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मंगलवार विशेष,अष्ट सिद्धि के दाता हनुमानजी!!!!!!!!#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान 🙏🙏❤️हनुमानजी जन्मजात महान सिद्ध योगी हैं । उनके पिता केसरी ने हनुमानजी को प्राणायाम या प्राण-विद्या की साधना गर्भ में ही करा दी थी; जिस तरह अभिमन्यु को गर्भ में ही चक्रव्यूह-भेदन का ज्ञान हो गया था । हनुमानजी का चरित्र उस योगी का है जिसने प्राणशक्ति को वशीभूत करके मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है । तभी तो पैदा होते ही वे भयंकर भूख से पीड़ित होकर उगते हुए सूर्य को फल समझ कर उसे खाने के लिए आकाश में उछल कर सूर्यमण्डल तक पहुंच गए थे । ऐसी सामर्थ्य किसी महान योगी में ही हो सकती है ।श्रीराम-वल्लभा सीताजी ने हनुमानजी की भक्ति-भावना से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया—‘मारुतिनंदन ! अष्ट सिद्धियां तुम्हारे करतलगत हो जाएं और तुम जहां कहीं भी रहोगे, वहीं मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण भोग (निधियां) तुन्हारे पास उपस्थित हो जाएंगे ।’अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता ।अस वर दीन्ह जानकी माता ।।अणिमा, महिमा आदि सभी सिद्धियां अपने उत्कृष्ट रूप में हनुमानजी में व्याप्त हैं; इसीलिए हनुमानजी अपने सच्चे उपासक को इन सिद्धियों से समृद्ध कर देते हैं ।अमरकोश में अष्ट सिद्धियां इस प्रकार बतायी गयी हैं—अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा ।प्राप्ति: प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्टसिद्धय:।।अर्थात्—(1) अणिमा (2) महिमा (3) गरिमा (4) लघिमा (5) प्राप्ति (6) प्राकाम्य (7) ईशित्व और (8) वशित्व—ये अष्ट सिद्धियां हैं । हनुमानजी का जीवन केवल ‘राम काज’ के लिए है; जानते हैं कि हनुमानजी ने राम काज के लिए इन सिद्धियों का कैसे प्रयोग किया ? (1) अणिमा—इस सिद्धि से शरीर को अणु जितना छोटा बनाया जा सकता है । सीताजी का पता लगाने के लिए लंका जाते समय सुरसा के विशाल शरीर और मुख को देखकर हनुमानजी ने अत्यन्त लघु रुप धारण कर लिया । लंका में प्रवेश करते समय हनुमानजी ने मशक के समान अति लघुरूप धारण किया–मसक समान रूप कपि धरी ।लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ।। (मानस ५।४।१)अशोक वाटिका में सीताजी के समक्ष प्रकट होते समय हनुमानजी के रूप का ‘श्रीरंगनाथ रामायण’ में इस प्रकार वर्णन किया गया है–‘हनुमानजी अंगुष्ठमात्र का आकार ग्रहण कर उस अशोक वृक्ष पर चढ़ गए । बालक के रूप में वटवृक्ष के पत्रों में शयन करने वाले भगवान विष्णु के समान वे श्रेष्ठ वानर उस वृक्ष की घनी शाखाओं में बड़ी कुशलता के साथ छिपकर बैठ गए और उन विशालाक्षी सीताजी को बार-बार ध्यान से देखने लगे ।’(2) महिमा—इस सिद्धि से देह को चाहे जितना बड़ा या भारी बनाया जा सकता है । जब समुद्र पार करते समय सुरसा हनुमानजी को निगलने चली तो वे सौ योजन आकार वाले हो गए । हनुमानजी ने इसी सिद्धि से समुद्र लांघते समय अपने शरीर को पर्वताकार बनाया था—जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा ।तासु दून कपि रूप देखावा ।। (मानस ५।१।५)हनुमानजी सीताजी से कहते हैं—‘वानर-सेनाओं के साथ आकर श्रीराम लंका को क्षण भर में भस्म कर देंगें ।’तब सीताजी कहती हैं—‘तुम तो अत्यंत लघु शरीर वाले हो, अन्य भालू-वानर भी तुम्हारी तरह लघुकाय ही होंगे, फिर वे ऐसे विशाल शरीर वाले राक्षसों से कैसे लड़ेंगे ?’ उस समय हनुमानजी ने स्वर्ण-शैल के समान विशाल रूप धारण कर अपनी शक्ति का परिचय दिया—कनक भूधराकार सरीरा ।समर भयंकर अतिबल बीरा ।। (मानस ५।१५।४)(3) गरिमा—एक बार हनुमानजी गंधमादन पर्वत पर अपनी पूंछ फैलाकर लेटे हुए थे । उसी समय अपने बल के गर्व में चूर भीमसेन वहां आए । हनुमानजी ने उनसे कहा—‘बुढ़ापे के कारण मैं स्वयं उठने में असमर्थ हूँ, कृपया तुम मेरी इस पूंछ को हटाकर आगे बढ़ जाओ । भीमसेन हंसते हुए बायें हाथ से हनुमानजी की पूंछ हटाने लगे पर वह टस-से-मस नहीं हुई । भीमसेन हनुमानजी का विन्ध्य पर्वत के समान अत्यन्त भयंकर और अद्भुत शरीर देखकर घबरा गए और लज्जा से मुख नीचा कर कपिराज से क्षमा मांगने लगे । यहां हनुमानजी की गरिमा सिद्धि परिलक्षित होती है ।(4) लघिमा—इस सिद्धि के बल से शरीर को रुई से भी हलका और हवा में तैरने लायक बनाया जा सकता है । लंका-दहन के समय हनुमानजी का आकार तो अत्यंत विशाल था पर वे इतने हल्के थे कि वे शीघ्र ही राक्षसों के एक घर से दूसरे घर तक पहुंच जाते थे—देह बिसाल परम हरुआई ।मंदिर ते मंदिर चढ़ धाई ।। (मानस ५।२५।१)(5) प्राप्ति—इस सिद्धि से साधक को मनोवांछित पदार्थ की प्राप्ति हो जाती है । यद्यपि सीताजी की खोज के लिए अनेकों भालू व वानर चारों दिशाओं में भेजे गए; परन्तु हनुमानजी को ही लंका में पहुंचने के बाद अल्प समय में ही सीताजी का दर्शन हुआ ।(6) प्राकाम्य—प्राकाम्य नामक सिद्धि में इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर लेना और कहीं भी पहुंच जाना संभव होता है ।▪️किष्किन्धा के लिए प्रस्थान करते समय सीताजी से चूड़ामणि लेने से पहले उनका विश्वास प्राप्त करने के लिए हनुमानजी ने अपना विश्वरूप दिखाया जो विन्ध्याचल के समान विशाल दीख पड़ता था ।▪️श्रीरामचरितमानस के अनुसार किष्किन्धा में श्रीराम से मिलने हनुमानजी विप्र-वेष धारण करके गए थे–‘विप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ ।’▪️हनुमानजी ने विप्ररूप धारण कर ही विभीषण से भेंट की थी–बिप्र रूप धरि बचन सुनाए ।सुनत बिभीषण उठि तहँ आए ।। (मानस ५।५।३)▪️अध्यात्म रामायण के अनुसार हनुमानजी नन्दि ग्राम में भरतजी को भगवान श्रीराम के आगमन का संदेश सुनाने मनुष्य-शरीर धारणकर गए थे ।(7) ईशिता—माया और उसको कार्यों को इच्छानुसार संचालित करना ईशिता नाम की सिद्धि है । हनुमानजी प्रभु श्रीराम की वानर और भालुओं की सेना के अद्वितीय सेनानायक थे और साथ ही परम भक्त भी थे । वे देव, दानव और मानव आदि समस्त प्राणियों के लिए अजेय थे । जब मेघनाद ने हनुमानजी पर ब्रह्माजी द्वारा दिया गया अस्त्र चलाया, तब उस ब्रह्मास्त्र की महिमा रखने के लिए वे स्वयं उसमें बंध गए थे ।(8) वशिता—इस सिद्धि से कर्मों और विषय-भोगों में आसक्त न होने की सामर्थ्य प्राप्त होती है । हनुमानजी अखण्ड ब्रह्मचारी और पूर्ण जितेन्द्रिय थे । रावण के अंत:पुर में अस्त-व्यस्त अवस्था में सोई हुई स्त्रियों को देखने के बाद हनुमानजी के ये वचन उनके इन्द्रियजय ( जितेन्द्रियत्व) #सिद्धि को दर्शाते हैं—‘‘माता सीता स्त्रियों में ही मिलेंगी, इसी भावना से मैंने रावण के अंत:पुर में प्रवेश किया था । मैं तो माता जानकी को ढूंढ़ रहा था, किसी नारी के सौन्दर्य पर तो मेरी दृष्टि नहीं गई और ना ही मेरे मन में कोई विकार आया । ये जो स्त्रियों के अर्धनग्न देह मुझे देखने पड़े, ये तो मेरी दृष्टि में शव के समान ही थे, फिर मेरा अखण्ड ब्रह्मचर्य का व्रत कैसे भंग हो सकता है ?’#गोस्वामी #तुलसीदासजी ने #हनुमान #चालीसा में कहा है—जो यह पढ़े हनुमान चालीसा ।होय सिद्ध साखी #गौरीसा ।।अर्थात्—हनुमान चालीसा के नित्य पढ़ने मात्र से #हनुमानजी भक्त को समस्त #सिद्धियां प्रदान कर देते हैं । ऐसा मैं भगवान शिव का साक्षी देकर कहती हूँ ।

