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सुन्दरकाण्डहनुमान जी का समुद्र पार करना ! सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 44-77, वायुमार्ग से जाते हुए हनुमान जी के बिजली की तरह चमकते हुए By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब:🥦🌹🙏🙏🌹🥦श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्, सुन्दरकाण्ड सर्ग 1, श्लोक 44-77, Sunderkanda Pratham Sarg shlok 44 se 76, उत्पपाताथ वेगेन वेगवानविचारयन् । सुपर्णमिव चात्मानं मेने स कपिकुञ्जरः ॥४४॥ मार्ग के विघ्नों की कुछ भी परवाह न कर, वेगवान् हनुमान जी अत्यन्त वेग से कूदे और उस समय अपने को गरुड़ के तुल्य समझा ॥४४॥ उस समय हनुमान जी के छलांग भरते ही, उस पहाड़ के पेड मय पत्तों और डालियों के चारों ओर से इनके पीछे बड़े वेग से चले ॥ ४५ ॥ Sunderkanda-Pratham-sarg-shlok-44-se-60हनुमान जी किस समय लंका पहुंचे थे, हनुमान जी का समुद्र पार करना, हनुमान जी लंका कितनी बार गए, रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश क्यों दिया?स मत्तकोयष्टिमकान्पादपान्पुष्पशालिनः । उद्वहन्नरुवेगेन जगाम विमलेऽम्बरे ॥ ४६॥ हनुमान जी पक्षियों से युक्त और पुष्पित वृक्षों को अपनी जाँघों के वेग से अपने साथ लिये हुए विमल श्राकाश में गये ॥ ४६ ॥ ऊरुवेगोद्धता वृक्षा मुहूर्त कपिमन्वयुः । प्रस्थितं दीघमध्वानं स्वबन्धुमिव बान्धवाः ॥४७॥ जांधों के वेग से उड़े हुए वे पेड़, कुछ ही देर तक हनुमान जी के पीछे पीछे गये । तदनन्तर जिस प्रकार दूर देश की यात्रा करने वाले बन्धु के पीछे उसके भाईबंद कुछ दूर तक जाकर लौट आते हैं उसी प्रकार ये वृक्ष भी हनुमान जी को थोड़ी दूर पहुँचा कर लौटे ॥४७॥ तिदूरुवेगोन्मथिताः सालाश्चान्ये नगोत्तमाः । - अनुजग्मुर्हनूमन्तं सैन्या इव महीपतिम् ॥४८॥ हनुमान जी की जाँघों के वेग से उखड़े हुए साल आदि के बड़े बड़े पेड़ उनके पीछे वैसे ही चले जाते थे, जैसे राजा के पीछे पीछे सेना चलती है ॥ ४८ ॥ सुपुष्पिता...बहुभिः पादपैरन्वितः कपिः । हनूमान्पर्वताकारो बभूवाद्भुतदर्शनः ॥ ४९ ॥ उस समय अनेक फूले हुए वृक्षों से, पिछयाये हुए एवं पर्वता कार हनुमान जी का अद्भुत रूप देख पड़ा ॥ ४६ ॥ सारवन्तोऽथ ये वृक्षा न्यमज्जैल्लवणाम्भसि । भयादिव महेन्द्रस्य पर्वता वरुणालये ॥ ५० ॥ हनुमान जी के पोछे उड़ने वाले वृक्षों में जो भारी पेड़ थे, वे समुद्र में गिर कर वैसे ही डूब गये जैसे इन्द्र के भय से पहाड़ समुद्र में डूबे थे ॥ ५० ॥ स नानाकुसुमैः कीर्णः कपि साङ्कुरकोरकैः । शुशुभे मेघसङ्काशः खद्योतैरिव पर्वतः ।। ५१ ॥ उन पेड़ों के फूलों, अङ्करों और कलियों से उन मेघ के समान कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ऐसे शोभायमान हो रहे थे, जैसे कि जुगुनुथों से कोई पर्वत शोभायमान होता है ॥ ५१॥ विमुक्तास्तस्य वेगेन मुक्त्वा पुष्पाणि ते द्रुमाः । अवशीर्यन्त सलिले निवृत्ताः सुहृदो यथा ॥ ५२ ॥ हनुमान जी के गमनधेग से छूट कर, वे वृक्ष अपने फूलों को गिरा कर और तितर बितर हो समुद्र के जल में उसी प्रकार गिरे, जिस प्रकार किसी अपने बंधुजन को पहुँचा कर, सुहृद् लोग तितर वितर हो जाते हैं ॥ ५२ ॥ हनुमान जी के गमनवेग से उत्पन्न पवन द्वारा प्रेरित वृक्षों के विविध प्रकार के पुष्प, हल्के होने के कारण समुद्र में विचित्र रीति से गिर कर शोभित होते थे ॥ ५३ ॥ ताराशतमिवाकाशं प्रबभौ स महार्णवः । पुष्पौघेणानुविद्धेन नानावर्णेन वानरः ॥ ५४॥ बभौ मेघ इवाकाशे विद्युद्गणविभूषितः । कि तस्य वेगसमुद्भूतैः पुष्पैस्तोयमदृश्यत ॥ ५५॥ ताराभिरभिरामाभिरुदिताभिरिवाम्बरम् । तस्याम्बरगतौ बाहू ददृशाते प्रसारितौ ॥ ५६ ॥उन फूलों के गिरने से समुद्र, सहस्रों ताराओं से शोभित आकाश की तरह जान एड़ता था । सुगन्धयुक्त और रंग बिरंगे पुष्पों से कपिश्रेष्ठ हनुमान ऐसे शोभित हुए जैसे बिजुली की रेखाओं से मण्डित आकाशस्थित मेव शोभित होता है। जिस प्रकार आकाशमण्डल उदय हुए सुन्दर तारागा के गुच्छों से सज जाता है। उसी प्रकार समुद्र का जल हनुमान जी के गमनवेग से उड़ कर गिरे हुए पुष्पों से शोभित होने लगा। उस समय हनुमान जी के पसारे हुए हाथ आकाश में ऐसे जान पड़े ॥ ५४॥ ५५ ॥ ५६ पर्वताग्राद्विनिष्क्रान्तौ पञ्चास्याविव पन्नगौ ।' पिबन्निव बभौ श्रिीमान्सोर्मिमालं महार्णवम् ॥ ५७ ॥ मानों पर्वत के शिखर से पाँच सिरों वाले दो सांप निकल रहे हो । आकाश में जाते समय हनुमान जी जब नोचे को मुख करते थे, तब ऐसा जान पड़ता था कि, मानों तरङ्गों से युक्त समुद्र को पी डालना चाहते हैं ॥ ५७ ।। । पिपासुरिव चाकाशं ददृशे स महाकपिः । तस्य विद्यत्प्रभाकारे वायुमार्गानुसारिणः ॥ ५८॥ और जब वे ऊपर को मुख उठा कर चलते तब ऐसा जान पड़ता मानों वे श्राकाश को पी जाना चाहते हैं। वायुमार्ग से जाते हुए हनुमान जी के बिजली की तरह चमकते हुए ॥ ५८ ॥ नयने सम्प्रकाशेते पर्वतस्थाविवानलो। पिङ्गे पिङ्गाक्षमुख्यस्य बृहती परिमण्डले ॥ ५९॥ दोनों नेत्र ऐसे देख पड़ते थे जैसे पर्वत पर दो ओर से दावानल लगा हो । उनकी पोली पीली और बड़ी बड़ी ॥ ५६ ॥ -चक्षुषी सम्प्रकाशेते चन्द्रसूर्याविवाम्बरे । मुखं नासिकया तस्य ताम्रया ताम्रमावभौ ॥ ६० ॥ आँखें चन्द्रमा और सूर्य को तरह चमक रही थीं। लाल नाक और हनुमान जी का लाल लाल मुखमण्डल ॥ ६० ॥ Sunderkanda Pratham Sarg shlok 44 se 76 सन्ध्यया समभिस्पृष्टं यथा सूर्यस्य मण्डलम् । लागूलं च समाविद्धं प्लवमानस्य शोभते ॥ ६१ ॥ अम्बरे वायुपुत्रस्य शक्रध्वज इवोच्छ्रितः । लागूलचक्रेण महाशुक्लदंष्ट्रोऽनिलात्मजः ॥ ६२॥ सन्ध्याकालीन सूर्यमण्डल की तरह शोभायमान हो रहा था। श्राकाशमार्ग से जाते समय हनुमान जी की हिलती हुई पूँछ ऐसी शोभायमान हो रही थी, जैसे आकाश में इन्द्रध्वज । फिर जब कभी वे अपनी पूछ को मण्डलाकार कर लेते थे, तब मुख के सफेद दांतों के साथ उनकी छबि ऐसी जान पड़ती थी; ॥६१॥६२ ॥ प्रथमः सर्गः व्यरोचत महाप्राज्ञः परिवेषीव भास्करः । स्फिग्देशेनाभिताम्रण रराज स महाकपिः ॥ ६३ ॥ महता दारितेनेव गिरिगैरिकयातुना। तस्य वानरसिंहस्य प्लवमानस्य सागरम् ॥ ६४॥ जैसी कि, सूर्य में मण्डल पड़ने से सूर्य की इबि जान पड़ती है। उनकी कमर का पिछला भाग अत्यधिक लाल होने के कारण ऐसा जान पड़ता था, मानों पर्वत में गेरू की खान खुली पड़ी दो । कपिसिंह हनुमान जी के समुद्र लाँघने के समय ।। ६३ ॥६४ ॥ कक्षान्तरगतो वायुर्जीमूत इव गर्जति । खे यथा निपतन्त्युल्का झुत्तरान्ताद्विनिःसृता ॥ ६५ ॥ उनकी दोनों बगलों में से वायु के निकलने का ऐसा शब्द होता था जैसा कि, मेघ के गर्जने से होता है । उस समय वेगवान कपि ऐसे देख पड़े, जैसे उत्तर दिशा से एक बड़ा अग्नि का लुक्का दूसरे एक छोटे लुक्के के साथ दक्षिण की ओर चला जाता हो ।। ६५ ।। दृश्यते सानुबन्धा च तथा स कपिकुञ्जरः । पतत्पतङ्गसङ्काशो व्यायतः शुशुभे कपिः ॥ ६६ ॥ प्रवृद्ध इव मातङ्गः कक्ष्यया बध्यमानया । उपरिष्टाच्छरीरेण च्छायया चावगाढया ॥ ६७॥ सागरे मारुताविष्टा नौरिवासीत्तदा कपिः । यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः॥ ६८॥ तब जाते हुए सूर्य की तरह बड़े आकार वाले कपिश्रेष्ठ हनुमान जी अपनी पूक सहित कमर में रस्ता बंधे हुए महागज की तरह शोभायमान होने लगे। आकाश में उड़ते हुए हनुमान जी के बड़े शरीर और समुद्र के जल में पड़ी हुई उसकी छाया. दोनों मिलकर ऐसी शोभा दे रहे थे, जैसी वायु के झोंको से काँपती हुई नौका शोभा देती है। हनुमान जो समुद्र के जिस भाग में पहुँचते ।। ६६ ॥ ६७ ॥ ६८।। स स तस्योरुवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते । सागरस्यार्मिजालानि उरसा शैलवर्मणा ॥ ६९ ॥ वहाँ वहाँ का समुद्र का भाग खलबलाता हुआ सा जान पड़ता था । वे पर्वत के समान अपने वक्षस्थ न से समुद्र की लहरों को ढकेलते हुए चले जाते थे ।। ६९ ।। नोट-इस वर्णन से जान पड़ता है कि, हनुमान जी समुद्र के जल की सतह से बहुत ऊंचे नहीं उड़े थे ।अभिन्न स्तु महावेगः पुप्लुबे स महाकपिः । कपिवातश्च बलवान्मेघवातश्च निःसृतः ॥ ७० ।। सागरं भीमनिर्घोष कम्पयामासतुभृशम् । विकर्षनर्मिजालानि बृहन्ति लवणाम्भसि ॥ ७१ ॥ पुप्लुवे कपिशार्दूलो विकिरन्निव रोदसी । मेरुमन्दरसङ्काशानुगतान्स महार्णवे ।। ७२ ॥अतिक्रामन्महावेगस्तरङ्गान्गणयन्निव । तस्य वेगसमुद्धतं जलं सजलदं तदा ॥७३॥ एक तो हनुमान जी के वेग से जाने के कारण उत्पन्न वायु और दूसरा मेघों से उत्पन्न हुआ वायु-दोनों ही उस महागर्जन करते हुए समुद्र को सुब्ध कर रहे थे । इस प्रकार वे क्षार समुद्र की लहरों को चीरते हनुमान जी मानों आकाश और भूमि को अलगाते हुए चले जाते थे। इसी प्रकार मेरु और मन्दराचल पर्वत की तरह ऊँची ऊँची समुद्र की लहरों को नांघते हुए वे ऐसे उड़े चले जाते थे, मानों वे तरङ्गों को गिनते हुए जाते हों। उस समय कपि के तेजी के साथ जाने के कारण उड़ा हुया समुद्र का जल ॥ ७० ॥ ७१ ॥ ७२ ।। ७३ ॥ अम्बरस्थं विबभ्राज शारदाभ्रमिवाततम् । तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विकृतास्तदा ॥ ७४ ॥ और मेघ-(दोनों) आकाश में ऐसे शोभायमान जान पड़ते थे जैसे शरत्कालीन मेघ शोभायमान होते हैं । समुद्र में रहने वाले तिमि जाति के मत्स्य, मगर, अन्य प्रकार के मत्स्य तथा कछवे जल के ऊपर देख पड़ते थे अर्थात् जल के ऊपर निकल आये थे ।। ७४॥ वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् । प्लवमानं समीक्ष्याथ भुजङ्गाः सागरालयाः ॥ ७५ ॥ व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्ण इति मेनिरे। दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशयोजनमायता ॥ ७६अतिक्रामन्महावेगस्तरङ्गान्गणयन्निव । तस्य वेगसमुद्धृतं जलं सजलदं तदा ॥७३॥ एक तो हनुमान जी के वेग से जाने के कारण उत्पन्न वायु और दूसरा मेघों से उत्पन्न हुआ वायु-दोनों ही उस महागर्जन करते हुए समुद्र को तुन्ध कर रहे थे । इस प्रकार वे क्षार समुद्र की लहरों को चीरते हनुमान जी माने आकाश और भूमि को अलगाते हुए चले जाते थे। इसी प्रकार मेरु और मन्दराचल पर्वत की तरह ऊँची ऊँची समुद्र की लहरों को नांघते हुए वे ऐसे उड़े चले जाते थे, मानों वे तरङ्गों को गिनते हुए जाते हों। उस समय कपि के तेजी के साथ जाने के कारण उड़ा हुआ समुद्र का जल ॥ ७० ॥ ७१ ।। ७२ ।। ७३॥ अम्बरस्थं विवभ्राज शारदाभ्रमिवाततम् । तिमिनक्रमषाः कूर्मा दृश्यन्ते विकृतास्तदा ॥ ७४॥ और मेघ-(दोनों) आकाश में ऐसे शोभायमान जान पड़ते थे जैसे शरत्कालीन मेघ शोभायमान होते हैं । समुद्र में रहने वाले तिमि जाति के मत्स्य, मगर, अन्य प्रकार के मत्स्य तथा कछवे जल के ऊपर देख पड़ते थे अर्थात् जज के ऊपर निकल आये थे ॥ ७४ ॥ वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् । प्लवमानं समीक्ष्याथ भुजङ्गाः सागरालयाः॥ ७५ ॥व्योनि तं कपिशार्दूलं सुपर्ण इति मेनिरे । दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशद्योजनमायता ॥ ७६ ॥वे जल जन्तु ऐसे जान पड़ते थे जैसे मनुष्य का शरोर कपड़ा उतार लेने पर देख पड़ता है । समुद्र में रहने वाले सर्पो ने हनुमान जी को आकाश में उड़ते देख जाना कि, गरुड़ जी उड़े हुए चले जाते हैं । दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी ।। ७५ ।। ७६ ।। छाया वानरसिंहस्य जले चारुतराऽभवत् । का श्वेताम्रधनराजीव वायुपुत्रानुगामिनी ॥ ७७ ॥ तस्य सा शुशुभे छाया वितता लवणाम्भसि । शुशुभे स महातेजा महाकायो महाकपिः ॥ ७८॥ हनुमान जी के शरीर की छाया समुद्रजल में अत्यन्त शोभाय मान जान पड़ती थी। पवननन्दन हनुमान जी के शरीर की अनु गामिनी छाया, समुद्र के जल में पड़ने से सफेद रंग के बड़े बादल की तरह मुन्दर जान पड़ती थी। वे महातेजस्वी और विशाल काय महाकपि ।। ७७ ॥ ७८ ।। By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब:🥦🌹🙏🙏🌹🥦सुन्दरकाण्ड सर्ग 1, श्लोक 1-40,Tags:सुन्दरकाण्ड

