सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अयोध्या धाम के प्रमुख मंदिर1.सरयू नदी2.राम पैड़ी3.नागेश्वर नाथ मंदिर4.कालेराम जी5.तुलसी स्मारक भवन6.श्री जानकी महल7.श्री वाल्मीकि रामायण भवन (लव कुश मंदिर)8.हनुमान बाग9.जानकी वल्लभ10.छोटी देवकाली मंदिर11.हनुमान गढ़ी - (अति महत्वपूर्ण दर्शन)12.दशरथ महल13.श्रीरामजन्मभूमि - (अति महत्वपूर्ण दर्शन)14.कनक भवन - (अति महत्वपूर्ण दर्शन)15.राम कथा संग्रहालय16.बिड़ला मंदिर17.मणि पर्वतअयोध्या के प्रभुख दर्शनीय स्थान(अयोध्या रेलवे स्टेशन से सभी मन्दिर कुछ ही किलोमीटर (लगभग 3-4 किमी0) की दूरी पर स्थित है )1.रामकोट(लगभग 2 किमी0)यह नगर की पश्चिमी दिशा में स्थित है जहाँ अनेक मन्दिर एवं दर्शनीय स्थान अवस्थित है।चैत्रमास की रामनवमी (मार्च-अप्रैल) को भगवान राम के जन्मोत्सव के पावन पर्व पर यहाँ देश-विदेश के श्रद्धालुओं का बड़ी संख्या में आवागमन होता है।दर्शनावधि:-ग्रीष्मकाल-प्रातः7.00 से 11.00 बजे तक अपरान्ह 2.00 से सायं 6.00 बजे तक।शीतकाल-प्रातः7.30 से 10.30 बजे तक अपरान्ह 2.00 से सायं 5.00 बजे तक।2.कनक भवनकनक भवन के में एक रोचक कथा प्रचलित है कि जब जानकी जी विवाह के पश्चात अयोध्या आई,तो महारानी कैकेयी ने कनक-निर्मित अपना महल उनको प्रथम भेंट स्वरुप प्रदान किया था।महाराजा विक्रमादित्य ने इसका पुनर्निमाण करवाया।बाद में टीकमगढ़ रियासत की महारानी वृषभानु कुंवारी ने एक सुन्दर विशाल भवन इसी स्थान पर पुनः निर्मित करवाया,जो आज भी विद्धमान है।इसी भवन में स्थित मन्दिर में श्री राम और किशोरी जी की दिव्य प्रतिमाएं स्थापित है।दर्शनावधि: प्रातः8.00 से बजे तक 12.00 बजे तक सायं 4.50 से 9.00 बजे तक।3.हनुमान गढ़ी(अयोध्या जंक्शन से लगभग 1 किमी0 उत्तर-पूर्व)रामकोट के पश्चिम द्वार पर महाराजा विक्रमादित्य ने हनुमान जी का एक मन्दिर बनवाया था,जो कालान्तर में हनुमान टीले के नाम से प्रसिद्ध हुआ।ऊँचे स्थान पर स्थित इस मन्दिर ७६ सीढियाँ चढ़कर पहुँचा जाता है।दर्शनावधि :-ग्रीष्मकाल-प्रातः 4.00 से रात्रि 11.00 बजे तक।शीतकाल-प्रातः5 बजे से रात्रि 10.00 बजे तक।4.नागेश्वरनाथ मन्दिर(लगभग 4 किमी0 उत्तर-पूर्व एवं राम की पैड़ी के समीप)नागेश्वरनाथ जी का मन्दिर अयोध्या के प्रमुख मंदिरों में से एक है।श्री रामचंद्र जी के पुत्र महाराज कुश जी द्वारा स्थापित इस मन्दिर की स्थापना के सम्बन्ध में कथा प्रचलित है कि एक दिन जब महाराजा कुश सरयू नदी में स्नान कर रहे थे,तो उनके हाथ का कंगन जल में गिर गया,जिसे नाग-कन्या उठा ले गयी, बहुत खोजने के बाद भी जब महाराजा कंगन प्राप्त नहीं कर सके,तब कुपित होकर उन्होंने जल को सुखा देने की इच्छा से अग्निशर का संधान किया,जिसके परिणामस्वरुप जल-जन्तु व्याकुल होने लगे।तब नागराज से स्वयं वह कंगन लाकर महाराजा कुश को सादर भेंट किया तथा उनसे अपनी पुत्री से विवाह करने का अनुरोध किया।महाराजा कुश ने नाग-कन्या से विवाह करके उस घंटना की स्मृति में उस स्थान पर नागेश्वर मन्दिर की स्थापना की।उसी स्थान पर आज एक विशाल शिव मन्दिर स्थित है।प्रत्येक त्रयोदशी एवं शिवरात्रि महापर्व पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु तीर्थ यात्री सरयू-स्नान करके इस मन्दिर में जल चढ़ाने आते है।