मंगलवार विशेष,अष्ट सिद्धि के दाता हनुमानजी!!!!!!!!

#बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान 🙏🙏❤️

हनुमानजी जन्मजात महान सिद्ध योगी हैं । उनके पिता केसरी ने हनुमानजी को प्राणायाम या प्राण-विद्या की साधना गर्भ में ही करा दी थी; जिस तरह अभिमन्यु को गर्भ में ही चक्रव्यूह-भेदन का ज्ञान हो गया था ।

 हनुमानजी का चरित्र उस योगी का है जिसने प्राणशक्ति को वशीभूत करके मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है । तभी तो पैदा होते ही वे भयंकर भूख से पीड़ित होकर उगते हुए सूर्य को फल समझ कर उसे खाने के लिए आकाश में उछल कर सूर्यमण्डल तक पहुंच गए थे । ऐसी सामर्थ्य किसी महान योगी में ही हो सकती है ।

श्रीराम-वल्लभा सीताजी ने हनुमानजी की भक्ति-भावना से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया—
‘मारुतिनंदन ! अष्ट सिद्धियां तुम्हारे करतलगत हो जाएं और तुम जहां कहीं भी रहोगे, वहीं मेरी आज्ञा से सम्पूर्ण भोग (निधियां) तुन्हारे पास उपस्थित हो जाएंगे ।’

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता ।
अस वर दीन्ह जानकी माता ।।
अणिमा, महिमा आदि सभी सिद्धियां अपने उत्कृष्ट रूप में हनुमानजी में व्याप्त हैं; इसीलिए हनुमानजी अपने सच्चे उपासक को इन सिद्धियों से समृद्ध कर देते हैं ।

अमरकोश में अष्ट सिद्धियां इस प्रकार बतायी गयी हैं—
अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा ।
प्राप्ति: प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्टसिद्धय:।।
अर्थात्—(1) अणिमा (2) महिमा (3) गरिमा (4) लघिमा (5) प्राप्ति (6) प्राकाम्य (7) ईशित्व और (8) वशित्व—ये अष्ट सिद्धियां हैं । 
हनुमानजी का जीवन केवल ‘राम काज’ के लिए है; जानते हैं कि हनुमानजी ने राम काज के लिए इन सिद्धियों का कैसे प्रयोग किया ? 

(1) अणिमा—इस सिद्धि से शरीर को अणु जितना छोटा बनाया जा सकता है । सीताजी का पता लगाने के लिए लंका जाते समय सुरसा के विशाल शरीर और मुख को देखकर हनुमानजी ने अत्यन्त लघु रुप धारण कर लिया । लंका में प्रवेश करते समय हनुमानजी ने मशक के समान अति लघुरूप धारण किया–
मसक समान रूप कपि धरी ।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ।। (मानस ५।४।१)

अशोक वाटिका में सीताजी के समक्ष प्रकट होते समय हनुमानजी के रूप का ‘श्रीरंगनाथ रामायण’ में इस प्रकार वर्णन किया गया है–
‘हनुमानजी अंगुष्ठमात्र का आकार ग्रहण कर उस अशोक वृक्ष पर चढ़ गए । बालक के रूप में वटवृक्ष के पत्रों में शयन करने वाले भगवान विष्णु के समान वे श्रेष्ठ वानर उस वृक्ष की घनी शाखाओं में बड़ी कुशलता के साथ छिपकर बैठ गए और उन विशालाक्षी सीताजी को बार-बार ध्यान से देखने लगे ।’

(2) महिमा—इस सिद्धि से देह को चाहे जितना बड़ा या भारी बनाया जा सकता है । जब समुद्र पार करते समय सुरसा हनुमानजी को निगलने चली तो वे सौ योजन आकार वाले हो गए । हनुमानजी ने इसी सिद्धि से समुद्र लांघते समय अपने शरीर को पर्वताकार बनाया था—
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा ।
तासु दून कपि रूप देखावा ।। (मानस ५।१।५)
हनुमानजी सीताजी से कहते हैं—‘वानर-सेनाओं के साथ आकर श्रीराम लंका को क्षण भर में भस्म कर देंगें ।’

तब सीताजी कहती हैं—‘तुम तो अत्यंत लघु शरीर वाले हो, अन्य भालू-वानर भी तुम्हारी तरह लघुकाय ही होंगे, फिर वे ऐसे विशाल शरीर वाले राक्षसों से कैसे लड़ेंगे ?’ उस समय हनुमानजी ने स्वर्ण-शैल के समान विशाल रूप धारण कर अपनी शक्ति का परिचय दिया—
कनक भूधराकार सरीरा ।

समर भयंकर अतिबल बीरा ।। (मानस ५।१५।४)

(3) गरिमा—एक बार हनुमानजी गंधमादन पर्वत पर अपनी पूंछ फैलाकर लेटे हुए थे । उसी समय अपने बल के गर्व में चूर भीमसेन वहां आए । हनुमानजी ने उनसे कहा—‘बुढ़ापे के कारण मैं स्वयं उठने में असमर्थ हूँ, कृपया तुम मेरी इस पूंछ को हटाकर आगे बढ़ जाओ । भीमसेन हंसते हुए बायें हाथ से हनुमानजी की पूंछ हटाने लगे पर वह टस-से-मस नहीं हुई । भीमसेन हनुमानजी का विन्ध्य पर्वत के समान अत्यन्त भयंकर और अद्भुत शरीर देखकर घबरा गए और लज्जा से मुख नीचा कर कपिराज से क्षमा मांगने लगे । यहां हनुमानजी की गरिमा सिद्धि परिलक्षित होती है ।

