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काउंसलिंग के दौरान अक्सर प्रेमिकाएं/पत्नियां एक बात कहती पाई जातीं हैं किBy Vnita kasnia Punjab ?‘उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। मैंने उसे इतना प्यार किया,उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’गौतम बुद्ध ने तब गृह त्याग किया जब उनकी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु की मां थी।राम ने सीता का त्याग तब किया जब सीता गर्भवती थी।सीता की अग्निपरीक्षा के कारण राम आज भी कटघरे में खड़े किए जाते हैं।कुंती ने जब सूर्य से कहा कि ‘आपके प्रेम का प्रताप मेरे गर्भ में पल रहा है’ तो सूर्य बादलों में छुप गए।कर्ण भी अपने पिता से सवाल पूछने के बजाय कुंती से ही पूछते हैं- ‘आपने मुझे जन्म देते ही गंगा में प्रवाहित कर दिया, फिर कैसी माता?’यह नहीं सोचा कि अगर उनके महान पिता सूर्य देवता उन्हें अपना नाम देते तो कोई भी कुंती कर्ण को कभी खुद से अलग नहीं करती।[1]महिलाएं कई बार शादी से पहले मां बन जाती हैं क्योंकि उनके विवाहित प्रेमी उन्हें झांसा देते हैं कि कुछ ही दिनों में उनका तलाक होने वाला है।ऐसे सवाल जब-जब उठते हैं,सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या वाकई स्त्री की स्वायत्तता और अस्मिता तब तक निर्धारित नहीं होती जब तक उसे पुरुष का संरक्षण न मिले?शकुंतला की कहानी सबको मालूम है। राजा दुष्यंत ने उसे जंगल में देखा और उससे प्रेम विवाह किया। फिर शकुंतला गर्भवती हुई। इस बीच दुष्यंत राजधानी लौट गए।जब शकुंतला उनसे मिलने पहुंची तो राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। कथा यह है कि ऐसा ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण हुआ।जो भी हो शकुंतला को परित्यक्ता की तरह रहना पड़ा।यही हाल सीता का भी हुआ। एक आम नागरिक के कहने पर राम ने लोकापवाद का हवाला देकर अपनी गर्भवती पत्नी सीता को वनवास दे दिया,जबकि इससे पहले वे उनकी अग्निपरीक्षा ले चुके थे।काफी समय बाद सीता ने अकेले दम पर पाले गए अपने पुत्रों को उनके पिता को सौंप दिया और स्वयं धरती में समा गईं।शकुंतलापुत्र भरत जब शेर के मुंह में हाथ डालकर उसके दांत गिन रहा था,तो दुष्यंत को लगा कि जरूर यह किसी राजवंश का उत्तराधिकारी है।उन्होंने भी शकुंतला से अपने पुत्र को यह कहकर ले लिया कि यह तो मेरा बेटा है, इसलिए राजमहल में रहेगा।शकुंतला ने पुत्र को तो सौंप दिया लेकिन उनके साथ स्वयं नहीं गई।यह एक स्वाभिमानी स्त्री का आत्मसम्मान था। वह उस पति को क्यों स्वीकार करे,जिसने उसे तब छोड़ दिया,जब उसे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी?और बुद्ध तो सत्य, ज्ञान और शांति की खोज में निकले थे।क्या वे नहीं जानते थे कि अकेली औरतों की समाज में क्या दशा होती है?आज भी सवाल सिर्फ औरतों से पूछे जाते हैं। अकेली यशोधरा ने कैसे पाला होगा अपने बेटे राहुल को?[2]एक बच्चे को पालने में मां और बाप दोनों की भूमिका होती है।