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, (((( श्री हरेराम बाबा जी )))) By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब.👍👌👍श्री गणेशदास भक्तमाली जी गोवर्धन में लक्षमण मंदिर में विराजते थे। वहां के पुजारी श्री रामचंद्रदास जी गिरिराज की परिक्रमा करने नित्य जाते। .एक दिन परिक्रमा करते करते आन्योर ग्राम में लुकलुक दाऊजी नामक स्थान के पास कुंज लताओं में उन्हें एक विलक्षण व्यक्ति दिखाई पड़े। .उनके नेत्रों से अविरल जल बह रहा था , उनके सम्पूर्ण शरीर पर ब्रज रज लगी हुई थी और मुख से झाग निकल रहा था। .थोड़ी देर पुजारी रामचन्द्रदास जी वही ठहर गए। कुछ देर में उनका शरीर पुनः सामान्य स्तिथि पर आने लगा। वे महामंत्र का उच्चारण करने लगे...हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।.पुजारी जी समझ गए की यह कोई महान सिद्ध संत है। उन्होंने उनका नाम पूछा तो कह दिया की प्रेम से सब उन्हें हरेराम बाबा ही कहते है। .पुजारी जी उनको लक्ष्मण मंदिर में, श्री गणेशदास भक्तमाली जी के पास ले गए। धीरे धीरे दोनों संतो में हरिचर्चा बढ़ने लगी और स्नेह हो गया। श्री हरिराम बाबा भी साथ ही रहने लगे। .श्री हरेराम बाबा ने १२ वर्ष केवल गिरिराज जी की परिक्रमा की। उनके पास ४ लकड़ी के टुकड़े थे जिन्हें वो करताल की तरह उपयोग में लाते थे। उसी को बजा बजा कर महामंत्र का अहर्निश १२ वर्षो तक जप करते करते श्री गिरिराज जी की परिक्रमा करते रहे। .जब नींद लगती वही सो जाते, जब नींद खुलती तब पुनः परिक्रमा में लग जाते थे। नित्य वृन्दावन की परिक्रमा और यमुना जल पान, यमुना जी स्नान उनका नियम था। बाद में बाबा श्री सुदामाकुटी मे विराजमान हुए।.१. श्री हरेराम बाबा की प्रेम अवस्था...श्री हरेराम बाबा जब महामंत्र का कीर्तन करते..हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।तब उनको प्रेम आवेश होता और भगवान की साक्षात अनुभूति होती थी। एक नीलवर्ण की कांति (प्रकाश) दिखाई पड़ती और उसीमे श्रीकृष्ण का दर्शन उनको होता। उसी को पकड़ने के लिए बाबा उसके पीछे पीछे भागते और फिर कुछ देर बाद उन्हें मूर्छा आ जाती। .उनका शरीर कांपने लगता और बाद मे साधारण स्तिथि हो जाती। .एक बार बाबा श्री गणेशदास जी, पुजारी श्री रामचंद्रदास जी और श्री हरेराम बाबा यह ३ संत पैदल जगन्नाथ पूरी दर्शन करने के लिए निकले। रास्ते मे कीर्तन करते करते श्री हरेराम बाबा को प्रेमावेश हुआ और पास ही के एक गन्ने के सघन खेत को ३ मील तक चिरते हुए वे पार हो गए। .सम्पूर्ण शरूर रक्त से भर गया , घंटो मूर्छित अवस्था मे रहे। ऐसा रास्ते मे कई बार हुआ और बहुत दिनों के बाद वे संत जगन्नाथ पूरी पहुंचे।.२. भक्त भूरामल और उसकी पत्नी को वरदान देना...जयपुर मे एक भूरामल बजाज नाम के व्यापारी रहते थे जो बाबा के शिष्य भी थे। एक बार उन्होंने अपने ३ मंजिला मकान की छत पर कीर्तन का आयोजन करवाया। .अनेक सत्संगी भक्त और संतो को बुलाया, बाबा को भी कीर्तन में बुलाया। बाबा ने कहा की छतपर कीर्तन करना ठीक बात नही है, पता नही कब प्रेमावेश आ जाए और सब लोगो को परेशानी हो जाए। अच्छा होगा की नीचे आंगन मे ही कीर्तन हो। .भूरामल सेठ ने कहा की महाराज आप केवल कोने मे बैठे रहना ,अब इंतजाम हो गया है। भूरामल के आग्रह करने से बाबा कीर्तन मे बैठ गए। कीर्तन शुरू हुआ...हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।.परंतु कुछ देर बाद उनसे रहा नही गया, वे कीर्तन मे इतने लीन हो गए की नृत्य करते करते वे दौड़ पड़े और छतसे नीचे जा गिरे। .सब लोग नीचे भागे और बाबा को उठाया, कुछ देर मूर्छा रही। बाबा के एक हाथ मे ज्यादा चोट लगी थी जिस कारण भूरामल बहुत दुखे हुए की हमने बाबा की आज्ञा का उल्लंघन किया। .