हनुमान जी का समुद्र पार करना ! सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 44-77, वायुमार्ग से जाते हुए हनुमान जी के बिजली की तरह चमकते हुए

श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम्, सुन्दरकाण्ड सर्ग 1, श्लोक 44-77, Sunderkanda Pratham Sarg shlok 44 se 76, 


उत्पपाताथ वेगेन वेगवानविचारयन् । सुपर्णमिव चात्मानं मेने स कपिकुञ्जरः ॥४४॥ 

मार्ग के विघ्नों की कुछ भी परवाह न कर, वेगवान् हनुमान जी अत्यन्त वेग से कूदे और उस समय अपने को गरुड़ के तुल्य समझा ॥४४॥ 

उस समय हनुमान जी के छलांग भरते ही, उस पहाड़ के पेड मय पत्तों और डालियों के चारों ओर से इनके पीछे बड़े वेग से चले ॥ ४५ ॥ 


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हनुमान जी किस समय लंका पहुंचे थे, हनुमान जी का समुद्र पार करना, हनुमान जी लंका कितनी बार गए, रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश क्यों दिया?


स मत्तकोयष्टिमकान्पादपान्पुष्पशालिनः । उद्वहन्नरुवेगेन जगाम विमलेऽम्बरे ॥ ४६॥ 

हनुमान जी पक्षियों से युक्त और पुष्पित वृक्षों को अपनी जाँघों के वेग से अपने साथ लिये हुए विमल श्राकाश में गये ॥ ४६ ॥ 


ऊरुवेगोद्धता वृक्षा मुहूर्त कपिमन्वयुः । प्रस्थितं दीघमध्वानं स्वबन्धुमिव बान्धवाः ॥४७॥ 


जांधों के वेग से उड़े हुए वे पेड़, कुछ ही देर तक हनुमान जी के पीछे पीछे गये । तदनन्तर जिस प्रकार दूर देश की यात्रा करने वाले बन्धु के पीछे उसके भाईबंद कुछ दूर तक जाकर लौट आते हैं उसी प्रकार ये वृक्ष भी हनुमान जी को थोड़ी दूर पहुँचा कर लौटे ॥४७॥ 


तिदूरुवेगोन्मथिताः सालाश्चान्ये नगोत्तमाः । - अनुजग्मुर्हनूमन्तं सैन्या इव महीपतिम् ॥४८॥ 