दर्शनावधि:-ग्रीष्मकाल-प्रातः 5.00 से रात्रि 08.30 बजे तक तथा सायं 4.00 बजे से रात्रि 8.00 बजे तक।शीतकाल-प्रातः6 बजे से रात्रि 11.00 बजे तक तथा सायं 4.00 बजे से रात्रि 7.00 बजे तक।5.छोटी देवकाली मन्दिर(अयोध्या जंक्शन से 2 किमी0)यह मन्दिर नये घाटी के समीप एक गली में स्थित है।छोटी देवकाली जी अवध की ग्राम देवी मानी जाती है,मान्यतानुसार विवाहोपरान्त जब सीता जी अयोध्या आने लगी,तो अपने साथ अपनी पूज्या देवी गिरिजा जी को भी साथ लायी महाराज दशरथ ने उनकी स्थापना सप्तसागर के समीप एक सुन्दर मन्दिर में की।जानकी जी नित्य नियमपूर्वक प्रातःकाल परम शक्तिस्वरूपा माँ गिरिजा की की विधिवत उपासना करती थी।वर्तमान में यहाँ श्री देवकाली जी की देदीप्यमान भव्य प्रतिमा स्थापित है।दर्शनावधि:-सूर्योदय से सूर्यास्त तक।6.मत्तगयन्द (मातगैंड) जी का स्थान(लगभग 2 किमी0)मत्तगयन्द जी लंकाधिपति विभीषण जी के पुत्र थे,उनका स्थान कनक भवन मन्दिर के उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है।ये रामकोट के उत्तरी फाटक के प्रधान रक्षक थे।प्रतिवर्ष होली के बाद पड़ने वाले प्रथम मंगल के दिन उहाँ विशाल मेला लगता है।7.कालेराम जी का मन्दिर(2.5 किमी0)नागेश्वरनाथ मन्दिर के समीप सरयू नदी के पावन तट पर स्वर्गद्वार मोहल्ले में कालेराम जी का मन्दिर है।यहाँ विक्रमादित्य कालीन मूर्तियाँ स्थापित है।अयोध्या के प्राचीन मन्दिरों में कालेराम जी के मन्दिर का प्रमुख स्थान है।दर्शनावधि:-ग्रीष्मकाल-प्रातः 4.30 से 11.00 बजे तक तथा सायं 4.00 से रात्रि 9.00 बजे तक।शीतकाल-प्रातः 5.00 से 11.30 बजे तक तथा सायं 4.00 से रात्रि 8.00 बजे तक।8.मणिपर्वत(लगभग 1 किमी0)विद्याकुण्ड के समीप 65 फिट की ऊँचाई पर स्थित मणिपर्वत के बारे में जनश्रुति है कि हिमालय से संजीवनी बूटी को लेकर लंका जाते हुए पवनसुत हनुमान जी ने संजीवनी बूटी के पर्वत-खण्ड को रखकर यहाँ विश्राम किया था।ऊपर मन्दिर एवं झूला दर्शनीय है। श्रावण मास में अयोध्या में संपन्न होने वाले प्रसिद्ध झूलनोत्सव का प्रारम्भ यहीं से होता है।उस अवसर पर हजारों की संख्या में भक्तजन भगवान की मनोहारी झांकी देखने के लिए उपस्थित होते है।दर्शनावधि:- सूर्योदय से सूर्यास्त तक9.लक्ष्मण किला:सरयू के पावन तट पर स्थित लक्ष्मण किले का निर्माण मुबारक अली खाँ ने करवाया था। इसे किला मुबारक भी कहा जाता है।रसिक संप्रदाय के सन्त स्वामी युगलानन्द पारण जी महाराज,निर्मली कुण्ड पर तप करते थे उनके स्वर्गवासी होने के उपरान्त कालांतर में दीवान रीवाँ दीनबन्धु जी ने इस स्थान पर एक विशाल मन्दिर बनवाया,जो आज भी विद्धमान है।10.क्षीरेश्वरनाथ महादेव मन्दिर(लगभग 1/2 किमी0)हनुमान गढ़ी चौराहे से फैज़ाबाद-लखनऊ जाने वाले मार्ग पर क्षीरसागर स्थित है। इसके समीप ही श्री क्षिरेश्वरनाथ महादेव जी का भव्य शिवालय स्थित है। वर्गाकार चबूतरे पर निर्मित,इस मन्दिर में एक विशाल शिवलिंग स्थापित है।11.कोशलेश सदन(लगभग 1.5 किमी0)यह मन्दिर कटरा मोहल्ले में स्थित है।अयोध्या स्थित रामानुजी वैष्णवों की तिंगल शाखा के प्रमुख मन्दिरों में यह मन्दिर अद्वितीय है।