एक छोटी सी कहानी है रामायण से, की जब भगवान् श्री राम ने माता सीता को लंकापति राक्षस राजा रावण के चंगुल से मुक्त कराया और हंसी-ख़ुशी माता सीता और हनुमान जी के साथ अयोध्या अपने देश लौटकर शाही महल में विश्राम फरमाने लगे | कुछ समय पश्चात भगवान् राम को ज्ञात हुआ की सीता जी को हनुमान जी से कुछ ईर्ष्या हो गयी है क्यूंकि भगवान् राम का ध्यान सीता जी के बनिस्पत हनुमान जी पर ज्यादा रहता था, माता सीता को लगने लगा की श्रीराम, हनुमान जी पर मोहित हो गए हैं | ऐसा सोंचते हुए हर्ष में भरकर श्री राम ने हनुमान जी के शरीर से एक बाल को तोड़ लिया और उस बाल को सीता जी के कान के समीप ले गए | तब माता सीता को उस बाल में से मंत्र सुनाई दिया जो की लगातार गूँज रहा था "राम-राम-राम" तत्पश्चात श्री राम जी ने सीता जी से कहा की यह मैं नहीं जो हनुमान जी की तरफ खिंचा या मोहित हुआ जा रहा हूँ बल्कि यह वह हनुमान जी हैं जो मुझे लगातार अपनी तरफ खींच रहे हैं |

तो कुछ ऐसी महिमा है अजपा जप की जिसमें मंत्र सदैव चलता रहता है, अनवरत, निरंतर प्रवाह के साथ, बड़े ही सहज रूप से, चाहे आप जाग रहे हों या सो रहे हों, इसके माध्यम से भगवान् से एक निर्बाध सम्बन्ध स्थापित रहता है इसलिए कहते हैं की मंत्र दोहराते रहो जब तक की अपने दिल में भगवान् को महसूस न करने लगो, यहीं से आपका ईश्वर के प्रति प्रेम, लालसा, जिज्ञासा, एक तड़प पैदा होती है और अन्ततः यह तड़प एक पूर्णता को प्राप्त होती है आपके ईश्वर के मिलने के साथ | तभी कहता हूँ मानसिक जप, अजपा जप की बात ही निराली है और इसको अपने तन-मन में चलाने के लिए हर एक मिनट-सेकंड चेक करते रहिये की राम नाम चल तो रहा है ना, बस फिर क्या कुछ समय बाद यह अजपा-जप स्थिति-प्रग्य अवस्था में सुचारू हो जाएगा |

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कहा जाता है की हनुमान जी सदा यह सुनिश्चित करने के लिए की उनका अजपा-जप बाधित तो नहीं हो रहा तो वह जम्हाई लेते समय भी राम-राम-राम कहते और चुटकी बजाते जाते थे | आज वर्तमान में जो निष्ठवान और श्रेष्ठ चरित्र ब्राहण हैं वो इस जम्हाई वाली चुटकियों को उपयोग में लाते हैं राम-राम-राम कहते हुए | यह तो रही रामायण की और ध्यान-अजपा-जप जप वाली बात बाकी फिर से मेरा विनम्र आग्रह है, विनती है, प्रार्थना है सभी अनुभवी और विद्वान कोरा लेखकों से की जब भी कोई अच्छा प्रश्न पूंछा जाए तो उसका पर्याप्त निष्ठा से उत्तर दें कृपया नाकि प्रश्नकर्ता को हतोत्साहित करें अपने ज्ञान और विद्वानता के मद में, विषेतः जब कुण्डलिनी, ध्यान, योग, चक्र-साधना, पूजा, पाठ आदि से समबन्धित संदेह मानव मन में घर कर गया हो तो उसका विस्तृत इलाज एक अच्छे उत्तर के रूप में किया जाना तो बनता है न मित्रों |

आखिर आप कैसे एक ही पंक्ति का उत्तर देकर चलते बनते हैं जैसे की प्रश्नकर्ता ने कुछ गुनाह कर दिया हो या फिर वह उस जानकारी के लायक ही ना हो क्यूंकि बस एक मैं या आप ही योग्य हैं, लायक हैं, नहीं ना | एक पंक्ति में उत्तर देने का मतलब है या तो आपको प्रश्न के बारे में कुछ पता ही नहीं ? या पता तो बहुत कुछ है लेकिन बताना नहीं चाहते क्यूंकि आपको लगता है की वह जानकारी केवल आपके लिए ही है बस कोई और ना ही जान पाए | उत्तरों को पढ़ने पर मुझे खुद इतना अजीब और अपमानित सा लगा तो जिसने प्रश्न किया उसको कैसा लगा होगा, खैर माफ़ी मांगती हूँ अगर भावनाओं में आकर कुछ गलत लिख दिया हो तो |