हनुमान जी की जाँघों के वेग से उखड़े हुए साल आदि के बड़े बड़े पेड़ उनके पीछे वैसे ही चले जाते थे, जैसे राजा के पीछे पीछे सेना चलती है ॥ ४८ ॥ 


सुपुष्पिता...बहुभिः पादपैरन्वितः कपिः । हनूमान्पर्वताकारो बभूवाद्भुतदर्शनः ॥ ४९ ॥ 

उस समय अनेक फूले हुए वृक्षों से, पिछयाये हुए एवं पर्वता कार हनुमान जी का अद्भुत रूप देख पड़ा ॥ ४६ ॥ 


सारवन्तोऽथ ये वृक्षा न्यमज्जैल्लवणाम्भसि । भयादिव महेन्द्रस्य पर्वता वरुणालये ॥ ५० ॥ 


हनुमान जी के पोछे उड़ने वाले वृक्षों में जो भारी पेड़ थे, वे समुद्र में गिर कर वैसे ही डूब गये जैसे इन्द्र के भय से पहाड़ समुद्र में डूबे थे ॥ ५० ॥ 


स नानाकुसुमैः कीर्णः कपि साङ्कुरकोरकैः । शुशुभे मेघसङ्काशः खद्योतैरिव पर्वतः ।। ५१ ॥ 

उन पेड़ों के फूलों, अङ्करों और कलियों से उन मेघ के समान कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ऐसे शोभायमान हो रहे थे, जैसे कि जुगुनुथों से कोई पर्वत शोभायमान होता है ॥ ५१॥ 


विमुक्तास्तस्य वेगेन मुक्त्वा पुष्पाणि ते द्रुमाः । अवशीर्यन्त सलिले निवृत्ताः सुहृदो यथा ॥ ५२ ॥ 

हनुमान जी के गमनधेग से छूट कर, वे वृक्ष अपने फूलों को गिरा कर और तितर बितर हो समुद्र के जल में उसी प्रकार गिरे, जिस प्रकार किसी अपने बंधुजन को पहुँचा कर, सुहृद् लोग तितर वितर हो जाते हैं ॥ ५२ ॥ 

हनुमान जी के गमनवेग से उत्पन्न पवन द्वारा प्रेरित वृक्षों के विविध प्रकार के पुष्प, हल्के होने के कारण समुद्र में विचित्र रीति से गिर कर शोभित होते थे ॥ ५३ ॥ 



ताराशतमिवाकाशं प्रबभौ स महार्णवः ।  पुष्पौघेणानुविद्धेन नानावर्णेन वानरः ॥ ५४॥ 
बभौ मेघ इवाकाशे विद्युद्गणविभूषितः । कि तस्य वेगसमुद्भूतैः पुष्पैस्तोयमदृश्यत ॥ ५५॥ ताराभिरभिरामाभिरुदिताभिरिवाम्बरम् ।  तस्याम्बरगतौ बाहू ददृशाते प्रसारितौ ॥ ५६ ॥


उन फूलों के गिरने से समुद्र, सहस्रों ताराओं से शोभित आकाश की तरह जान एड़ता था । सुगन्धयुक्त और रंग बिरंगे पुष्पों से कपिश्रेष्ठ हनुमान ऐसे शोभित हुए जैसे बिजुली की रेखाओं से मण्डित आकाशस्थित मेव शोभित होता है। जिस प्रकार आकाशमण्डल उदय हुए सुन्दर तारागा के गुच्छों से सज जाता है। उसी प्रकार समुद्र का जल हनुमान जी के गमनवेग से उड़ कर गिरे हुए पुष्पों से शोभित होने लगा। उस समय हनुमान जी के पसारे हुए हाथ आकाश में ऐसे जान पड़े ॥ ५४॥ ५५ ॥ ५६ 


पर्वताग्राद्विनिष्क्रान्तौ पञ्चास्याविव पन्नगौ ।' पिबन्निव बभौ श्रिीमान्सोर्मिमालं महार्णवम् ॥ ५७ ॥ 