(4) लघिमा—इस सिद्धि के बल से शरीर को रुई से भी हलका और हवा में तैरने लायक बनाया जा सकता है । लंका-दहन के समय हनुमानजी का आकार तो अत्यंत विशाल था पर वे इतने हल्के थे कि वे शीघ्र ही राक्षसों के एक घर से दूसरे घर तक पहुंच जाते थे—
देह बिसाल परम हरुआई ।

मंदिर ते मंदिर चढ़ धाई ।। (मानस ५।२५।१)

(5) प्राप्ति—इस सिद्धि से साधक को मनोवांछित पदार्थ की प्राप्ति हो जाती है । यद्यपि सीताजी की खोज के लिए अनेकों भालू व वानर चारों दिशाओं में भेजे गए; परन्तु हनुमानजी को ही लंका में पहुंचने के बाद अल्प समय में ही सीताजी का दर्शन हुआ ।
(6) प्राकाम्य—प्राकाम्य नामक सिद्धि में इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर लेना और कहीं भी पहुंच जाना संभव होता है ।

▪️किष्किन्धा के लिए प्रस्थान करते समय सीताजी से चूड़ामणि लेने से पहले उनका विश्वास प्राप्त करने के लिए हनुमानजी ने अपना विश्वरूप दिखाया जो विन्ध्याचल के समान विशाल दीख पड़ता था ।

▪️श्रीरामचरितमानस के अनुसार किष्किन्धा में श्रीराम से मिलने हनुमानजी विप्र-वेष धारण करके गए थे–‘विप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ ।’

▪️हनुमानजी ने विप्ररूप धारण कर ही विभीषण से भेंट की थी–
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए ।
सुनत बिभीषण उठि तहँ आए ।। (मानस ५।५।३)

▪️अध्यात्म रामायण के अनुसार हनुमानजी नन्दि ग्राम में भरतजी को भगवान श्रीराम के आगमन का संदेश सुनाने मनुष्य-शरीर धारणकर गए थे ।

(7) ईशिता—माया और उसको कार्यों को इच्छानुसार संचालित करना ईशिता नाम की सिद्धि है । हनुमानजी प्रभु श्रीराम की वानर और भालुओं की सेना के अद्वितीय सेनानायक थे और साथ ही परम भक्त भी थे । वे देव, दानव और मानव आदि समस्त प्राणियों के लिए अजेय थे । जब मेघनाद ने हनुमानजी पर ब्रह्माजी द्वारा दिया गया अस्त्र चलाया, तब उस ब्रह्मास्त्र की महिमा रखने के लिए वे स्वयं उसमें बंध गए थे ।

(8) वशिता—इस सिद्धि से कर्मों और विषय-भोगों में आसक्त न होने की सामर्थ्य प्राप्त होती है । हनुमानजी अखण्ड ब्रह्मचारी और पूर्ण जितेन्द्रिय थे । रावण के अंत:पुर में अस्त-व्यस्त अवस्था में सोई हुई स्त्रियों को देखने के बाद हनुमानजी के ये वचन उनके इन्द्रियजय ( जितेन्द्रियत्व) #सिद्धि को दर्शाते हैं—
‘‘माता सीता स्त्रियों में ही मिलेंगी, इसी भावना से मैंने रावण के अंत:पुर में प्रवेश किया था । मैं तो माता जानकी को ढूंढ़ रहा था, किसी नारी के सौन्दर्य पर तो मेरी दृष्टि नहीं गई और ना ही मेरे मन में कोई विकार आया । ये जो स्त्रियों के अर्धनग्न देह मुझे देखने पड़े, ये तो मेरी दृष्टि में शव के समान ही थे, फिर मेरा अखण्ड ब्रह्मचर्य का व्रत कैसे भंग हो सकता है ?’
#गोस्वामी #तुलसीदासजी ने #हनुमान #चालीसा में कहा है—
जो यह पढ़े हनुमान चालीसा ।
होय सिद्ध साखी #गौरीसा ।।

अर्थात्—हनुमान चालीसा के नित्य पढ़ने मात्र से #हनुमानजी भक्त को समस्त #सिद्धियां प्रदान कर देते हैं । ऐसा मैं भगवान शिव का साक्षी देकर कहती हूँ ।

