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एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए। भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया। नारद जी जब वापस गए तो विष्णुजी ने कहा, हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे, उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो।By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबभगवान विष्णु जब यह बात कह रहे थे तब नारद जी बाहर ही खड़े थे। उन्होंने सब सुन लिया और वापस आकर भगवार विष्णु से पुछा कि भगवान जब मैं आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया लेकिन मेरे जाने के बाद आपने लक्ष्मी जी से मेरे बैठे हुए स्थान को गोबर से लीपने की वाली बात क्यों कही?भगवान ने कहा, हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है। इधर, आपके जाने के बाद मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है, आप निगुरे हैं। जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गंदा हो जाता है।यह सुनकर नारद जी ने कहा, भगवान आपकी बात सत्य है पर में गुरु किसे बनाऊं? नारायण बोले, नारद आप धरती पर चले जाओ और जो सबसे पहला व्यक्ति मिले उसे अपना गुरु मान लेना।नारद जी ने भगवान को प्रणाम किया और चले गए। इसके बाद नारद जी जब धरती पर पहुंचे तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला मछुवारा मिला। नारद जी वापस नारायण के पास चले गए और उन्हें सारी बात बताई। उनकी बात सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करें। चाहे वह कोई भी हो, आपको अपना गुरु उस मछुआरे को ही बनाना पड़ेगा। नारद जी दोबारा से धरती पर पहुंचे और उस मछुवारे से कहा गुरु बनने का अनुरोध किया। पहले तो मछुवारा नहीं माना, हालांकि बाद में काफी मनाने पर वह मान गया। मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापस भगवान विष्णु के पास गए और कहा कि भगवान मेरे गुरु जी को तो कुछ भी नहीं आता, वे मुझे क्या सिखाएंगे? गुरु की निंदा सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने नारद जी को श्राप दे दिया कि उन्हें आपको 84 लाख योनियों में घूमना पड़ेगा।यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा, हे भगवान इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिए। भगवान नारायण ने कहा कि इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो। नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई और उसका उपाय जाना। नारद जी के गुरु बने उस मछुआरे ने कहा कि आप भगवान से कहना कि वे धरती पर 84 लाख योनियों की तस्वीरें बना दें और आप उसपर लेटकर गोल घूम लेना। उसके बाद जाकर भगवान विष्णु जी से कहना कि आपने उनका दिया श्राप पूरा किया अब वे आपको माफ करें। साथ ही वचन भी देना कि आगे से आप कभी भी गुरु की निंदा नहीं करोगे।नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया। भगवान ने नारद जी के अनुसार 84 लाख योनियों की तस्वीर धरती पर बना दी। नारद जी उनपर घूम लिए और अपने गुरु के कहे अनुसार भगवान से क्षमा भी मांगते हुए गुरु की निंदा न करने का वचन भी दिया। यह सुनकर विष्णु जी ने कहा कि देखा जिस गुरु की आप निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से आपको बचाने का रास्ता सुझाया। नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है।BAL Vnita mahila ashramगुरु गूंगे, गुरु बाबरे, गुरु के रहिये दासगुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस।।गुरु चाहे गूंगा हो, चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु का हमेशा दास रहना चाहिए। गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा। माना जाता है कि यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा स्वयं गुरु भी नहीं कर सकते।🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏भवसागर से पार होने के लिये मनुष्य शरीर रूपी सुन्दर नौका मिल गई है। सतर्क रहो कहीं ऐसा न हो कि वासना की भँवर में पड़कर नौका डूब जाय।🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼स्वयं कमाओ, स्वयं खाओ यह प्रकृति है । (रजो गुण)दूसरा कमाए, तुम छीन कर खाओ यह विकृती है।(तमो गुण )स्वयं कमाओ सबको खिलाओ, यह देविक संस्कृति हैं ! (सतो गुण )** देविक प्रवृतियों को धारण (Perception ) करे तभी आप देवलोक पाने के अधिकारी बनेंगे **,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,🚩🙏🙏🚩हमेशा ध्यान में रखिये ---" आप एक शुद्ध चेतना है यानि स्व ऊर्जा से प्रकाशित आत्मा ! माया (अज्ञान ) ने आपकी आत्मा के शुद्ध स्वरुप को छीन रखा है ! अतः माया ( अज्ञान ) से पीछा छुडाइये और शुद्ध चेतना को प्राप्त कर परमानन्द का सुख भोगिए !विशेष,,,, आपके अज्ञान को दूर कर अग्निहोत्र के इस ग्यान के प्रकाश को दे पाऊ /फेला पाऊ, यही मेरा स्वप्न है. यह आचरण मेरी निष्काम /निःस्वार्थ सोच का परिणाम है l प्रभु मेरी सहायता करे / मेरा मार्ग प्रशस्त करे.मुख्य संचालक Vnita Kasnia punjabजिस प्रकार एक छोटे से बीज़ में विशाल वट वृक्ष समाया होता है उसी प्रकार आप में अनंत क्षमताएं समायी हुईं हैं l आवश्यकता है उस ज्ञान की / अपना बौधिक एवं शैक्षणिक स्तर को उन्नत करने की जिसे प्राप्त कर आप महानता प्राप्त कर सके !🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏Note ; कृपया पोस्ट के साथ ही #BAL Vnita mahila ashram का page भी लाइक करें और इहलोक में श्रेष्ठतम पुण्यो का संचय करने के लिए अति उत्तम ज्ञान प्राप्त करे ! देवलोक अग्निहोत्र सदैव आपको नेक एवं श्रेष्ठ कर्मों को करने के लिए प्रेरित करते रहेंगे ताकि अति उत्तम पुण्य कमाए और परलोक में इच्छानुसार लोक प्राप्त करे. जय माता गौ गंगा गायत्री.प्रकृति का संरक्षण एवं संवर्धन ईश्वर की श्रेष्ठ आराधना है !एक पेड़ लगाना, सौ गायों का दान देने के समान है lपीपल का पेड़ लगाने से व्यक्ति को सेंकड़ों यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है lछान्दोग्यउपनिषद् में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है-'दशकूप समावापी: दशवापी समोहृद:।दशहृद सम:पुत्रो दशपत्र समोद्रुम:।। 'इस्लामी शिक्षा में पेड़ लगाने और वातावरण को हराभरा रखने पर जोर दिया गया है। पेड़ लगाने को सदका अथवा पुण्य का काम कहा गया है। पेड़ को पानी देना किसी मोमिन को पानी पिलाने के समान बताया गया है।इस्लाम में दान,,,,,,,दान देकर तुम्हें खुश होना चाहिये क्योंकि मुसीबत दान की दीवार कभी नहीं फांदती है l हजरत मोहम्मदजय गौ गंगा गायत्री त्रिमाता की 🙏🏼🙏🏼

एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए। भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया। नारद जी जब वापस गए तो विष्णुजी ने कहा, हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे, उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो।
By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब

भगवान विष्णु जब यह बात कह रहे थे तब नारद जी बाहर ही खड़े थे। उन्होंने सब सुन लिया और वापस आकर भगवार विष्णु से पुछा कि भगवान जब मैं आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया लेकिन मेरे जाने के बाद आपने लक्ष्मी जी से मेरे बैठे हुए स्थान को गोबर से लीपने की वाली बात क्यों कही?

भगवान ने कहा, हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है। इधर, आपके जाने के बाद मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है, आप निगुरे हैं। जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गंदा हो जाता है।
यह सुनकर नारद जी ने कहा, भगवान आपकी बात सत्य है पर में गुरु किसे बनाऊं? नारायण बोले, नारद आप धरती पर चले जाओ और जो सबसे पहला व्यक्ति मिले उसे अपना गुरु मान लेना।

नारद जी ने भगवान को प्रणाम किया और चले गए। इसके बाद नारद जी जब धरती पर पहुंचे तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला मछुवारा मिला। नारद जी वापस नारायण के पास चले गए और उन्हें सारी बात बताई। उनकी बात सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करें। चाहे वह कोई भी हो, आपको अपना गुरु उस मछुआरे को ही बनाना पड़ेगा।

  नारद जी दोबारा से धरती पर पहुंचे और उस मछुवारे से कहा गुरु बनने का अनुरोध किया। पहले तो मछुवारा नहीं माना, हालांकि बाद में काफी मनाने पर वह मान गया। मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापस भगवान विष्णु के पास गए और कहा कि भगवान मेरे गुरु जी को तो कुछ भी नहीं आता, वे मुझे क्या सिखाएंगे? गुरु की निंदा सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने नारद जी को श्राप दे दिया कि उन्हें आपको 84 लाख योनियों में घूमना पड़ेगा।

यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा, हे भगवान इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिए। भगवान नारायण ने कहा कि इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो। नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई और उसका उपाय जाना। नारद जी के गुरु बने उस मछुआरे ने कहा कि आप भगवान से कहना कि वे धरती पर 84 लाख योनियों की तस्वीरें बना दें और आप उसपर लेटकर गोल घूम लेना। उसके बाद जाकर भगवान विष्णु जी से कहना कि आपने उनका दिया श्राप पूरा किया अब वे आपको माफ करें। साथ ही वचन भी देना कि आगे से आप कभी भी गुरु की निंदा नहीं करोगे।

नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया। भगवान ने नारद जी के अनुसार 84 लाख योनियों की तस्वीर धरती पर बना दी। नारद जी उनपर घूम लिए और अपने गुरु के कहे अनुसार भगवान से क्षमा भी मांगते हुए गुरु की निंदा न करने का वचन भी दिया। यह सुनकर विष्णु जी ने कहा कि देखा जिस गुरु की आप निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से आपको बचाने का रास्ता सुझाया। नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है।
गुरु गूंगे, गुरु बाबरे, गुरु के रहिये दास
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस।।