मानों पर्वत के शिखर से पाँच सिरों वाले दो सांप निकल रहे हो । आकाश में जाते समय हनुमान जी जब नोचे को मुख करते थे, तब ऐसा जान पड़ता था कि, मानों तरङ्गों से युक्त समुद्र को पी डालना चाहते हैं ॥ ५७ ।। । 


पिपासुरिव चाकाशं ददृशे स महाकपिः । तस्य विद्यत्प्रभाकारे वायुमार्गानुसारिणः ॥ ५८॥ 


और जब वे ऊपर को मुख उठा कर चलते तब ऐसा जान पड़ता मानों वे श्राकाश को पी जाना चाहते हैं। वायुमार्ग से जाते हुए हनुमान जी के बिजली की तरह चमकते हुए ॥ ५८ ॥ 


नयने सम्प्रकाशेते पर्वतस्थाविवानलो। पिङ्गे पिङ्गाक्षमुख्यस्य बृहती परिमण्डले ॥ ५९॥ 

दोनों नेत्र ऐसे देख पड़ते थे जैसे पर्वत पर दो ओर से दावानल लगा हो । उनकी पोली पीली और बड़ी बड़ी ॥ ५६ ॥ -


चक्षुषी सम्प्रकाशेते चन्द्रसूर्याविवाम्बरे । मुखं नासिकया तस्य ताम्रया ताम्रमावभौ ॥ ६० ॥ 


आँखें चन्द्रमा और सूर्य को तरह चमक रही थीं। लाल नाक और हनुमान जी का लाल लाल मुखमण्डल ॥ ६० ॥ 


Sunderkanda Pratham Sarg shlok 44 se 76 
सन्ध्यया समभिस्पृष्टं यथा सूर्यस्य मण्डलम् । लागूलं च समाविद्धं प्लवमानस्य शोभते ॥ ६१ ॥ अम्बरे वायुपुत्रस्य शक्रध्वज इवोच्छ्रितः । लागूलचक्रेण महाशुक्लदंष्ट्रोऽनिलात्मजः ॥ ६२॥ 


सन्ध्याकालीन सूर्यमण्डल की तरह शोभायमान हो रहा था। श्राकाशमार्ग से जाते समय हनुमान जी की हिलती हुई पूँछ ऐसी शोभायमान हो रही थी, जैसे आकाश में इन्द्रध्वज । फिर जब कभी वे अपनी पूछ को मण्डलाकार कर लेते थे, तब मुख के सफेद दांतों के साथ उनकी छबि ऐसी जान पड़ती थी; ॥६१॥६२ ॥ 


प्रथमः सर्गः 

व्यरोचत महाप्राज्ञः परिवेषीव भास्करः । स्फिग्देशेनाभिताम्रण रराज स महाकपिः ॥ ६३ ॥ महता दारितेनेव गिरिगैरिकयातुना। तस्य वानरसिंहस्य प्लवमानस्य सागरम् ॥ ६४॥ 


जैसी कि, सूर्य में मण्डल पड़ने से सूर्य की इबि जान पड़ती है। उनकी कमर का पिछला भाग अत्यधिक लाल होने के कारण ऐसा जान पड़ता था, मानों पर्वत में गेरू की खान खुली पड़ी दो । कपिसिंह हनुमान जी के समुद्र लाँघने के समय ।। ६३ ॥६४ ॥ 


कक्षान्तरगतो वायुर्जीमूत इव गर्जति । खे यथा निपतन्त्युल्का झुत्तरान्ताद्विनिःसृता ॥ ६५ ॥ 

उनकी दोनों बगलों में से वायु के निकलने का ऐसा शब्द होता था जैसा कि, मेघ के गर्जने से होता है । उस समय वेगवान कपि ऐसे देख पड़े, जैसे उत्तर दिशा से एक बड़ा अग्नि का लुक्का दूसरे एक छोटे लुक्के के साथ दक्षिण की ओर चला जाता हो ।। ६५ ।। 


