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संपूर्ण श्री रामचरित मानस में हनुमान जी ने कितनी बार लघु रूप लिया है? By वनिता कासनियां पंजाब श्री रामदूत रुद्रावताराय हनुमान अतुलित एवम अजय पराक्रम के स्वामी हैं और ज्ञानिजनों में वे अग्रणी हैं। ज्ञानिनामग्रगण्यम श्री हनुमान को अष्टसिद्धियां पहले से ही प्राप्त थी। श्रीरामचरित्र मानस के अनुसार जगतनंदिनी लक्ष्मीरूपा मां जानकी ने अपने प्रिय पुत्र हनुमान जी को आशीर्वाद देकर इन सिद्धियों को अनंतगुना कर दिया व उन्हें इन सिद्धियों का दाता बना दिया।अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहंदनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌ ।सकलगुणनिधानं वानराणामधीशंरघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।अष्ट सिद्धि नव निधि के दाताअस बर दीन जानकी माता ।।सिद्धि ऐसी दिव्य पारलौकिक और आत्मिक ऊर्जा है जो योग और साधना की अलौकिक पराकाष्ठा पर प्राप्त होती हैं । सनातन वैदिक धर्म शास्त्रों में अनेक प्रकार की सिद्धियां का वर्णन प्रायः मिलता हैं जिसमें सर्वश्रेष्ठ आठ सिद्धियां अधिक प्रचलित है जिन्हें 'अष्टसिद्धि' कहा जाता।अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा ।प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः ।।अष्ट सिद्धियों की पहली सिद्धि अणिमा हैं जिसकी प्राप्ति पर साधक अपने देह को एक अणु के समान सूक्ष्म कर सकता हैं ऐसा होने पर वो अदृश्य हो जाता हैं।हनुमान जी महाराज ने पूरे रामचरित मानस में प्रभु राम के कार्य को पूर्ण करने हेतु नौ बार लघु रुप धारण किया है।विद्यावान गुनी अति चातुर,राम काज करिबे को आतुरसब पर राम तपस्वी राजा।तिन के काज सकल तुम साजा।पहली बार सुरसा प्रसंग के दौरान :जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।तासु दून कपि रूप देखावा॥सत जोजन तेहि आनन कीन्हा।अति लघु रुप पवनसुत लीन्हा।।दूसरी बार सिया सुधि हेतु लंका प्रवेश पर :पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।अति लघु रुप धर निसि नगर करौं पइसार।।चौपाई :मसक समान रूप कपि धरी।लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥तीसरी बार लंका की ओर बढ़ते समय लंकिनी को मोक्ष प्रदान करते समयगरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।राम कृपा करि चितवा जाहीअति लघु रुप धरेउ हनुमाना।पैठा नगर सुमरि भगवाना।।चौथा बार अशोक वन मे प्रवेश कर मां सीता से भेंट के समयकरि सोइ रुप (लघु मसक जैसा) गयउ पुनि तहवाँ।बन अशोक सीता रह जहवाँ।।पांचवीं बार मां सीता को मुंदरी दिखाने के बाद।सीता मन भरोस तब भयउ।पुनि लघु रुप पवन सुत लयउ।।छटवीं बार लंका में पूँछ मे आग लगने के उपरान्तपावक जरत देखि हनुमन्ता।भयउ परम लघु रुप तुरंता।।सातवीं लंका दहन कर लौटते वक्तपूँछ बुझाइ खोइ श्रम ,धरि लघु रुप बहोरि।जनक सुता के आगे ,ठाढ भयउ करि जोरि ।।आठवीं बार वैद्य सुषेन वैद्य जी को लाने हेतु ।जामवंत कह बैद सुषेना।लंकाँ रहइ को पठई लेना ।धरि लघु रुप गयउ हनुमन्ता।आनेउ भवन समेत तुरंता ।नौवीं वैद्य सुषेन जी की सम्मान सहित वापिस पहुंचाते समयहरषे सकल भालु कपि ब्राता॥कपि पुनि बैद तहां पहुँचावा।जेहिं बिधि (लघु) तबहिं ताहि लइ आवा।।दुर्गम काज जगत के जेतेसुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।और मनोरथ जो कोई लावै,सोई अमित जीवन फल पावै।श्री रामदूत हनुमान की जय !!