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, #भक्त_और_भगवान की सुंदर लीला। by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब संत की खीर श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधाकुंड गोवर्धन मे रहकर नित्य भजन करते थे। नित्य प्रभु को १००० दंडवत प्रणाम, २००० वैष्णवों को दंडवत प्रणाम और १ लाख हरिनाम करने का नियम था। भिक्षा मे केवल एक बार एक दोना छांछ (मठा) ब्रजवासियों के यहां से मांगकर पाते। एक दिन बाबा श्री राधा कृष्ण की मानसी सेवा कर रहे थे और उन्होंने ठाकुर जी से पूछा कि प्यारे आज क्या भोग लगाने की इच्छा है ? ठाकुर जी ने कहां बाबा ! आज खीर पाने की इच्छा है, बढ़िया खीर बना। बाबा ने बढ़िया दूध औटाकर मेवा डालकर रबड़ी जैसी खीर बनाई। ठाकुर जी खीर पाकर बड़े प्रसन्न हुए और कहा.. .बाबा ! हमे तो लगता था कि तू केवल छांछ पीने वाला बाबा है, तू कहां खीर बनाना जानता होगा ? परंतु तुझे तो बहुत सुंदर खीर बनानी आती है। .इतनी अच्छी खीर तो हमने आज तक नही पायी, बाबा ! तू थोड़ी खीर पीकर तो देख। .बाबा बोले, हमको तो छांछ पीकर भजन करने की आदत है और आँत ऐसी हो गयी कि इतना गरिष्ट भोजन अब पचेगा नही, आप ही पीओ।.ठाकुर जी बोले, बाबा ! अब हमारी इतनी भी बात नही मानेगा क्या? .बातों बातों में ठाकुर जी ने खीर का कटोरा बाबा के मुख से लगा दिया। .भगवान के प्रेमाग्रह के कारण और उनके अधरों से लगने के कारण वह खीर अत्यंत स्वादिष्ट लगी और बाबा थोड़ी अधिक खीर खा गए। .मानसी सेवा समाप्त होने पर ठाकुर जी तो चले गए गौ चराने और बाबा पड़ गए ज्वर (बुखार) से बीमार। .ब्रजवासियों मे हल्ला मच गया कि हमारा बाबा तो बीमार हो गया है। .बात जब जातिपुरा (श्रीनाथ मंदिर) मे श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने वैद्य से कहाँ की जाकर श्री रघुनाथ दास जी का उपचार करो, वे हमारे ब्रज के महान रसिक संत है। .वैद्य जी ने बाबा की नाड़ी देख कर बताया कि बाबा ने तो खीर खायी है।.ब्रजवासी वैद्य से कहने लगे, २० वर्षो से तो नित्य हम बाबा को देखते आ रहे है, ये बाबा तो ब्रजवासियों के घरों से एक दोना छांछ पीकर भजन करता है। .बाबा कही आता जाता तो है नही, खीर खाने काहाँ चला गया? .ब्रजवासी वैद्य से लड़ने लगे और कहने लगे कि तुम कैसे वैद्य हो, तुम्हें तो कुछ नही आता है।.वैद्य जी बोले, मै अभी एक औषधि देता हूं जिससे वमन हो जाएगा (उल्टी होगी) और पेट मे जो भी है वह बाहर आएगा। .यदि खीर नही निकली तो मैं अपने आयुर्वेद के सारे ग्रंथ यमुना जी मे प्रवाहित करके उपचार करना छोड़ दूंगा। .ब्रजवासी बोले, ठीक है औषधि का प्रयोग करो। बाबा ने जैसे ही औषधि खायी वैसे वमन हो गया और खीर बाहर निकली। .ब्रजवासी पूछने लगे, बाबा ! तूने खीर कब खायी? बाबा तू तो छांछ के अतिरिक्त कुछ पाता नही है, खीर कहां से पायी?.रघुनाथ दास जी कुछ बोले नही क्योंकि वे अपनी उपासना को प्रकट नही करना चाहते थे अतः उन्होंने इस रहस्य को गुप्त रहने दिया और मौन रहे। .आस पास के जो ब्रजवासी वहां आए थे वो घर चले गए परंतु उनमे बाबा के प्रति विश्वास कम हो गया....सब तरफ बात फैलने लगी कि बाबा तो छुपकर खीर खाता होगा। .श्रीनाथ जी ने श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी को सारी बात बतायी और कहां की आप जाकर ब्रजवासियों के मन की शंका को दूर करो – कहीं ब्रजवासियों द्वारा संत अपराध ना हो जाए। .श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी ने ब्रजवासियों से कहां की श्री रघुनाथ दास जी परमसिद्ध संत है। .वे तो दीनता की मूर्ति है, बाबा अपने भजन को गुप्त रखना चाहते है अतः वे कुछ बोलेंगे नही। .उन्होंने जो खीर खायी वो इस बाह्य जगत में नही, वह तो मानसी सेवा के भावराज्य में ठाकुर जी ने स्वयं उन्हें खिलायी है।.धन्य है ऐसे महान संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी🙌👏🌺🌺जय जय श्री राधे श्याम 🌺🌺 श्री राधा रानी 🌹🌷राधे राधे 🌷मेरी विनती यही है राधा रानी, कृपा बरसाए रखनामुझे तेरा ही सहारा महारानी, चरणों से लिपटाए रखनामेरी विनती यही है राधा रानी, कृपा बरसाए रखना🌹श्री राधा स्तुतितपत-कांचन गौरांगी राधे वृन्दावनेश्वरी वृषभानु सुते देवी प्रणमामि हरी प्रिये🌹🌹हरेकृष्ण 🌷🙏🌷