गुरु चाहे गूंगा हो, चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु का हमेशा दास रहना चाहिए। गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा। माना जाता है कि यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा स्वयं गुरु भी नहीं कर सकते।
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भवसागर से पार होने के लिये मनुष्य शरीर रूपी सुन्दर नौका मिल गई है। सतर्क रहो कहीं ऐसा न हो कि वासना की भँवर में पड़कर नौका डूब जाय।
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स्वयं कमाओ, स्वयं खाओ यह प्रकृति है । (रजो गुण)
दूसरा कमाए, तुम छीन कर खाओ यह विकृती है।(तमो गुण )
स्वयं कमाओ सबको खिलाओ, यह देविक संस्कृति हैं ! (सतो गुण )
** देविक प्रवृतियों को धारण (Perception ) करे तभी आप देवलोक पाने के अधिकारी बनेंगे **
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हमेशा ध्यान में रखिये ---
" आप एक शुद्ध चेतना है यानि स्व ऊर्जा से प्रकाशित आत्मा ! माया (अज्ञान ) ने आपकी आत्मा के शुद्ध स्वरुप को छीन रखा है ! अतः माया ( अज्ञान ) से पीछा छुडाइये और शुद्ध चेतना को प्राप्त कर परमानन्द का सुख भोगिए !
विशेष,,,, आपके अज्ञान को दूर कर अग्निहोत्र के इस ग्यान के प्रकाश को दे पाऊ /फेला पाऊ, यही मेरा स्वप्न है. यह आचरण मेरी निष्काम /निःस्वार्थ सोच का परिणाम है l प्रभु मेरी सहायता करे / मेरा मार्ग प्रशस्त करे.
मुख्य संचालक Vnita Kasnia punjab
जिस प्रकार एक छोटे से बीज़ में विशाल वट वृक्ष समाया होता है उसी प्रकार आप में अनंत क्षमताएं समायी हुईं हैं l आवश्यकता है उस ज्ञान की / अपना बौधिक एवं शैक्षणिक स्तर को उन्नत करने की जिसे प्राप्त कर आप महानता प्राप्त कर सके !
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Note ; कृपया पोस्ट के साथ ही #BAL Vnita mahila ashram का page भी लाइक करें और इहलोक में श्रेष्ठतम पुण्यो का संचय करने के लिए अति उत्तम ज्ञान प्राप्त करे ! देवलोक अग्निहोत्र सदैव आपको नेक एवं श्रेष्ठ कर्मों को करने के लिए प्रेरित करते रहेंगे ताकि अति उत्तम पुण्य कमाए और परलोक में इच्छानुसार लोक प्राप्त करे. जय माता गौ गंगा गायत्री.
प्रकृति का संरक्षण एवं संवर्धन ईश्वर की श्रेष्ठ आराधना है !एक पेड़ लगाना, सौ गायों का दान देने के समान है lपीपल का पेड़ लगाने से व्यक्ति को सेंकड़ों यज्ञ करने के बराबर पुण्य प्राप्त होता है l
छान्दोग्यउपनिषद् में उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है-
'दशकूप समावापी: दशवापी समोहृद:।
दशहृद सम:पुत्रो दशपत्र समोद्रुम:।। '
इस्लामी शिक्षा में पेड़ लगाने और वातावरण को हराभरा रखने पर जोर दिया गया है। पेड़ लगाने को सदका अथवा पुण्य का काम कहा गया है। पेड़ को पानी देना किसी मोमिन को पानी पिलाने के समान बताया गया है।
इस्लाम में दान,,,,,,,
दान देकर तुम्हें खुश होना चाहिये क्योंकि मुसीबत दान की दीवार कभी नहीं फांदती है l हजरत मोहम्मद
जय गौ गंगा गायत्री त्रिमाता की 🙏🏼🙏🏼

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राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By वनिता कासनियां पंजाब श्रीगणेश के अवतारहम सबने भगवान विष्णु के दशावतार और भगवान शंकर के १९ अवतारों के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे "अष्टरूप" कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं।वक्रतुंड: मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड वाले "वक्रतुंड" अवतार लिया और मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

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*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

राम राम जी

जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही क्यों तोड़ दिया था? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//          🌹🌹🙏🙏🌹🌹 वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने राम सेतु का निर्माण रावण के वध हेतु लंका जाने के लिए करवाया था। समुद्र पर बने इस पुल का निर्माण वानरों, रीछ और नल नील भाइयों की निगरानी में हुआ था। नल नील विश्वकर्मा के पुत्र थे और उस समय के महान वास्तुविद माने जाते थे। बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि रामसेतु को भगवान श्री राम ने स्वयं तोड़ा था। पद्म पुराण के सृष्टि खंड में इसकी कथा विस्तारपूर्वक मिलती है। पदम पुराण के मुताबिक जब श्री राम रावण का वध करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो गया था, तब एक दिन उनके मन में विभीषण से मिलने का विचार आया। उन्होंने सोचा कि रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं! ऐसा विचार मन में आने के बाद जब श्री राम लंका जाने की सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्री राम ने उन्हे...