ऊपर जो लिखा उसके बाद मुख्य टॉपिक पर आती हूँ जो की है ध्यान के द्वारा कुण्डलिनी जागरण किया जा सकता है या नहीं ? देखिये एक बहुत ही बेसिक बात या भ्रान्ति हमारे महान भारत देश में कुण्डलिनी को लेकर यह फ़ैली हुई है कि केवल जो ध्यान, मैडिटेशन, योग करते हैं खासकर कुछ स्थान जैसे कि हिमालय की कन्दराओं, गुफाओं में, या किसी वन, वाटिका, उपवन आदि के नयनाभिरामी आश्रम में, किसी मठ में, मंदिरों में यानी की वो सब स्थान जहाँ हम जैसे आम व्यक्ति को सोंचने में कुछ झिझक होने लगती है और फिर यह मन में अहसास घर कर जाता है की हम लोग इस लायक ही नहीं, नाकाबिल हैं, रोजाना इतने झूंठ बोलते हैं, गलत सोंचते हैं दूसरों का, मन में टनों मैल भरा होता है, पाप कर्मों में फंसे रहने का अहसास तो मतलब ये सब बातें एक आम आदमी को इस सबसे अलग-थलग कर देती हैं और वह बस या तो घर से मंदिर और मंदिर से घर और या फिर घर में ही पूजा अर्चना के जरिये अपने आपको भगवान् से जोड़े हुए रहता है, इस सबसे आगे का सोंचना मतलब की उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात, उसके कर्मों की दीनता का अहसास, केवल पंडे-पुजारी, साधु, महंत, मठाधीश आदि ही यह सब कर सकते हैं, यह अहसास हमे आगे बढ़ने से रोकता है और यहीं से पाखंड और आडंबरों की शुरुआत होती है, हम गुरु ढूंढते हैं और गुरु मिल जाएं तो बात ही क्या, किसी दाढ़ी वाले बाबाजी को देखते हैं तो लगता है की यही वो है जिसको सबका भविष्य, वर्तमान और भूत पता है, यहाँ जब हम इन सबके संपर्क में आते हैं तो कुछ शुरूआती रुझानों के बाद परिणाम आने में देर नहीं लगती और फिर घोर निराशा क्यूंकि गुरु जी कुछ और ही निकले |

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सबसे पहली बात ये की आज हर छोटे-बड़े शहर की गली-गली में, नुक्कड़ों पर ना जाने कितने ही योगा सेंटर्स, वैलनेस, हीलिंग केंद्र, जिम आदि खुले हुए हैं और इन सभी में रोजाना सुबह-शाम ध्यान ही करवाया जाता बाकी बचे-खुचे अभिलाषी स्त्री और पुरुष अपने घरों पर ही योग और घ्यान करते हैं और करते आ रहे हैं सालों से तो क्या इन सभी का कुंडलिनी जागरण हो चूका है ? सभी बड़ी-बड़ी शक्तियों, सिद्धियों के स्वामी बन गए हैं ? भगवान् के लगातार संपर्क में रहते हैं ? कुछ भी जादू टाइप कर सकते हैं ?

कुंडलिनी का मायाजाल कुछ ऐसा ही है की इसको बहुत बड़ा रहस्य बनाकर पेश किया जाता रहा है हालाँकि यह रहस्य वाली बात कुछ हद तक सच है लेकिन उस तरह से नहीं की सामान्य व्यक्ति इसको एक जादुई छड़ी की तरह देखने लगता है | यह बिलकुल भी सही नहीं है |

श्रीमद्भागवत गीता में लिखा है की बस भगवान् को स्मरण करते हुए अपने कर्म करते रहो ! अब सोंचिये की भला इससे ज्यादा सरल और क्या है भला ? लेकिन यही आज सबसे कठिन बना दिया गया है, बात ये समझने की है कि सैंकड़ों तरह की पूजा-अर्चना करने के तरीके हैं, ना जाने कितने वेद, ग्रन्थ, काव्य, महाकाव्य, पुराण, शास्त्र, तंत्र, स्तोत्र, मंत्र, साधनायें हैं लेकिन सबका अंतिम उद्देश्य एकमात्र है ईश्वर से जुड़ना, ईश्वर से मिलना तो एक तरह से रास्ते अलग-अलग हैं लेकिन मंजिल सभी की एक ही है, यह केवल आपको चुनना है की आप कैसे जुड़ना चाहते हो भगवान् से ?

ध्यान करना अच्छा है, बहुत अच्छा है लेकिन ध्यान-योग-साधना आदि से तो आपको सीधे-सीधे कुण्डलिनी और इसकी सिद्धियों, शक्तियों के भ्रम में डाला हुआ है तो फिर यह तो बिलकुल अलग ही हो गया ना ? भगवान् से जुड़ना है तो सिंपल राम नाम लें, शिवजी का नाम लें, हनुमान जी, गणेश महाराज जी, राधा रानी, सीता मैया, दुर्गा जी, आप एक बार शुरू तो करें !