भूरामल ने अपने घर पर रखकर उनकी बहुत अच्छी प्रकार लंबे समय तक सेवा की। एक दिन श्रीहरेराम बाबा प्रसन्न होकर बोले.. भूरामल बच्चा ! मै तेरे ऊपर बहुत प्रसन्न हूं, कुछ मांग ले।.भूरामल ने कहा.. बाबा, मेरी यही इच्छा है की मेरा शरीर भगवान का भजन करते हुए छुटे और मुझे भगवान के नित्य धाम की प्राप्ति हो। .बाबा ने कहा.. ठीक है बच्चा ! ऐसा ही होगा। तू अकेला ही नही अपितु तेरी पत्नी भी तेरे साथ भजन करते करते भगवान के धाम को जाएगी। .इस घटना के कुछ समय बाद, एक दिन बाबा श्री गणेशदास, पुजारी श्रीरामचंद्रदास जी और श्री हरेराम बाबा, ये ३ संत जयपुर के पास गलता आश्रम पर प्रातः काल स्नान कर रहे थे। .श्री हरेराम बाबा पहले स्नान कर और तिलक स्वरूप करके माला जपने लगे, उसी समय श्रीहरेराम बाबा सहसा उठे और दोनों हाथ उठा कर आशिर्वाद देकर बोले.. .बहुत अच्छे भूरामल बच्चा ! धाम को पधारो और ठाकुर जी को मेरी ओर से भी प्रणाम कर देना। .बाबा गणेशदास जी और पुजारी जी ने पूछा, बाबा! आप ये आकाश की ओर देखकर किससे बातें कर रहे थे ? .श्री हरेराम बाबा ने कहा की क्या तुमने देखा नही, भूरामल उसकी पत्नी के सहित विमान मे बैठकर वैकुंठ को जा रहा है, उसी को आशीर्वाद देकर भगवान को प्रणाम करने को कह रहा था। .थोड़ी ही देर बाद भूरामल सेठ के घर का एक सेवक आया और उसने बताया की कुछ देर पहले भूरामल सेठ और उसकी पत्नी का भजन करते करते शरीर छूट गया है।.३. एक चुड़ैल सहित अन्य प्रेतों का उद्धार...श्री हरेराम बाबा राजस्थान के पाली जिले मे स्थित मुंडारा गांव मे एक खेत के पास झोंपडा बना कर निवास करते थे। .एक दिन गांव के एक व्यक्ति के घर मे भूत प्रेतों का उपद्रव हो गया। तांत्रिक, पूजा पाठ प्रयोग, ओझा सब ने प्रयास किया, बहुत प्रकार से अन्य उपाय करने पर भी समाधान नही हुआ तब वो पीड़ित व्यक्ति अपने परिवार सहित घर छोड़कर शहर की ओर चलने को तयार हुआ। .किसी ने उस व्यक्ति से कहा की श्रीहरेराम बाबा बड़े सिद्ध महात्मा है, यदि वे इस मकान मे रह जाएं तो भूतप्रेत भाग जाएंगे। .पीड़ित व्यक्ति बाबा के पास जाकर सत्य बात बोला नही। उसने कह दिया की महाराज आप यहां खेत के पास खुले मे रहते है, ठंड का समय है। .हमारा मकान खाली पड़ा है, वहां हमने साफ सफाई कर रखी है और हम अब शहर जा रहे है अतः आप हमारे मकान मे ही रहो। .बाबा बोले ठीक है बच्चा, वहां ठंड भी कम लगेगी। सुबह बाबा अपना कमंडलु, माला और आसान लेकर वहां पहुंचे और भजन मे बैठ गए। जैसे ही संध्याका समय हुआ, प्रेतों का उपद्रव शुरू हो गया।.बाबा समझ गए की यहां प्रेतों का निवास है परंतु बाबा शांति से भजन मे लगे रहे। प्रेतों ने बहुत प्रकार से नाच गाना किया और शोर मचाया परंतु बाबा भजन से नही उठे। .अंत मे एक चुड़ैल बाबा के सामने आकर खड़ी हो गयी। श्रीहरेराम बाबा उस स्त्री को पहचानते थे, .वे बोले.. अरे ! तु तो इसी गांव की थी और कुंए मे गिरकर तेरी मृत्यु हो गयी थी। .ब्राह्मण परिवार की बहु होने पर भी तुझे प्रेत योनि कैसे प्राप्त हो गयी। .उसने बताया की जन्म चाहे कितने ही ऊंचे कुल मे हो जाएं पतन्तु आचरण अच्छा न हो तो अधोगति मे जाना पड़ता है। परपुरुष के संग करने के पाप से मुझे प्रेत बनना पड़ा। .मै पातिव्रत का पालन नही कर पाई और बाद मे मैंने आत्महत्या की। मै इस प्रेत योनि मे बडा कष्ट पा रही हूं, आप मेरा उद्धार कीजिये। .बाबा बोले यहां और कितने भूतप्रेत है ? .उस चुड़ैल ने कहा, हमारी संख्या १५ है। .बाबा ने कहा ठीक है मै तुम्हारा उद्धार करने के विषय मे विचार करूँगा। .अगले दिन वह फिर आयी और बोली, बाबा हम पर कृपा करो। .बाबा थोड़े विनोदी स्वभाव के थे, उन्होंने कहा, बातों से उद्धार होता है क्या? उद्धार तो घी से होता है।.हमारा घी समाप्त हो गया है, गौ का घी लाओ, सुखी रोटी भागवान को भोग लगा रहे है। चुड़ैल बोली ठीक है मै अभी घी लेकर आती हूं। .