काउंसलिंग के दौरान अक्सर प्रेमिकाएं/पत्नियां एक बात कहती पाई जातीं हैं किBy Vnita kasnia Punjab ?‘उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। मैंने उसे इतना प्यार किया,उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’गौतम बुद्ध ने तब गृह त्याग किया जब उनकी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु की मां थी।राम ने सीता का त्याग तब किया जब सीता गर्भवती थी।सीता की अग्निपरीक्षा के कारण राम आज भी कटघरे में खड़े किए जाते हैं।कुंती ने जब सूर्य से कहा कि ‘आपके प्रेम का प्रताप मेरे गर्भ में पल रहा है’ तो सूर्य बादलों में छुप गए।कर्ण भी अपने पिता से सवाल पूछने के बजाय कुंती से ही पूछते हैं- ‘आपने मुझे जन्म देते ही गंगा में प्रवाहित कर दिया, फिर कैसी माता?’यह नहीं सोचा कि अगर उनके महान पिता सूर्य देवता उन्हें अपना नाम देते तो कोई भी कुंती कर्ण को कभी खुद से अलग नहीं करती।[1]महिलाएं कई बार शादी से पहले मां बन जाती हैं क्योंकि उनके विवाहित प्रेमी उन्हें झांसा देते हैं कि कुछ ही दिनों में उनका तलाक होने वाला है।ऐसे सवाल जब-जब उठते हैं,सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या वाकई स्त्री की स्वायत्तता और अस्मिता तब तक निर्धारित नहीं होती जब तक उसे पुरुष का संरक्षण न मिले?शकुंतला की कहानी सबको मालूम है। राजा दुष्यंत ने उसे जंगल में देखा और उससे प्रेम विवाह किया। फिर शकुंतला गर्भवती हुई। इस बीच दुष्यंत राजधानी लौट गए।जब शकुंतला उनसे मिलने पहुंची तो राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। कथा यह है कि ऐसा ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण हुआ।जो भी हो शकुंतला को परित्यक्ता की तरह रहना पड़ा।यही हाल सीता का भी हुआ। एक आम नागरिक के कहने पर राम ने लोकापवाद का हवाला देकर अपनी गर्भवती पत्नी सीता को वनवास दे दिया,जबकि इससे पहले वे उनकी अग्निपरीक्षा ले चुके थे।काफी समय बाद सीता ने अकेले दम पर पाले गए अपने पुत्रों को उनके पिता को सौंप दिया और स्वयं धरती में समा गईं।शकुंतलापुत्र भरत जब शेर के मुंह में हाथ डालकर उसके दांत गिन रहा था,तो दुष्यंत को लगा कि जरूर यह किसी राजवंश का उत्तराधिकारी है।उन्होंने भी शकुंतला से अपने पुत्र को यह कहकर ले लिया कि यह तो मेरा बेटा है, इसलिए राजमहल में रहेगा।शकुंतला ने पुत्र को तो सौंप दिया लेकिन उनके साथ स्वयं नहीं गई।यह एक स्वाभिमानी स्त्री का आत्मसम्मान था। वह उस पति को क्यों स्वीकार करे,जिसने उसे तब छोड़ दिया,जब उसे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी?और बुद्ध तो सत्य, ज्ञान और शांति की खोज में निकले थे।क्या वे नहीं जानते थे कि अकेली औरतों की समाज में क्या दशा होती है?आज भी सवाल सिर्फ औरतों से पूछे जाते हैं। अकेली यशोधरा ने कैसे पाला होगा अपने बेटे राहुल को?[2]एक बच्चे को पालने में मां और बाप दोनों की भूमिका होती है।अगर बच्चे का बाप नहीं है तो कोई बात नहीं,लेकिन अगर है तो वह अनाथ की तरह क्यों जिए?एक बार यशोधरा बुद्ध के आश्रम में गईं और उनसे सवाल किया, ‘आप तो बुद्धत्व प्राप्ति के लिए निकल पड़े। मेरा क्या? मेरे बारे में सोचा?’ कहते हैं,बुद्ध के पास कोई उत्तर नहीं था,सिवाय मौन के। [3]खैर,राम और बुद्ध बहुत बड़े प्रयोजन के लिए धरा पर अवतरित हुए थे।उनकी जीवनसंगिनियों को अपने पतियों का लम्बे समय तक का सान्निध्य नसीब होना विधि के विधान में ही नहीं था।तत्कालीन समाज स्त्रियों की इस सहनशक्ति को शक्ति का पर्याय मानकर पूजता था।'लाज और शर्म स्त्री का गहना होता है',कहकर उसी को परिवार और समाज से सामंजस्य करना सिखाया जाता था।पुरुष को जीवन की दूसरी चुनौतियो से जूझने में नारियों के अधिकारों और इच्छाओं के सम्बन्ध में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती थीऔर तो और जो स्त्रियाँ दबे स्वर में भी अपनी इच्छाएं व्यक्त करने का साहस कर लेतीं थीं उनको उनके परिवार की ही वरिष्ठ नारियाँ 'निर्लज्ज' की संज्ञा दे डालतीं थीं।यह उन स्त्रियों का प्रारब्ध कह लें या जीवन की विडम्बना।आज की स्थिति बदल रही है,हालांकि पूरी तरह बदली नहीं है।आज की नारी को पहले जैसी भीषण स्थिति से उबारने के लिए कानून,आर्थिक निर्भरता और समाज का सहारा मिल रहा है।प्राचीन समय में नारी न्याय के लिए अपने परिवार के सहयोग की राह तकती थी।उस समय सीता,यशोधरा और शकुन्तला की सहना ही नियति थी,आज के समय में जो प्रासंगिक नहीं रह गई है।