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Effect of Antardasha of Navagrahas in Rahu Mahadashabest effort By Social Activist Vnita Kasniya Punjab All the 9 planets have a very important role on the horoscope of all of us. auspicious of planets

💥💥राहु महादशा में नवग्रहों की अंतर्दशा का प्रभाव 💥💥

💥💥 संपूर्ण कोशिश 💥💥

💥💥हम सभी की कुंडली पर सभी 9 ग्रहों की बहुत ही अहम भूमिका होती है। ग्रहों की शुभ और अशुभ दशा का हमारी कुंडली पर शुभ और अशुभ प्रभाव पड़ता है। इस वजह से हमारे जीवन में अच्‍छे और बुरे दौर आते रहते हैं। आज हम बात करने जा रहे हैं राहु के बारे में। किभी भी व्‍यक्ति की कुंडली में राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है। राहु की महादशा के साथ सभी नौ ग्रहों की अंतर्दशा बारी-बारी से आती है और इनका हमारे जीवन पर अलग-अलग तरह का प्रभाव पड़ता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि राहु की महादशा में नवग्रहों की अंतर्दशा के क्‍या प्रभाव होते हैं💥💥

💥💥राहु की महादशा में राहु की अंतर्दशा का काल 2 वर्ष 8 माह और 12 दिन का होता है। राहु की अंतर्दशा होने पर व्‍यक्ति को समाज में अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ता है। माना जाता है कि राहु के अशुभ प्रभाव की वजह से व्‍यक्ति को सर्पदंश या फिर कोई दुर्घटना का सामना करना पड़ सकता है तो जल से जुड़ी हो💥💥

(1)बृहस्‍पति💥💥 राहु की महादशा में बृहस्‍पति की अंतर्दशा होने पर यह अवधि दो वर्ष चार माह और 24 दिन की होती है। राक्षस प्रवृत्ति के माने जाने वाले ग्रह राहु के साथ बृहस्‍पति की दशा का मेल होने पर अच्‍छे संयोग बनते हैं और राहु की दशा का प्रभाव कम हो जाता है। जातक के मन में अच्‍छे विचारों की उत्‍पत्ति होती है। गुरु की शुभ दशा होने पर उसे करियर में लाभ होता है और धार्मिक कार्यों में भी मन लगता है। कुंडली में गुरु की अंतर्दशा होने पर व्‍यक्ति💥💥 

(2)शनि💥💥 राहु की महादशा में शनि की अंतर्दशा की अवधि 2 वर्ष 10 माह और 6 दिन की होती है। ऐसा होने पर परिवार में कलह होने लगती है और पति-पत्‍नी के संबंधों में कड़वाहट पैदा होने लगती है। करियर के मामले में भी जातकों को नुकसान होने लगता है। पैसा आपके हाथ से पानी की तरह बहने लगता है। चोट और दुर्घटना होने की आशंका बढ़ जाती है। व्‍यक्ति को वात रोग घेरने लगते हैं और पेट से संबंधित बीमारियां घेरने लगती हैं💥💥

(3)बुध💥💥 राहु के महादशा होने पर बुध की अंतर्दशा की अवधि 2 वर्ष 3 माह और 6 दिन की होती है। राहु के साथ बुध की मौजूदगी आपको शुभ फल देने वाली मानी जाती है। निसंतान लोगों की झोली भी भर जाती है और मित्रों की ओर से अच्‍छे सहयोग की प्राप्ति होती है। आपको करियर के मामले में अच्‍छे परिणाम प्राप्‍त होते हैं। व्‍यापार में लाभ होता है और मान सम्‍मान की प्राप्ति होती है💥💥

(4)केतु 💥💥 राहु की महादशा होने पर केतु की अंतर्दशा एक वर्ष और 18 दिन की होती है और य‍ह कतई शुभ फल नहीं देती है। इस अवधि में जातकों को सिर से जुड़े रोग होने की आशंका रहती है और शत्रुओं के कारण नुकसान हो सकता है। इस अवधि में जातक को शस्‍त्रों और अग्नि से नुकसान हो सकता है, इसलिए इन दोनों से ही दूर रहने में भलाई है। रिश्‍तेदारों और मित्रों के कारण भी परेशानी हो सकती है। 

(5) शुक्र💥💥 राहु की महादशा में शुक्र की दशा पूरे 3 वर्ष चलती है। इस अवधि में दांपत्‍य सुख की प्राप्ति होती है। आपको वाहन और भूमि का भी सुख प्राप्‍त हो सकता है। पति और पत्‍नी के बीच संबंध अच्‍छे रहेंगे। यदि शुक्र और राहु शुभ नहीं हैं तो शीत संबंधित रोग आपको परेशान कर सकते हैं। 

(6) सूर्य💥💥 राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा की अवधि 10 माह और 24 दिन की होती है। जो कि बाकी ग्रहों की अंतर्दशा की अवधि से सबसे कम होती है। इस अवधि को शुभ नहीं माना जाता है। इस अवधि में लोगों को आंख के रोग और विष से संबंधित दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है।

(7) चंद्र💥💥 राहु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा एक साल 6 महीने की अवधि की होती है। इस अवधि में जातक को तमाम प्रकार के कष्‍ट होते हैं। इस वक्‍त में जातक की साथी से अनबन तक हो सकती है और कई बार तो तलाक की नौबत भी आ सकती है। धन का नाश होता है और संतान को कष्‍ट होता है। शीत जनित रोग शरीर को अक्‍सर परेशान करते हैं। उपाय के तौर पर आपको सफेद वस्‍तुओं का दान करना चाहिए। प्रत्‍येक सोमवार को भगवान शिव का दूध से अभिषेक करें💥💥   

(8) मंगल💥💥 राहु के साथ में मंगल की अंतर्दशा 1 साल 18 दिन की होती है। इस अवधि में जातक को शारीरिक चोट और गंभीर रोग परेशान कर सकते हैं। करियर के मामले में भी यह दशा अच्‍छी नहीं मानी जाती है। इस अवधि में आपका स्‍थान परिवर्तन भी हो सकता है। आपके परिवार में कोई अशुभ समाचार आ सकता है। उपाय के तौर पर आपको हर मंगलवार को लाल वस्‍तुओं का दान करना चाहिए और जरूरतमंद बच्‍चों को खाने की चीजें देनी चाहिए💥💥

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जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

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