12.लव-कुश मन्दिर(लगभग 1.5 किमी0)भगवान् राम के पुत्रों-लव व् कुश के नाम पर निर्मित इस मन्दिर में लव व कुश की मूर्ति के साथ महर्षि वाल्मीकि जी की प्रतिमा भी स्थापित है।इसके समीप ही अंबरदास जी राम कचेहरी मन्दिर, जगन्नाथ मन्दिर तथा रंगमहल मन्दिर है,जो अयोध्या के प्रमुख दक्षिण भारतीय मन्दिरों में गिने जाते है।13.विजेराघव मन्दिर(लगभग 1.5 किमी0)यह मन्दिर विभीषण कुण्ड जाने वाले मार्ग पर स्थित है।इसकी स्थापना 1915 ईस्वी में की गई थी।अचारी संप्रदाय के तिंगल शाखा के अयोध्या स्थित मन्दिरों में इसका प्रमुख स्थान है।14.रत्नसिँहासन (राजगद्दी)(लगभग 1.5 किमी0)यह भवन कनक भवन की दक्षिण दिशा में है।मान्यतानुसार यहाँ भगवान राम का राज्याभिषेक संपन्न हुआ था।15.दंतधावन कुण्ड(लगभग 1.5.किमी0)श्री वैष्णव के वड़गल शाखा के अंतर्गत आने वाला यह मन्दिर हनुमान गढ़ी चौराहे से रामघाट तुलसी स्मारक जाने वाले मार्ग पर स्थित है।किवंदन्ती के अनुसार इसी स्थान पर श्री रामचन्द्र जी चारों भाइयों के साथ प्रातःदतुवन करते थे।16.वाल्मीकि रामायण भवन(लगभग 3 किमी0)इस भवन में सम्पूर्ण वाल्मीकि रामायण को संगमरमर पर अंकित किया गया है।दर्शनावधि:-सूर्योदय से सूर्यास्त तक।17.तुलसी स्मारक भवन/अयोध्या शोध संस्थान/राम-कथा-संग्रहालय।(लगभग 1 किमी0)तुलसी चौरा के समीप उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा गोस्वामी तुलसीदास जी की स्मृति में स्मारक भवन का निर्माण करवाया गया है। भवन से संचालित अयोध्या शोध संस्थान के तत्त्वाधान में यहाँ प्रतिवर्ष श्रावण शुक्ला सप्तमी को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती विशेष अयोजनपूर्वक मनायी जाती है।यहाँ विशाल ग्रन्थागार, पुस्तकालय-वाचनालय एवं हस्तशिल्प का राम-कथा-विषयक सामग्रियों का संग्रह तथा अनुसंधाताओ के लिए तुलसी-सहित्य पर उत्तम सामग्री भी उपलब्ध है।विशेष आकर्षण:-अनवरत रामलीला एवं कथा-वचन कार्यक्रम।प्रतिदिन सायं 6.00 बजे से रात्रि 9.00 बजे तक।18.राम-कथा-संग्रहालयतुलसी स्मारक भवन में स्थित राम-कथा-संग्रहालय में राम कथा से संबधित विभिन्न प्रकार की पेंटिंग,हाथी-दांत के मुखौटे,प्राचीन दर्शनीय वस्तुएं और देश के विभिन्न संग्रहालयों में संग्रहीत राम-कथा से संबधित मूल सामग्रियों के चित्र उपलब्ध है।साप्ताहिक अवकाश:-सोमवार एवं सार्वजनिक अवकाश दिवस।19.गुरुद्वारा ब्रह्मकुण्ड(लगभग 3 किमी0)ब्रह्मकुण्ड घाट के निकट ब्रह्मदेव जी का एक छोटा-सा मन्दिर है जिसमें ब्रह्मा जी की चतुर्भुजी मूर्ति स्थापित है।मान्यता है कि गुरुनानकदेव जी को चतुरानन ब्रह्मा जी के साक्षात् दर्शन यहीं प्राप्त हुए थे।गुरु तेगबहादुर जी एवं गुरु गोविन्द सिंह जी का भी पावन प्रवास अयोध्या नगरी में हुआ था।घाट के पास विशाल गुरुद्वारा स्थित है,जहाँ प्रतिवर्ष सिख तीर्थ यात्री दर्शन के लिए आते है।20.अयोध्या के जैन मन्दिरअयोध्या के पाँच जैन तीर्थकरों होने का गौरव प्राप्त है।यहाँ पाँचो तीर्थकरों के मन्दिर है-तीर्थकर आदिनाथ मन्दिर ( मुरारी टोला,स्वर्गद्वार),तीर्थकर अजितनाथ मन्दिर (सप्तसागर,इटौआ) तीर्थकर अभिनन्दननाथ मन्दिर (सराय के निकट),तीर्थकर सुमन्तनाथ मन्दिर (रामकोट),तीर्थकर अनंतनाथ मन्दिर,(गोलाघाट)।