गांव में एक यादव परिवार के मुखिया जी रहते थे। वो चुड़ैल जाकर उनके बहु के शरीर पर चढ़ गयी। अब बहु अजीब अजीब हरकत करने लगी।.एक तंत्र मंत्र करने वाले ओझा को बुलाया गया और जैसे ही उसने मंत्रो का प्रयोग किया तो वह चुड़ैल बोलने लगी, छोडूंगी नही, मै इसको लेकर जाऊंगी। .ओझा जी बोले, इसको छोड़ दो, नई नई शादी हुई है इसकी, इसके प्राण क्यो लेना चाहती हो ? .चुड़ैल ने कहा, नही मै इसको लेकर जाऊंगी। .ओझा ने पूछा, इसको छोड़कर किस प्रकार से जाओगी ? उपाय बताओ। .चुड़ैल बोली, गांव मे एक हरेराम बाबा नामक महात्मा है, उनका घी खत्म हो गया है। भगवान को सुखी रोटी का भोग लगा रहे है, उनके पास गाय का घी पहुंचाओ तो मैं इसको छोड़ कर जाऊंगी। .मुखिया जी के पास ३ किलो गाय का घी था, वह तुरंत सेवक के हाथ से बाबा के पास भिजवाया। जैसे ही बाबा के पास घी पहुंचा, वह चुड़ैल वापस आ गयी।.गांव मे यह बात फैल गयी की यदि बाबा को घी नही दिया तो हमारे घर भी भूतप्रेत भेज देगा। .हर दिन बाबा के यहां पाव भर ताजा घी आने लगा। बाबा उससे संत सेवा भी करने लगे, हलवा, पुरी, चावल आदि मे घी का प्रयोग करते। .कुछ दिन बाद वह चुड़ैल बाबा के पास आकर बोली, बाबा! रोज का घी का प्रबंध तो हो गया, अब हमारा उद्धार करो। .बाबा बोले, तुम्हारा उद्धार कैसे होगा ? .उसने कहा की हमारे लिए यदि शिवपुराण की कथा हो तब हमारा उद्धार होगा। .बाबा ने कहा की ठीक है, जब तुम्हारा उद्धार हो जाए तब हमे अनुभूति करवा कर जाना। .बाबा ने पास में रहने वाले एक ब्राह्मण जानकी प्रसाद चौबे को बुलाया और उनसे बाबा श्री गणेशदास जी के नाम एक पत्र लिखवाया। उसमे घटना लिख दी की इस कार्य के लिए शिवपुराण की कथा करनी है। .बाबा गणेशदास की ने कहा की हमने कभी शिवपुराण की कथा तो कही नही परंतु श्री हरेराम बाबा की आज्ञा है तो कथा करेंगे।.बाबा श्री गणेशदास जी मथुरा से चलकर हरेराम बाबा के पास आये और प्रातः काल महाराज जी मूल पाठ करते थे और संध्याकाल ५ घंटे कथा कहते थे। .कथा के अंतिम दिन एक दिव्य तेज प्रकट हुआ, वे सभी प्रेत दिव्य शरीर धारण करके श्रीहरेराम बाबा के सामने आकर प्रणाम करके बोले... .बाबा ! भगवान शिव के गणो का विमान आ गया है। उनके साथ हम लोग कैलाश को जा रहे है।.४. संतो मे श्रद्धा और भगवत्प्राप्ति का मार्ग...एक बार बाबा गणेशदास जी ने उनका थोड़ा परिचय और कुछ पद एक पुस्तक के रूप में श्री रामानंद पुस्तकालय (सुदामा कुटी ) से प्रकाशित किया। .दिल्ली की एक स्त्री ने वह पुस्तक पढ़ी और सोचा कि इस समय भी ऐसे भगवत्प्राप्त संत विराजमान है तो दर्शन करना ही चाहिए। .वह स्त्री उस पुस्तक पर पता पढ़ कर सुदामा कुटी पहुंची। वहां उस समय राजेंद्रदास जी एवं कुछ अन्य वैष्णव सेवा मे रहते थे। .उस स्त्री ने पूछा की इस पुस्तक मे जिनके पद है, क्या उन संत के दर्शन हो सकते है ? .राजेंद्रदास जी ने कहा, बाबा का अब शरीर वृद्ध हो गया है, चल फिर नही पाते है। .उस स्त्री ने हरेराम बाबा के विषय मे अधिक जानने की इच्छा प्रकट की। राजेंद्रदास जी ने उनकी कुछ अनुभूतियां सुनायी जिस कारण उस स्त्री की श्रद्धा और अधिक बढ़ गयी। .राजेंद्रदास जी ने बाबा से अंदर जाकर कहा की एक भक्तानि दर्शन करने आयी है। .श्री हरेराम बाबा बोले, यहां किसी को मत लाओ, मै नंद धड़ंग रहता हूँ। शरीर पर लंगोटी भी होती नही। .राजेंद्रदास जी बोले, बाबा ! श्रद्धावान स्त्री है, बहुत दर्शन करने की लालसा है। बाबा ने कहा ठीक है।.राजेंद्रदास जी ने श्री हरेराम बाबा के शरीर पर कपड़ा डाल दिया और उस भक्तानि को अंदर लाये। उनसे प्रणाम किया और कुछ सेब और ५१ रुपये भेट मे दिए। .बाबा ने उससे पूछा की वो कहा से आयी है, घर मे कौन कौन है आदि सब। .उसने घर परिवार का सब हाल सुनाया। अंत मे बाबा ने पूछा की तुम्हारा विवाह हुआ की नही ? .उसने कहा की घर परिवार की जिम्मेदारी मुझपर आने की वजह से अब तक विवाह नही हुआ। .