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अंतिम सांस गिन रहे #जटायु_ने कहा कि "मुझे पता था कि मैं #रावण_से नही जीत सकता लेकिन फिर भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली #पीढियां_मुझे कायर कहतीं"#वनिता #कासनियां #पंजाब 🙏🙏जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले... तो मृत्यु आई और जैसे ही मृत्यु आयी... तो गिद्धराज जटायु ने मृत्यु को ललकार कहा..."खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना..! मैं तुझ को स्वीकार तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती... जब तक मैं माता #सीता जी की "सुधि" प्रभु "#श्रीराम" को नहीं सुना देता...!मौत उन्हें छू नहीं पा रही है... काँप रही है खड़ी हो कर...मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला ।किन्तु #महाभारत के #भीष्म_पितामह छह महीने तक बाणों की #शय्या पर लेट करके मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे... आँखों में आँसू हैं ...वे पश्चाताप से रो रहे हैं... भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...! कितना अलौकिक है यह दृश्य... #रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं... प्रभु "श्रीराम" रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं... वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान "#श्रीकृष्ण" हँस रहे हैं... भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं... ?अंत समय में जटायु को प्रभु "श्रीराम" की #गोद की शय्या मिली... लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय #बाण की शय्या मिली....! जटायु अपने #कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की #गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहे हैं.. प्रभु "श्रीराम" की #शरण में..... और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं.... ऐसा अंतर क्यों?... ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म *पितामह* ने #द्रौपदी चीरहरन देखा था... विरोध नहीं कर पाये और मौन रह गए थे ...! दुःशासन को ललकार देते... दुर्योधन को ललकार देते...तो उनका साहस न होता, लेकिन द्रौपदी रोती रही... #बिलखती रही... #चीखती रही... #चिल्लाती रही... लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे... #नारी की #रक्षा नहीं कर पाये...!उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और .... जटायु ने नारी का सम्मान किया... अपने प्राणों की आहुति दे दी... तो मरते समय भगवान "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...!#Vnita 🙏जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं ... उनकी गति #भीष्म जैसी होती है ... जो अपना परिणाम जानते हुए भी...औरों के लिए #संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य #जटायु जैसा #कीर्तिवान होता है । अतः सदैव #गलत का #विरोध जरूर करना चाहिए । "#सत्य" परेशान जरूर होता है, पर #पराजित नहीं ।।

अंतिम सांस गिन रहे #जटायु_ने कहा कि "मुझे पता था कि मैं #रावण_से नही जीत सकता लेकिन फिर भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली #पीढियां_मुझे कायर कहतीं"

#वनिता #कासनियां #पंजाब 🙏🙏

जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले... तो मृत्यु आई और जैसे ही मृत्यु आयी... तो गिद्धराज जटायु ने मृत्यु को ललकार कहा...
"खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना..! मैं तुझ को स्वीकार तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती... जब तक मैं माता #सीता जी की "सुधि" प्रभु "#श्रीराम" को नहीं सुना देता...!

मौत उन्हें छू नहीं पा रही है... काँप रही है खड़ी हो कर...मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला ।

किन्तु #महाभारत के #भीष्म_पितामह छह महीने तक बाणों की #शय्या पर लेट करके मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे... आँखों में आँसू हैं ...वे पश्चाताप से रो रहे हैं... भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...! 
कितना अलौकिक है यह दृश्य... #रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं... 
प्रभु "श्रीराम" रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं... 
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान "#श्रीकृष्ण" हँस रहे हैं... भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं... ?

अंत समय में जटायु को प्रभु "श्रीराम" की #गोद की शय्या मिली... लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय #बाण की शय्या मिली....!
 जटायु अपने #कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की #गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहे हैं.. प्रभु "श्रीराम" की #शरण में..... और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं.... 

ऐसा अंतर क्यों?...     

ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म *पितामह* ने #द्रौपदी  चीरहरन देखा था... विरोध नहीं कर पाये और मौन रह गए थे ...! 
 दुःशासन को ललकार देते... दुर्योधन को ललकार देते...
तो उनका साहस न होता, लेकिन द्रौपदी रोती रही... #बिलखती रही... #चीखती रही... #चिल्लाती रही... लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे... #नारी की #रक्षा नहीं कर पाये...!

उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और .... 
 जटायु ने नारी का सम्मान किया... 
अपने प्राणों की आहुति दे दी... तो मरते समय भगवान 
"श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...!
#Vnita 🙏
जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं ... उनकी गति #भीष्म जैसी होती है ... 
जो अपना परिणाम जानते हुए भी...औरों के लिए #संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य #जटायु जैसा #कीर्तिवान होता है ।

 अतः सदैव #गलत का #विरोध जरूर करना चाहिए । 
"#सत्य" परेशान जरूर होता है, पर #पराजित नहीं ।।

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*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

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राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By वनिता कासनियां पंजाब श्रीगणेश के अवतारहम सबने भगवान विष्णु के दशावतार और भगवान शंकर के १९ अवतारों के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे "अष्टरूप" कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं।वक्रतुंड: मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड वाले "वक्रतुंड" अवतार लिया और मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