आखिर नारी भी तो इंसान है।अब सीता को अपना राम खुद बनना है,यशोधरा को अपना बुद्धत्व स्वयं पाना है और शकुन्तला भी दुष्यन्त के निमन्त्रण की कृपा की मोहताज नहीं है।अब अन्याय किसी भी सूरत में सहनीय नहीं होना चाहिए।नारी को अपने शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक मूल्यों को सहेजते हुए अब उसे "जियो और जीने दो" के सिद्धान्त पर चलना है।नारी का पुरूष प्रतियोगी नहीं सहयोगी है।इतिहास में नारी पर हुए अन्याय का बदला नारीवाद का झंडा लेकर नारी द्वारा पुरुष का मानासिक शोषण करते हुए समाज का रूप विकृत करके नहीं मिलेगा,अपितु उसकी सुख-दुख में सहचरी बनकर मिलेगा।नारी को यदि सम्मान पाना है तो समाज और परिवार के सदस्यों का सम्मान करके ही मिलेगा।नारी हो या पुरूष,उसको समझना चाहिए कि कर्त्तव्यों के वृक्ष पर ही अधिकारों के फल लगते हैं।तब स्त्रियों के सम्बन्ध में राम और बुद्ध भले ही मौन रह गए हों,परन्तु अब पुरुष को नारी की इच्छाओं और आवश्यकताओं का सम्मान करना चाहिए….…जिससे नारी भी अपने नारीसुलभ कोमल गुणों से घर परिवार व समाज को सुन्दर रूप देने में स्वाभाविक ही आगे आए।"सम्मान दो,सम्मान लो।" दोनों पर यह बात लागू होनी चाहिए।जोर जबरदस्ती और उपदेश से ज्यादा प्रेमपूर्ण उदाहरण हमेशा बेहतर परिणाम देते हैं।अस्वीकरण : मेरा उद्देश्य इस उत्तर में युग पुरूषों और अवतारों राम और बुद्ध का तिरस्कार करना नहीं है अपितु विधि के विधान के कारण जो परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई,उसके कारण जनमानस में उनके विरूद्ध जो रोष उत्पन्न होता है,उसको कम करना है।उन नारियों का स्वाभिमान अपनी जगह सही था और उन युग पुरूषों ने चूंकि मानवता का कल्याण करना था,उसके कारण उनकी पत्नियों को उनसे अलग होना पड़ा जबकि वे दोनों उनसे अत्यधिक प्रेम करते थे।राम और बुद्ध का उदाहरण गृहस्थ धर्म के लिए लेना कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है।आंशिक स्त्रोत:Google Image Result for https://assets.saatchiart.com/saatchi/955709/art/5601091/4670901-SHHNIBPT-6.jpgस्त्री के लिए क्यों मौन रह गए बुद्ध और राम?फुटनोट[1] http://.काउंसलिंग के दौरान अक्सर प्रेमिकाएं/पत्नियां एक बात कहती पाई जातीं हैं कि ‘उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। मैंने उसे इतना प्यार किया,उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’ पति या प्रेमी कब भगोड़े नहीं थे? गौतम बुद्ध तब भागे जब उनकी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु की मां थी। राम ने सीता का त्याग तब किया जब सीता गर्भवती थी। कुंती ने जब सूर्य से कहा कि ‘आपके प्रेम का प्रताप मेरे गर्भ में पल रहा है’ तो सूर्य बादलों में छुप गए। फिर भी बुद्ध ‘भगवान’ कहलाए और राम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ और तो और, कर्ण भी अपने बाप से सवाल पूछने के बजाय कुंती से ही पूछते हैं- ‘आपने मुझे जन्म देते ही गंगा में प्रवाहित कर दिया, फिर कैसी माता?’ यह नहीं सोचा कि अगर उनके महान पिता सूर्य देवता उन्हें अपना नाम देते तो कोई भी कुंती कर्ण को कभी खुद से अलग नहीं करती। [2] http://.नारीवाद का नारा लगाने वाली औरतें भी कभी-कभी पक्षपात करती दिखाई देती हैं।जब किसी स्त्री का स्वाभिमान और सम्मान खतरे में हो तो नारीवाद वाली ऐसी बुद्धिजीवी स्त्रियां भी उन पुरुषों के पक्ष में खड़ी पाई जाती हैं जिनका समाज में रुतबा है। पद्मश्री रीता गांगुली (गजल गायिका और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में संस्कृत नाटक के मंचन से संबद्ध) ने नाटक की पात्र से कहा- ‘अब तुम शकुंतला का रोल बखूबी कर सकती हो।’ उसने पूछा, ‘क्यों?’ उन्होंने कहा कि ‘अब तुम परिपक्व हुईं। पति ने तुम्हें छोड़ दिया। समाज ने नकार दिया। तुम अपने अस्तिस्व के लिए,अपनी पहचान के लिए लड़ रही हो।अब तुम्हारे स्वाभिमान पर आन पड़ी है।’ [3] http://.एक बच्चे को पालने में मां और बाप दोनों की भूमिका होती है। अगर बच्चे का बाप नहीं है तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर है तो वह अनाथ की तरह क्यों जिए? बुद्ध (ज्ञाता) कहलाने वाला पुरुष अपनी सोती हुई पत्नी और दूध पीते बच्चे को छोड़ कर किस ज्ञान की प्राप्ति के लिए निकला? एक बार यशोधरा बुद्ध के आश्रम में गईं और उनसे सवाल किया, ‘आप तो बुद्धत्व प्राप्ति के लिए निकल पड़े। मेरा क्या? मेरे बारे में सोचा?’ कहते हैं,बुद्ध के पास कोई उत्तर नहीं था,सिवाय मौन के।