रायगंज मोहल्ले में ऋषभदेव जी का विशाल मन्दिर है।इस मन्दिर में ऋषभदेव जी की 21 फुट ऊँची संगमरमर की दिगम्बर मूर्ति स्थापित है,जो अयोध्या स्थित जैन मंदिरों में स्थापित मूर्तियों में विशालतम है।21.राम की पैड़ी(लगभग 2 किमी0)अयोध्या गोरखपुर के राष्ट्रीय राजमार्ग पर सरयू के पल के निकट नदी के किनारे स्थित राम की पैड़ी अयोध्या का महत्वपूर्ण स्थान है।उद्यान एवं जलाशय यहाँ में आकर्षण है।22.मन्दिर श्री हनुमानबाग(लगभग 1.5 किमी0)अयोध्या जी के मोहल्ला में हनुमान बाग नामक एक भव्य स्थान का निर्माण एक भजनानंदी साधू द्वारा कराया गया है।यहाँ हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित है।पास में ही हनुमत सत्संग भवन माँ भी निर्माण कराया गया है।23.श्री जानकी महल ट्रस्ट -(लगभग 1.5 किमी0)कलकत्ता के मारवाड़ी समाज द्वारा वासुदेवघाट मोहल्ले में एक बड़ा भूखण्ड क्रय कर श्रीजानकी महल के नाम से एक भव्य मन्दिर,अतिथिशाला,गौशाला का निर्माण कराया गया है।24.श्री बिड़ला मन्दिर(लगभग 1.किमी0)श्री अयोध्या जी के पुराने सब स्टेशन के सामने बिड़ला सेठ द्वारा बनवाया गया भव्य बिड़ला मन्दिर स्थित है,जहाँ पर श्रीराम जानकी की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है।25. श्री सरयू महानदीजय by समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब, श्री सीताराम जीजय श्री हनुमानजी महाराज,

टिप्पणियाँ

Vnita ने कहा…
जय श्री राम राम

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By वनिता कासनियां पंजाब श्रीगणेश के अवतारहम सबने भगवान विष्णु के दशावतार और भगवान शंकर के १९ अवतारों के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे "अष्टरूप" कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं।वक्रतुंड: मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड वाले "वक्रतुंड" अवतार लिया और मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

राम राम जी

जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही क्यों तोड़ दिया था? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//          🌹🌹🙏🙏🌹🌹 वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने राम सेतु का निर्माण रावण के वध हेतु लंका जाने के लिए करवाया था। समुद्र पर बने इस पुल का निर्माण वानरों, रीछ और नल नील भाइयों की निगरानी में हुआ था। नल नील विश्वकर्मा के पुत्र थे और उस समय के महान वास्तुविद माने जाते थे। बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि रामसेतु को भगवान श्री राम ने स्वयं तोड़ा था। पद्म पुराण के सृष्टि खंड में इसकी कथा विस्तारपूर्वक मिलती है। पदम पुराण के मुताबिक जब श्री राम रावण का वध करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो गया था, तब एक दिन उनके मन में विभीषण से मिलने का विचार आया। उन्होंने सोचा कि रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं! ऐसा विचार मन में आने के बाद जब श्री राम लंका जाने की सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्री राम ने उन्हे...