अगर बच्चे का बाप नहीं है तो कोई बात नहीं,लेकिन अगर है तो वह अनाथ की तरह क्यों जिए?एक बार यशोधरा बुद्ध के आश्रम में गईं और उनसे सवाल किया, ‘आप तो बुद्धत्व प्राप्ति के लिए निकल पड़े। मेरा क्या? मेरे बारे में सोचा?’ कहते हैं,बुद्ध के पास कोई उत्तर नहीं था,सिवाय मौन के। [3]खैर,राम और बुद्ध बहुत बड़े प्रयोजन के लिए धरा पर अवतरित हुए थे।उनकी जीवनसंगिनियों को अपने पतियों का लम्बे समय तक का सान्निध्य नसीब होना विधि के विधान में ही नहीं था।तत्कालीन समाज स्त्रियों की इस सहनशक्ति को शक्ति का पर्याय मानकर पूजता था।'लाज और शर्म स्त्री का गहना होता है',कहकर उसी को परिवार और समाज से सामंजस्य करना सिखाया जाता था।पुरुष को जीवन की दूसरी चुनौतियो से जूझने में नारियों के अधिकारों और इच्छाओं के सम्बन्ध में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती थीऔर तो और जो स्त्रियाँ दबे स्वर में भी अपनी इच्छाएं व्यक्त करने का साहस कर लेतीं थीं उनको उनके परिवार की ही वरिष्ठ नारियाँ 'निर्लज्ज' की संज्ञा दे डालतीं थीं।यह उन स्त्रियों का प्रारब्ध कह लें या जीवन की विडम्बना।आज की स्थिति बदल रही है,हालांकि पूरी तरह बदली नहीं है।आज की नारी को पहले जैसी भीषण स्थिति से उबारने के लिए कानून,आर्थिक निर्भरता और समाज का सहारा मिल रहा है।प्राचीन समय में नारी न्याय के लिए अपने परिवार के सहयोग की राह तकती थी।उस समय सीता,यशोधरा और शकुन्तला की सहना ही नियति थी,आज के समय में जो प्रासंगिक नहीं रह गई है।आखिर नारी भी तो इंसान है।अब सीता को अपना राम खुद बनना है,यशोधरा को अपना बुद्धत्व स्वयं पाना है और शकुन्तला भी दुष्यन्त के निमन्त्रण की कृपा की मोहताज नहीं है।अब अन्याय किसी भी सूरत में सहनीय नहीं होना चाहिए।नारी को अपने शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक मूल्यों को सहेजते हुए अब उसे "जियो और जीने दो" के सिद्धान्त पर चलना है।नारी का पुरूष प्रतियोगी नहीं सहयोगी है।इतिहास में नारी पर हुए अन्याय का बदला नारीवाद का झंडा लेकर नारी द्वारा पुरुष का मानासिक शोषण करते हुए समाज का रूप विकृत करके नहीं मिलेगा,अपितु उसकी सुख-दुख में सहचरी बनकर मिलेगा।नारी को यदि सम्मान पाना है तो समाज और परिवार के सदस्यों का सम्मान करके ही मिलेगा।नारी हो या पुरूष,उसको समझना चाहिए कि कर्त्तव्यों के वृक्ष पर ही अधिकारों के फल लगते हैं।तब स्त्रियों के सम्बन्ध में राम और बुद्ध भले ही मौन रह गए हों,परन्तु अब पुरुष को नारी की इच्छाओं और आवश्यकताओं का सम्मान करना चाहिए….…जिससे नारी भी अपने नारीसुलभ कोमल गुणों से घर परिवार व समाज को सुन्दर रूप देने में स्वाभाविक ही आगे आए।"सम्मान दो,सम्मान लो।" दोनों पर यह बात लागू होनी चाहिए।जोर जबरदस्ती और उपदेश से ज्यादा प्रेमपूर्ण उदाहरण हमेशा बेहतर परिणाम देते हैं।अस्वीकरण : मेरा उद्देश्य इस उत्तर में युग पुरूषों और अवतारों राम और बुद्ध का तिरस्कार करना नहीं है अपितु विधि के विधान के कारण जो परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई,उसके कारण जनमानस में उनके विरूद्ध जो रोष उत्पन्न होता है,उसको कम करना है।