काउंसलिंग के दौरान अक्सर प्रेमिकाएं/पत्नियां एक बात कहती पाई जातीं हैं कि By Vnita kasnia Punjab ? ‘ उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। मैंने उसे इतना प्यार किया,उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’ गौतम बुद्ध ने तब गृह त्याग किया जब उनकी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु की मां थी। राम ने सीता का त्याग तब किया जब सीता गर्भवती थी।सीता की अग्निपरीक्षा के कारण राम आज भी कटघरे में खड़े किए जाते हैं। कुंती ने जब सूर्य से कहा कि ‘आपके प्रेम का प्रताप मेरे गर्भ में पल रहा है’ तो सूर्य बादलों में छुप गए। कर्ण भी अपने पिता से सवाल पूछने के बजाय कुंती से ही पूछते हैं- ‘आपने मुझे जन्म देते ही गंगा में प्रवाहित कर दिया, फिर कैसी माता?’ यह नहीं सोचा कि अगर उनके महान पिता सूर्य देवता उन्हें अपना नाम देते तो कोई भी कुंती कर्ण को कभी खुद से अलग नहीं करती। [1] महिलाएं कई बार शादी से पहले मां बन जाती हैं क्योंकि उनके विवाहित प्रेमी उन्हें झांसा देते हैं कि कुछ ही दिनों में उनका तलाक होने वाला है। ऐसे सवाल जब-जब उठते हैं,सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या वाकई स्त्री की स्वायत्तता और अस्मिता तब तक निर...