श्री रामदूत रुद्रावताराय हनुमान अतुलित एवम अजय पराक्रम के स्वामी हैं और ज्ञानिजनों में वे अग्रणी हैं। ज्ञानिनामग्रगण्यम श्री हनुमान को अष्टसिद्धियां पहले से ही प्राप्त थी। श्रीरामचरित्र मानस के अनुसार जगतनंदिनी लक्ष्मीरूपा मां जानकी ने अपने प्रिय पुत्र हनुमान जी को आशीर्वाद देकर इन सिद्धियों को अनंतगुना कर दिया व उन्हें इन सिद्धियों का दाता बना दिया।


अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌ ।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता

अस बर दीन जानकी माता ।।

सिद्धि ऐसी दिव्य पारलौकिक और आत्मिक ऊर्जा है जो योग और साधना की अलौकिक पराकाष्ठा पर प्राप्त होती हैं । सनातन वैदिक धर्म शास्त्रों में अनेक प्रकार की सिद्धियां का वर्णन प्रायः मिलता हैं जिसमें सर्वश्रेष्ठ आठ सिद्धियां अधिक प्रचलित है जिन्हें 'अष्टसिद्धि' कहा जाता।

अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा ।

प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः ।।

अष्ट सिद्धियों की पहली सिद्धि अणिमा हैं जिसकी प्राप्ति पर साधक अपने देह को एक अणु के समान सूक्ष्म कर सकता हैं ऐसा होने पर वो अदृश्य हो जाता हैं।

हनुमान जी महाराज ने पूरे रामचरित मानस में प्रभु राम के कार्य को पूर्ण करने हेतु नौ बार लघु रुप धारण किया है।

विद्यावान गुनी अति चातुर,

राम काज करिबे को आतुर

सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा।

पहली बार सुरसा प्रसंग के दौरान :

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।

तासु दून कपि रूप देखावा॥

सत जोजन तेहि आनन कीन्हा।

अति लघु रुप पवनसुत लीन्हा।।

दूसरी बार सिया सुधि हेतु लंका प्रवेश पर :

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

अति लघु रुप धर निसि नगर करौं पइसार।।

चौपाई :

मसक समान रूप कपि धरी।

लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥

तीसरी बार लंका की ओर बढ़ते समय लंकिनी को मोक्ष प्रदान करते समय

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।

राम कृपा करि चितवा जाही

अति लघु रुप धरेउ हनुमाना।

पैठा नगर सुमरि भगवाना।।

चौथा बार अशोक वन मे प्रवेश कर मां सीता से भेंट के समय

करि सोइ रुप (लघु मसक जैसा) गयउ पुनि तहवाँ।

बन अशोक सीता रह जहवाँ।।

पांचवीं बार मां सीता को मुंदरी दिखाने के बाद।

सीता मन भरोस तब भयउ।

पुनि लघु रुप पवन सुत लयउ।।

छटवीं बार लंका में पूँछ मे आग लगने के उपरान्त

पावक जरत देखि हनुमन्ता।

भयउ परम लघु रुप तुरंता।।

सातवीं लंका दहन कर लौटते वक्त

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम ,धरि लघु रुप बहोरि।

जनक सुता के आगे ,ठाढ भयउ करि जोरि ।।

आठवीं बार वैद्य सुषेन वैद्य जी को लाने हेतु ।

जामवंत कह बैद सुषेना।

लंकाँ रहइ को पठई लेना ।

धरि लघु रुप गयउ हनुमन्ता।

आनेउ भवन समेत तुरंता ।

नौवीं वैद्य सुषेन जी की सम्मान सहित वापिस पहुंचाते समय

हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥

कपि पुनि बैद तहां पहुँचावा।

जेहिं बिधि (लघु) तबहिं ताहि लइ आवा।।


दुर्गम काज जगत के जेते

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।

और मनोरथ जो कोई लावै,

सोई अमित जीवन फल पावै।

श्री रामदूत हनुमान की जय !!

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