उन नारियों का स्वाभिमान अपनी जगह सही था और उन युग पुरूषों ने चूंकि मानवता का कल्याण करना था,उसके कारण उनकी पत्नियों को उनसे अलग होना पड़ा जबकि वे दोनों उनसे अत्यधिक प्रेम करते थे।राम और बुद्ध का उदाहरण गृहस्थ धर्म के लिए लेना कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है।आंशिक स्त्रोत:Google Image Result for https://assets.saatchiart.com/saatchi/955709/art/5601091/4670901-SHHNIBPT-6.jpgस्त्री के लिए क्यों मौन रह गए बुद्ध और राम?फुटनोट[1] http://.काउंसलिंग के दौरान अक्सर प्रेमिकाएं/पत्नियां एक बात कहती पाई जातीं हैं कि ‘उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। मैंने उसे इतना प्यार किया,उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’ पति या प्रेमी कब भगोड़े नहीं थे? गौतम बुद्ध तब भागे जब उनकी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु की मां थी। राम ने सीता का त्याग तब किया जब सीता गर्भवती थी। कुंती ने जब सूर्य से कहा कि ‘आपके प्रेम का प्रताप मेरे गर्भ में पल रहा है’ तो सूर्य बादलों में छुप गए। फिर भी बुद्ध ‘भगवान’ कहलाए और राम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ और तो और, कर्ण भी अपने बाप से सवाल पूछने के बजाय कुंती से ही पूछते हैं- ‘आपने मुझे जन्म देते ही गंगा में प्रवाहित कर दिया, फिर कैसी माता?’ यह नहीं सोचा कि अगर उनके महान पिता सूर्य देवता उन्हें अपना नाम देते तो कोई भी कुंती कर्ण को कभी खुद से अलग नहीं करती। [2] http://.नारीवाद का नारा लगाने वाली औरतें भी कभी-कभी पक्षपात करती दिखाई देती हैं।जब किसी स्त्री का स्वाभिमान और सम्मान खतरे में हो तो नारीवाद वाली ऐसी बुद्धिजीवी स्त्रियां भी उन पुरुषों के पक्ष में खड़ी पाई जाती हैं जिनका समाज में रुतबा है। पद्मश्री रीता गांगुली (गजल गायिका और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में संस्कृत नाटक के मंचन से संबद्ध) ने नाटक की पात्र से कहा- ‘अब तुम शकुंतला का रोल बखूबी कर सकती हो।’ उसने पूछा, ‘क्यों?’ उन्होंने कहा कि ‘अब तुम परिपक्व हुईं। पति ने तुम्हें छोड़ दिया। समाज ने नकार दिया। तुम अपने अस्तिस्व के लिए,अपनी पहचान के लिए लड़ रही हो।अब तुम्हारे स्वाभिमान पर आन पड़ी है।’ [3] http://.एक बच्चे को पालने में मां और बाप दोनों की भूमिका होती है। अगर बच्चे का बाप नहीं है तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर है तो वह अनाथ की तरह क्यों जिए? बुद्ध (ज्ञाता) कहलाने वाला पुरुष अपनी सोती हुई पत्नी और दूध पीते बच्चे को छोड़ कर किस ज्ञान की प्राप्ति के लिए निकला? एक बार यशोधरा बुद्ध के आश्रम में गईं और उनसे सवाल किया, ‘आप तो बुद्धत्व प्राप्ति के लिए निकल पड़े। मेरा क्या? मेरे बारे में सोचा?’ कहते हैं,बुद्ध के पास कोई उत्तर नहीं था,सिवाय मौन के।