दूसरे दिन ब्राह्म-मुहूर्त्त में निद्रा त्याग कर मुनि विश्वामित्र तृण शैयाओं पर विश्राम करते हुये राम और लक्ष्मण के पास जा कर बोले, हे राम और लक्ष्मण! जागो। रात्रि समाप्त हो गई है। कुछ ही काल में प्राची में भगवान भुवन-भास्कर उदित होने वाले हैं। जिस प्रकार वे अन्धकार का नाश कर समस्त दिशाओं में प्रकाश फैलाते हैं उसी प्रकार तुम्हें भी अपने पराक्रम से राक्षसों का विनाश करना है। नित्य कर्म से निवृत होओ, सन्ध्या-उपासना करो। अग्निहोत्रादि से देवताओं को प्रसन्न करो। आलस्य को त्यागो और शीघ्र उठ जाओ क्योंकि अब सोने का समय नहीं है। गुरु की आज्ञा प्राप्त होते ही दोनों भाइयों ने शैया त्याग दिया और नित्यकर्म एवं स्नान-ध्यान आदि से निवृत होकर मुनिवर के साथ गंगा तट की ओर चल दिये। वे गंगा और सरयू के संगम, जहाँ पर ऋषि-मुनियों तथा तपस्वियों के शान्त व सुन्दर आश्रम बने हुये थे, पर पहुँचे। एक अत्यधिक सुन्दर आश्रम को देखकर रामचन्द्र ने गुरु विश्वामित्र से पूछा, हे गुरुवर! यह परम रमणीक आश्रम किन महर्षि का निवास स्थान हैं? राम के प्रश्न के उत्तर में ऋषि विश्वामित्र ने बताया, हे राम! यह एक विशेष आश्रम है। पूर्व काल में कैलाशपति महादेव ने यहाँ घोर तपस्या की थी। सम्पूर्ण विश्व उनकी तपस्या को देखकर विचलित हो उठा था। उनकी तपस्या से देवराज इन्द्र भयभीत हो गए और उन्होंने शंकर जी के तप को भंग करने का निश्चय किया। इस कार्य के लिये उन्होंने कामदेव को नियुक्त कर दिया। भगवान शिव पर कामदेव ने एक के बाद एक कई बाण छोड़े जिससे उनकी तपस्या में बाधा पड़ी। क्रुद्ध होकर महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। उस तीसरे नेत्र की तेजोमयी ज्वाला से जल कर कामदेव भस्म हो गए। देवता होने के कारण कामदेव की मृत्यु नहीं हुई केवल शरीर ही नष्ट हुआ। इस प्रकार अंग नष्ट हो जाने के कारण उसका नाम अनंग हो गया और इस स्थान का नाम अंगदेश पड़ गया। यह भगवान शिव का आश्रम है किन्तु भगवान शिव के द्वारा यहाँ पर कामदेव को भस्म कर देने के कारण इसे कामदेव का आश्रम भी कहते हैं। गुरु विश्वामित्र की आदेशानुसार सभी ने वहीं रात्रि विश्राम करने का निश्चय किया। राम और लक्ष्मण दोनों भाइयों ने वन से कंद-मूल-फल लाकर मुनिवर को समर्पित किये और गुरु के साथ दोनों भाइयों ने प्रसाद ग्रहण किया। तत्पश्चात् स्नान, सन्ध्या-उपासना आदि से निवृत होकर राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र से अनेक प्रकार की कथाएँ तथा धार्मिक प्रवचन सुनते रहे। अन्त में गुरु की यथोचित सेवा करने के पश्चात् आज्ञा पाकर वे परम पवित्र गायत्री मन्त्र का जाप करते हुये तृण शैयाओं पर जा विश्राम करने लगे। By वनिता कासनियां पंजाब

दूसरे दिन ब्राह्म-मुहूर्त्त में निद्रा त्याग कर मुनि विश्वामित्र तृण शैयाओं पर विश्राम करते हुये राम और लक्ष्मण के पास जा कर बोले, हे राम और लक्ष्मण! जागो। रात्रि समाप्त हो गई है। कुछ ही काल में प्राची में भगवान भुवन-भास्कर उदित होने वाले हैं। जिस प्रकार वे अन्धकार का नाश कर समस्त दिशाओं में प्रकाश फैलाते हैं उसी प्रकार तुम्हें भी अपने पराक्रम से राक्षसों का विनाश करना है। नित्य कर्म से निवृत होओ, सन्ध्या-उपासना करो। अग्निहोत्रादि से देवताओं को प्रसन्न करो। आलस्य को त्यागो और शीघ्र उठ जाओ क्योंकि अब सोने का समय नहीं है।  गुरु की आज्ञा प्राप्त होते ही दोनों भाइयों ने शैया त्याग दिया और नित्यकर्म एवं स्नान-ध्यान आदि से निवृत होकर मुनिवर के साथ गंगा तट की ओर चल दिये। वे गंगा और सरयू के संगम, जहाँ पर ऋषि-मुनियों तथा तपस्वियों के शान्त व सुन्दर आश्रम बने हुये थे, पर पहुँचे। एक अत्यधिक सुन्दर आश्रम को देखकर रामचन्द्र ने गुरु विश्वामित्र से पूछा, हे गुरुवर! यह परम रमणीक आश्रम किन महर्षि का निवास स्थान हैं?  राम के प्रश्न के उत्तर में ऋषि विश्वामित्र ने बताया, हे राम! यह ...