बाबा बोले, मै अब विवाह के योग्य नही हूँ, मेरा शरीर अब वृद्ध हो गया है। .स्त्री बोली, बाबा आप ये कैसी बात कर रहे है, मै आपकी नातिन (पोती) जैसी हूं। आप साधु होकर ये कैसी बात करते है। .बाबा बोले, तुम्हे किसने कह दिया की मै साधु हूँ, मै कोई साधु महात्मा नही हूं, मै तो गुंडा और पागल हूं। गुंडा और पागल तो ऐसे बात करता है। .वो स्त्री गड़बड़ा कर नाराज होकर भागने लगी, जाते जाते सब मिठाई, सेब, रुपया भी वापस कर दिया। .राजेंद्रदास जी ने पूछा, बाबा! वह स्त्री श्रद्धा से आपके पास आयी थी, आपने ऐसे बात करके उसको क्यों सब भेट वापस कर दी।.बाबा बोले, मै बूढ़ा हूं परंतु यहां रहने वाले सब संत बूढ़े नही है। विरक्त संतो के यहां अकेले महिलाओं का आना ठीक नही है। .बार बार आना जाना शुरू होगा यह अच्छा नही है, मेरी १०० साल के ऊपर उम्र चल रही है। इतने साल रामजी ने माया से बचाये रखा अब बुढापे मे मैं अपने वैराग्य पर कलंक नही लगा सकता। .इस तरह की बात करने से वह दोबारा आने का प्रयास नही करेगी। .राजेंद्रदासजी ने पूछा, बाबा! अगली बार आ गयी तो ? .बाबा बोले, अबकी बार आयी तो गाली दूंगा। .राजेंद्रदास जी ने पूछा, पुनः गाली खाकर भी आ जाए तो ? .बाबा बोले फिर तो डंडा लेकर उसको भगाऊंगा। .राजेंद्रदासजी ने पूछा, डंडा के डर से भी न मानी तो क्या करेंगे बाबा। यह सुनकर बाबा रोने लगे और कहा की, यदि उसकी ऐसी श्रद्धा संतो के चरणों मे है, तो फिर मैं उसको श्रीकृष्ण से मिलने का रास्ता बता दूंगा।.हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।.५. महारास का दर्शन...एक बार कनक भवन अयोध्या मे महारास का आयोजन किया गया। उस समय श्री हरेराम बाबा और श्री गणेशदास भक्तमाली जी अन्य कुछ संतो के साथ अयोध्या रास का दर्शन करने पधारे। .जैसे ही ठाकुर जी अंतर्ध्यान हुए वैसे ही श्री हरेराम बाबा का शरीर निष्प्राण हो गया। श्वास चलने भी बंद हो गए, सबने कहां बाबा पधार गए इनको सरयू जी ले चलो। .बाबा श्री गणेशदास ने कहां की यह विलक्षण महापुरुष है, जब तक इनके शरीर से दुर्गंध नही आती तब तक अंतिम संस्कार नही करना चाहिए। .अगले दिन पुनः रासलीला आरंभ हुई और श्रीकृष्ण गोपियों के मध्य प्रकट हुए वैसे ही बाबा कूदकर खड़े हुए और हे प्राणनाथ ! हे गोविंद! हा रासबिहारी ! हे गोपीनाथ कहते हुए भगवान के चरणों को पकड़ लिया।.६. श्री द्वारिकलाल दुबे जी को आशीर्वाद...श्री हरेराम बाबा कुछ काल के लिए कोटा, राजस्थान मे विराजे। उस समय बाबा नित्यप्रति कीर्तन करते और लोगो से भी करवाते। .एक दिन बाबा चंबल नदी मे स्नान करने गए थे और उस समय उन्हें चंबल नदी को देखकर यमुना जी का स्मरण हुआ, यमुना जी को देखकर श्री कृष्ण का स्मरण हुआ और भाव आवेश मे आकर वे जल मे कूद गए। .सब लोगो ने सोचा कि नदी का प्रवाह बहुत तीव्र है और गहराई भी अधिक है तो बाबा डूब ही गए होंगे। .मछुआरों की मदद से बड़े बड़े जालो के द्वारा बाबा का शरीर निकाला गया। चिता बनाकर उनके शरीर को अग्नि देने की तैयारी हो रही थी। .कोटा मे ही बाबा के ही एक शिष्य श्री द्वारिकलाल दुबे जी भजन करते थे जो पहले न्यायाधीश के पद पर रह चुके थे और बाद मे नौकरी त्याग कर अपना सारा समय भजन मे रहा करते थे।.उनको श्री रघुनाथ ने भजन करते करते ध्यान मे दर्शन देकर कहां, श्री हरेराम बाबा मेरे नित्यधाम मे आ गए है पर उनका शरीर अभी कुछ काल संसार मे रहना बाकी है, शीघ्र ही उनके शरीर मे प्राणों का संचार होगा, .लोग उनका अंतिम संस्कार करने जा रहे है अतः तुम जाकर उनके शरीर की रक्षा करो। .वे पुलिस लेकर वहां पहुंचे और बाबा के शरीर को अपने घर ले गए। जब घरवालों ने विरोध किया तो वे उनकी दूसरी हवेली मे बाबा का शरीर साथ ले गए और फूल बिछाकर उसपर शरीर को रख दिया। .