काउंसलिंग के दौरान अक्सर प्रेमिकाएं/पत्नियां एक बात कहती पाई जातीं हैं कि

By Vnita kasnia Punjab ?

उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। मैंने उसे इतना प्यार किया,उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’

  • गौतम बुद्ध ने तब गृह त्याग किया जब उनकी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु की मां थी।
  • राम ने सीता का त्याग तब किया जब सीता गर्भवती थी।सीता की अग्निपरीक्षा के कारण राम आज भी कटघरे में खड़े किए जाते हैं।
  • कुंती ने जब सूर्य से कहा कि ‘आपके प्रेम का प्रताप मेरे गर्भ में पल रहा है’ तो सूर्य बादलों में छुप गए।
  • कर्ण भी अपने पिता से सवाल पूछने के बजाय कुंती से ही पूछते हैं- ‘आपने मुझे जन्म देते ही गंगा में प्रवाहित कर दिया, फिर कैसी माता?’
  • यह नहीं सोचा कि अगर उनके महान पिता सूर्य देवता उन्हें अपना नाम देते तो कोई भी कुंती कर्ण को कभी खुद से अलग नहीं करती।[1]

महिलाएं कई बार शादी से पहले मां बन जाती हैं क्योंकि उनके विवाहित प्रेमी उन्हें झांसा देते हैं कि कुछ ही दिनों में उनका तलाक होने वाला है।

ऐसे सवाल जब-जब उठते हैं,सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या वाकई स्त्री की स्वायत्तता और अस्मिता तब तक निर्धारित नहीं होती जब तक उसे पुरुष का संरक्षण न मिले?

  • शकुंतला की कहानी सबको मालूम है। राजा दुष्यंत ने उसे जंगल में देखा और उससे प्रेम विवाह किया। फिर शकुंतला गर्भवती हुई। इस बीच दुष्यंत राजधानी लौट गए।
  • जब शकुंतला उनसे मिलने पहुंची तो राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। कथा यह है कि ऐसा ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण हुआ।जो भी हो शकुंतला को परित्यक्ता की तरह रहना पड़ा।
  • यही हाल सीता का भी हुआ। एक आम नागरिक के कहने पर राम ने लोकापवाद का हवाला देकर अपनी गर्भवती पत्नी सीता को वनवास दे दिया,जबकि इससे पहले वे उनकी अग्निपरीक्षा ले चुके थे।
  • काफी समय बाद सीता ने अकेले दम पर पाले गए अपने पुत्रों को उनके पिता को सौंप दिया और स्वयं धरती में समा गईं।
  • शकुंतलापुत्र भरत जब शेर के मुंह में हाथ डालकर उसके दांत गिन रहा था,तो दुष्यंत को लगा कि जरूर यह किसी राजवंश का उत्तराधिकारी है।उन्होंने भी शकुंतला से अपने पुत्र को यह कहकर ले लिया कि यह तो मेरा बेटा है, इसलिए राजमहल में रहेगा।
  • शकुंतला ने पुत्र को तो सौंप दिया लेकिन उनके साथ स्वयं नहीं गई।यह एक स्वाभिमानी स्त्री का आत्मसम्मान था। वह उस पति को क्यों स्वीकार करे,जिसने उसे तब छोड़ दिया,जब उसे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी?

और बुद्ध तो सत्य, ज्ञान और शांति की खोज में निकले थे।क्या वे नहीं जानते थे कि अकेली औरतों की समाज में क्या दशा होती है?आज भी सवाल सिर्फ औरतों से पूछे जाते हैं। अकेली यशोधरा ने कैसे पाला होगा अपने बेटे राहुल को?[2]

एक बच्चे को पालने में मां और बाप दोनों की भूमिका होती है।अगर बच्चे का बाप नहीं है तो कोई बात नहीं,लेकिन अगर है तो वह अनाथ की तरह क्यों जिए?