*हनुमानजी की दिव्य उधारी!!!!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान 🙏🙏❤️*पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।* *रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!**अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।**माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!**कछुक दिवस जननी धरु धीरा।**कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।**निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।**तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥**मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए,आप किसी और से बुलवा लो।**अब बारी आई लक्षमण जी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था।**प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।**आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।**ये जो खड़ा है ना , वो हनुमानजी का लक्ष्मण है। मै कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमानजी अयोध्या से चले जाएं!**अब बारी आई भरत जी की, अरे! भरत जी तो इतना रोए, कि रामजी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पर, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो!**और दूसरी बात ये कि...!**बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।* *अधम कवन जग मोहि समाना॥**मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमानजी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!**रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।**सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥**मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमानजी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।**अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमानजी को अयोध्या से निकालने के लिए, जिन्होंने ने माता सीता, लक्षमण भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो! किसी अच्छे काम के लिए कहते तो बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।**अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार,* *माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों ये स्वामी है, और देखती हूं आप हनुमानजी से सकुचाते है।और आप खुद भी कहते हो कि...!**प्रति उपकार करौं का तोरा।* *सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥**आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु! राघवजी ने कहा देवी कर्जदार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो**सनमुख होइ न सकत मन मोरा**देवी! हनुमानजी का कर्जा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ्य राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है। क्योंकि कर्जा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो हनुमानजी का कर्जा कैसे उतारा जा सकता है।**पहले हनुमान विवाह करें*,*लंकेश हरें इनकी जब नारी।**मुदरी लै रघुनाथ चलै,निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।**अायि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।**तब रघुनाथ चुकायि सकें, ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।**देवी! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्जा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!**"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"**मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमानजी भी कुछ मांग लें।**दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए,सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमानजी क्या मांगेंगे, और रामजी क्या देंगे।**रामजी ने हनुमान जी से कहा! सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद,अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?**हनुमानजी बोले! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!**"तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना"**तो फिर यदि मै दो पद मांगू तो..?**सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमानजी भी ठीक ही कह रहे हैं। रामजी ने कहा! ठीक है, मांग लो, सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमानजी का कर्जा चुकता हुआ।**हनुमानजी ने कहा! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमे राजमद की शंका हो, तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए...?**हनुमानजी ने रामजी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।**हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।**नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।**जानकी जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राघवजी बोले, लो उतर गया हनुमानजी का कर्जा!**और अभी तक जिसको बोलना था, सब बोल चुके है, अब जो मै बोलता हूं उसे सब सुनो, रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले...!*#Vnita🙏🙏❤️*"हे! भरत भैया' कपि से उऋण हम नाही"*........*हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म लेे लें, #हनुमानजी से उऋण नही हो सकते।* *जय #श्री #हनुमान जी #महाराज की जय*

*हनुमानजी की दिव्य उधारी!!!!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️ *पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।*  *रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!* *अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।* *माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!* *कछुक दिवस जननी धरु धीरा।* *कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।* *निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।* *तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥* *मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जान...