दीपक जलाकर भजन मे बैठ गए। लगभग १२ घंटे बाद बाबा महामंत्र का उच्चारण करते हुए उठकर बैठ गए। .द्वारिकलाल जी ने ठाकुर जी की आज्ञा सुनायी और पूछा कि बाबा आप नित्यधाम कैसे चले गए ?.बाबा बोले की ठाकुर जी के पार्षद विमान मे आये और मुझे ले गए। भगवान ने पार्षदों से कहां की बाबा से तो धरती पर बहुत से कार्य करवाने है, इनको पुनः धरती पर छोड़ आओ। .तुमने भगवान की आज्ञा का पालन किया है हम तुमपर बहुत प्रसन्न है, जो चाहो वह मांग लो। .द्वारिकलाल जी ने कहां, बाबा मेरी इच्छा है की भगवान के दर्शन और कीर्तन करते हुए मेरा शरीर शांत हो। बाबा ने कहा ठीक है ऐसा ही होगा। .जन्माष्ठमी के पूर्व पर श्री मथुरेश जी के मंदिर मे पैरों मे घुंगरू बांध कर कीर्तन करते हए भगवान का दर्शन करते करते उनके प्राण निकले।.हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।.१९९२ आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी को बाबा श्रीभगवान के धाम पधारे।~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे )))))))~~~~~~~~~~~~~~~~~

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राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By वनिता कासनियां पंजाब श्रीगणेश के अवतारहम सबने भगवान विष्णु के दशावतार और भगवान शंकर के १९ अवतारों के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे "अष्टरूप" कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं।वक्रतुंड: मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड वाले "वक्रतुंड" अवतार लिया और मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

*हनुमानजी की दिव्य उधारी!!!!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान 🙏🙏❤️*पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।* *रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!**अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।**माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!**कछुक दिवस जननी धरु धीरा।**कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।**निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।**तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥**मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए,आप किसी और से बुलवा लो।**अब बारी आई लक्षमण जी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था।**प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।**आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।**ये जो खड़ा है ना , वो हनुमानजी का लक्ष्मण है। मै कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमानजी अयोध्या से चले जाएं!**अब बारी आई भरत जी की, अरे! भरत जी तो इतना रोए, कि रामजी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पर, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो!**और दूसरी बात ये कि...!**बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।* *अधम कवन जग मोहि समाना॥**मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमानजी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!**रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।**सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥**मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमानजी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।**अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमानजी को अयोध्या से निकालने के लिए, जिन्होंने ने माता सीता, लक्षमण भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो! किसी अच्छे काम के लिए कहते तो बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।**अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार,* *माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों ये स्वामी है, और देखती हूं आप हनुमानजी से सकुचाते है।और आप खुद भी कहते हो कि...!**प्रति उपकार करौं का तोरा।* *सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥**आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु! राघवजी ने कहा देवी कर्जदार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो**सनमुख होइ न सकत मन मोरा**देवी! हनुमानजी का कर्जा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ्य राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है। क्योंकि कर्जा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो हनुमानजी का कर्जा कैसे उतारा जा सकता है।**पहले हनुमान विवाह करें*,*लंकेश हरें इनकी जब नारी।**मुदरी लै रघुनाथ चलै,निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।**अायि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।**तब रघुनाथ चुकायि सकें, ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।**देवी! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्जा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!**"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"**मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमानजी भी कुछ मांग लें।**दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए,सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमानजी क्या मांगेंगे, और रामजी क्या देंगे।**रामजी ने हनुमान जी से कहा! सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद,अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?**हनुमानजी बोले! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!**"तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना"**तो फिर यदि मै दो पद मांगू तो..?**सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमानजी भी ठीक ही कह रहे हैं। रामजी ने कहा! ठीक है, मांग लो, सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमानजी का कर्जा चुकता हुआ।**हनुमानजी ने कहा! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमे राजमद की शंका हो, तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए...?**हनुमानजी ने रामजी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।**हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।**नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।**जानकी जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राघवजी बोले, लो उतर गया हनुमानजी का कर्जा!**और अभी तक जिसको बोलना था, सब बोल चुके है, अब जो मै बोलता हूं उसे सब सुनो, रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले...!*#Vnita🙏🙏❤️*"हे! भरत भैया' कपि से उऋण हम नाही"*........*हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म लेे लें, #हनुमानजी से उऋण नही हो सकते।* *जय #श्री #हनुमान जी #महाराज की जय*

*हनुमानजी की दिव्य उधारी!!!!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️ *पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।*  *रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!* *अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।* *माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!* *कछुक दिवस जननी धरु धीरा।* *कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।* *निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।* *तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥* *मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जान...