एक बार यशोधरा बुद्ध के आश्रम में गईं और उनसे सवाल किया, ‘आप तो बुद्धत्व प्राप्ति के लिए निकल पड़े। मेरा क्या? मेरे बारे में सोचा?’ कहते हैं,बुद्ध के पास कोई उत्तर नहीं था,सिवाय मौन के। [3]


खैर,राम और बुद्ध बहुत बड़े प्रयोजन के लिए धरा पर अवतरित हुए थे।उनकी जीवनसंगिनियों को अपने पतियों का लम्बे समय तक का सान्निध्य नसीब होना विधि के विधान में ही नहीं था।

तत्कालीन समाज स्त्रियों की इस सहनशक्ति को शक्ति का पर्याय मानकर पूजता था।'लाज और शर्म स्त्री का गहना होता है',कहकर उसी को परिवार और समाज से सामंजस्य करना सिखाया जाता था।

पुरुष को जीवन की दूसरी चुनौतियो से जूझने में नारियों के अधिकारों और इच्छाओं के सम्बन्ध में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती थी

और तो और जो स्त्रियाँ दबे स्वर में भी अपनी इच्छाएं व्यक्त करने का साहस कर लेतीं थीं उनको उनके परिवार की ही वरिष्ठ नारियाँ 'निर्लज्ज' की संज्ञा दे डालतीं थीं।

  • यह उन स्त्रियों का प्रारब्ध कह लें या जीवन की विडम्बना।आज की स्थिति बदल रही है,हालांकि पूरी तरह बदली नहीं है।
  • आज की नारी को पहले जैसी भीषण स्थिति से उबारने के लिए कानून,आर्थिक निर्भरता और समाज का सहारा मिल रहा है।
  • प्राचीन समय में नारी न्याय के लिए अपने परिवार के सहयोग की राह तकती थी।
  • उस समय सीता,यशोधरा और शकुन्तला की सहना ही नियति थी,आज के समय में जो प्रासंगिक नहीं रह गई है।आखिर नारी भी तो इंसान है।
  • अब सीता को अपना राम खुद बनना है,यशोधरा को अपना बुद्धत्व स्वयं पाना है और शकुन्तला भी दुष्यन्त के निमन्त्रण की कृपा की मोहताज नहीं है।अब अन्याय किसी भी सूरत में सहनीय नहीं होना चाहिए।
  • नारी को अपने शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक मूल्यों को सहेजते हुए अब उसे "जियो और जीने दो" के सिद्धान्त पर चलना है।
  • नारी का पुरूष प्रतियोगी नहीं सहयोगी है।इतिहास में नारी पर हुए अन्याय का बदला नारीवाद का झंडा लेकर नारी द्वारा पुरुष का मानासिक शोषण करते हुए समाज का रूप विकृत करके नहीं मिलेगा,अपितु उसकी सुख-दुख में सहचरी बनकर मिलेगा।
  • नारी को यदि सम्मान पाना है तो समाज और परिवार के सदस्यों का सम्मान करके ही मिलेगा।
  • नारी हो या पुरूष,उसको समझना चाहिए कि कर्त्तव्यों के वृक्ष पर ही अधिकारों के फल लगते हैं।

तब स्त्रियों के सम्बन्ध में राम और बुद्ध भले ही मौन रह गए हों,परन्तु अब पुरुष को नारी की इच्छाओं और आवश्यकताओं का सम्मान करना चाहिए….

जिससे नारी भी अपने नारीसुलभ कोमल गुणों से घर परिवार व समाज को सुन्दर रूप देने में स्वाभाविक ही आगे आए।

"सम्मान दो,सम्मान लो।" दोनों पर यह बात लागू होनी चाहिए।

जोर जबरदस्ती और उपदेश से ज्यादा प्रेमपूर्ण उदाहरण हमेशा बेहतर परिणाम देते हैं।

अस्वीकरण : मेरा उद्देश्य इस उत्तर में युग पुरूषों और अवतारों राम और बुद्ध का तिरस्कार करना नहीं है अपितु विधि के विधान के कारण जो परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई,उसके कारण जनमानस में उनके विरूद्ध जो रोष उत्पन्न होता है,उसको कम करना है।