लेकिन ऐसे नहीं जैसे कि आप अभी तक करते हुए आ रहे थे, ऐसे तो बिलकुल भी नहीं ! बस थोड़ा सा तरीका बदलिए और वो तरीका है क्या भला ? तो वह तरीका है अजपा-जप, मानसिक - जप जिसमें जब भी राम जी का नाम लें तो हर कुछ मिनट्स में चेक करें, करते रहे की आप नाम ले रहे हैं या नहीं, अच्छा मैं एक उदाहरण देकर समझाता हूँ एक सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर जब कोडिंग करता है तो लाइन बाई लाइन कोड को चेक करता रहता है की कोड सही तो लिख रहा है ना और उसके बाद उसको कम्पाइल, एक्सीक्यूट करता है बस ऐसे ही राम नाम लेते रहें और चेक करते रहे की राम नाम लिया जा रहा है न, कहीं रुक तो नहीं गया और चूँकि आप हर मिनट्स में चेक कर रहे हैं तो फिर राम नाम लेना रुकेगा नहीं , फिर यह हर सेकण्ड्स में होने लगेगा, आप हर सेकण्ड्स में चेक करने लगेंगे की अरे मैं राम नाम ले रहा हूँ या नहीं !

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बस फिर क्या यहाँ से आपका ध्यान घटित होने लगेगा मतलब की जब आप हर सेकण्ड्स पर यह चेक करने लगोगे की राम-नाम लिया जा रहा है या नहीं ! तो वह सारा समय जो अभी आप अपने भौतिक कर्मों, भौतिक दिनचर्या के प्रोजेक्ट्स, काम-धन्धे-व्यापार आदि पर से ध्यान हटाकर शिफ्ट कर चुके हो हर उस सेकंड के चेक करने पर और इसको कहा जाता है सिद्दत, इंटेंसिटी, तीव्रता, चाहत, प्रेम, भावना और यहाँ से असली कुण्डलिनी जागरण शुरू होगा क्यूंकि अब शुरुआत हुई है, पहले आप चेक करेंगे, करते रहेंगे, ध्यान शिफ्ट होकर भौतिक से शून्य की तरफ लगेगा तो शून्य आपमें घटित होने लगेगा, आप अब पृथ्वी से थोड़ा ऊपर आ गए हो, गुरुत्वाकर्षण थोड़ा कमजोर होने लगेगा, शून्य यानि की ब्रहांड जब आपमें घटित होगा उसके गुण-धर्म आपमें उतरेंगे तो कथित कुण्डलिनी शक्तियों का एहसास होने लगेगा, शून्य से सूक्ष्म का मिलना होगा, आप बदलने लगोगे, सबकुछ बदल जायेगा जब कुण्डलिनी जागरण होगा संपूर्ण नहीं नहीं पर थोड़ा-थोड़ा ही सही |

आपका ध्यान अर्थात एक आम व्यक्ति का ध्यान और एक योग-साधना करने वाले व्यक्ति या योगी के ध्यान में केवल एक अंतर ही है बस की वह योगी डंट कर बैठा हुआ है, हठ में, धूनी रमाकर जैसे कह रहा हो ईश्वर से की ये ले भगवान् मैं बैठ गया हूँ बस तेरे ध्यान में, अब केवल और केवल तू ही है तो आना तो पड़ेगा ही इस योगी से मिलने | और एक आम व्यक्ति अपना काम भी कर रहा है क्यूंकि कर्मयोगी है और साथ में हर एक सेकण्ड्स चेक कर रहा है कि ईश्वर का नाम लिया जा रहा है या नहीं तो यह एक योगी के तुलना में कुछ कठिन है इसलिए मेरी नज़र में हर वो आम इंसान जो अपने भौतिक कर्म करते हुए ध्यान घटित करने पर लगनशील है, ज्यादा सम्माननीय है |

बाल वनिता महिला आश्रम

हर एक सेकंड चेक करते रहना है | अजपा-जप चलाकर ही दम लेना है | जय श्री राम |

धन्यवाद !
ॐ नमः शिवाय !

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उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

राम राम जी

जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही क्यों तोड़ दिया था? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//          🌹🌹🙏🙏🌹🌹 वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने राम सेतु का निर्माण रावण के वध हेतु लंका जाने के लिए करवाया था। समुद्र पर बने इस पुल का निर्माण वानरों, रीछ और नल नील भाइयों की निगरानी में हुआ था। नल नील विश्वकर्मा के पुत्र थे और उस समय के महान वास्तुविद माने जाते थे। बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि रामसेतु को भगवान श्री राम ने स्वयं तोड़ा था। पद्म पुराण के सृष्टि खंड में इसकी कथा विस्तारपूर्वक मिलती है। पदम पुराण के मुताबिक जब श्री राम रावण का वध करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो गया था, तब एक दिन उनके मन में विभीषण से मिलने का विचार आया। उन्होंने सोचा कि रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं! ऐसा विचार मन में आने के बाद जब श्री राम लंका जाने की सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्री राम ने उन्हे...