उन नारियों का स्वाभिमान अपनी जगह सही था और उन युग पुरूषों ने चूंकि मानवता का कल्याण करना था,उसके कारण उनकी पत्नियों को उनसे अलग होना पड़ा जबकि वे दोनों उनसे अत्यधिक प्रेम करते थे।राम और बुद्ध का उदाहरण गृहस्थ धर्म के लिए लेना कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है।

आंशिक स्त्रोत:

Google Image Result for https://assets.saatchiart.com/saatchi/955709/art/5601091/4670901-SHHNIBPT-6.jpg

स्त्री के लिए क्यों मौन रह गए बुद्ध और राम?

फुटनोट

[1] http://.काउंसलिंग के दौरान अक्सर प्रेमिकाएं/पत्नियां एक बात कहती पाई जातीं हैं कि ‘उसने मुझे तब छोड़ा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी। मैंने उसे इतना प्यार किया,उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’ पति या प्रेमी कब भगोड़े नहीं थे? गौतम बुद्ध तब भागे जब उनकी पत्नी यशोधरा नवजात शिशु की मां थी। राम ने सीता का त्याग तब किया जब सीता गर्भवती थी। कुंती ने जब सूर्य से कहा कि ‘आपके प्रेम का प्रताप मेरे गर्भ में पल रहा है’ तो सूर्य बादलों में छुप गए। फिर भी बुद्ध ‘भगवान’ कहलाए और राम ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ और तो और, कर्ण भी अपने बाप से सवाल पूछने के बजाय कुंती से ही पूछते हैं- ‘आपने मुझे जन्म देते ही गंगा में प्रवाहित कर दिया, फिर कैसी माता?’ यह नहीं सोचा कि अगर उनके महान पिता सूर्य देवता उन्हें अपना नाम देते तो कोई भी कुंती कर्ण को कभी खुद से अलग नहीं करती। 
[2] http://.नारीवाद का नारा लगाने वाली औरतें भी कभी-कभी पक्षपात करती दिखाई देती हैं।जब किसी स्त्री का स्वाभिमान और सम्मान खतरे में हो तो नारीवाद वाली ऐसी बुद्धिजीवी स्त्रियां भी उन पुरुषों के पक्ष में खड़ी पाई जाती हैं जिनका समाज में रुतबा है। पद्मश्री रीता गांगुली (गजल गायिका और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में संस्कृत नाटक के मंचन से संबद्ध) ने नाटक की पात्र से कहा- ‘अब तुम शकुंतला का रोल बखूबी कर सकती हो।’ उसने पूछा, ‘क्यों?’ उन्होंने कहा कि ‘अब तुम परिपक्व हुईं। पति ने तुम्हें छोड़ दिया। समाज ने नकार दिया। तुम अपने अस्तिस्व के लिए,अपनी पहचान के लिए लड़ रही हो।अब तुम्हारे स्वाभिमान पर आन पड़ी है।’ 

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का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

राम राम जी

जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही क्यों तोड़ दिया था? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//          🌹🌹🙏🙏🌹🌹 वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने राम सेतु का निर्माण रावण के वध हेतु लंका जाने के लिए करवाया था। समुद्र पर बने इस पुल का निर्माण वानरों, रीछ और नल नील भाइयों की निगरानी में हुआ था। नल नील विश्वकर्मा के पुत्र थे और उस समय के महान वास्तुविद माने जाते थे। बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि रामसेतु को भगवान श्री राम ने स्वयं तोड़ा था। पद्म पुराण के सृष्टि खंड में इसकी कथा विस्तारपूर्वक मिलती है। पदम पुराण के मुताबिक जब श्री राम रावण का वध करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो गया था, तब एक दिन उनके मन में विभीषण से मिलने का विचार आया। उन्होंने सोचा कि रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं! ऐसा विचार मन में आने के बाद जब श्री राम लंका जाने की सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्री राम ने उन्हे...