दृश्यते सानुबन्धा च तथा स कपिकुञ्जरः । पतत्पतङ्गसङ्काशो व्यायतः शुशुभे कपिः ॥ ६६ ॥ प्रवृद्ध इव मातङ्गः कक्ष्यया बध्यमानया । उपरिष्टाच्छरीरेण च्छायया चावगाढया ॥ ६७॥ सागरे मारुताविष्टा नौरिवासीत्तदा कपिः । यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः॥ ६८॥ 


तब जाते हुए सूर्य की तरह बड़े आकार वाले कपिश्रेष्ठ हनुमान जी अपनी पूक सहित कमर में रस्ता बंधे हुए महागज की तरह शोभायमान होने लगे। आकाश में उड़ते हुए हनुमान जी के बड़े शरीर और समुद्र के जल में पड़ी हुई उसकी छाया. दोनों मिलकर ऐसी शोभा दे रहे थे, जैसी वायु के झोंको से काँपती हुई नौका शोभा देती है। हनुमान जो समुद्र के जिस भाग में पहुँचते ।। ६६ ॥ ६७ ॥ ६८।। 


स स तस्योरुवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते । सागरस्यार्मिजालानि उरसा शैलवर्मणा ॥ ६९ ॥ 

वहाँ वहाँ का समुद्र का भाग खलबलाता हुआ सा जान पड़ता था । वे पर्वत के समान अपने वक्षस्थ न से समुद्र की लहरों को ढकेलते हुए चले जाते थे ।। ६९ ।। 


नोट-इस वर्णन से जान पड़ता है कि, हनुमान जी समुद्र के जल की सतह से बहुत ऊंचे नहीं उड़े थे ।


अभिन्न स्तु महावेगः पुप्लुबे स महाकपिः । कपिवातश्च बलवान्मेघवातश्च निःसृतः ॥ ७० ।। 
सागरं भीमनिर्घोष कम्पयामासतुभृशम् । विकर्षनर्मिजालानि बृहन्ति लवणाम्भसि ॥ ७१ ॥ 
पुप्लुवे कपिशार्दूलो विकिरन्निव रोदसी । मेरुमन्दरसङ्काशानुगतान्स महार्णवे ।। ७२ ॥अतिक्रामन्महावेगस्तरङ्गान्गणयन्निव । तस्य वेगसमुद्धतं जलं सजलदं तदा ॥७३॥ 



एक तो हनुमान जी के वेग से जाने के कारण उत्पन्न वायु और दूसरा मेघों से उत्पन्न हुआ वायु-दोनों ही उस महागर्जन करते हुए समुद्र को सुब्ध कर रहे थे । इस प्रकार वे क्षार समुद्र की लहरों को चीरते हनुमान जी मानों आकाश और भूमि को अलगाते हुए चले जाते थे। इसी प्रकार मेरु और मन्दराचल पर्वत की तरह ऊँची ऊँची समुद्र की लहरों को नांघते हुए वे ऐसे उड़े चले जाते थे, मानों वे तरङ्गों को गिनते हुए जाते हों। उस समय कपि के तेजी के साथ जाने के कारण उड़ा हुया समुद्र का जल ॥ ७० ॥ ७१ ॥ ७२ ।। ७३ ॥ 


अम्बरस्थं विबभ्राज शारदाभ्रमिवाततम् । तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विकृतास्तदा ॥ ७४ ॥ 


और मेघ-(दोनों) आकाश में ऐसे शोभायमान जान पड़ते थे जैसे शरत्कालीन मेघ शोभायमान होते हैं । समुद्र में रहने वाले तिमि जाति के मत्स्य, मगर, अन्य प्रकार के मत्स्य तथा कछवे जल के ऊपर देख पड़ते थे अर्थात् जल के ऊपर निकल आये थे ।। ७४॥ 


वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् । प्लवमानं समीक्ष्याथ भुजङ्गाः सागरालयाः ॥ ७५ ॥ 
व्योम्नि तं कपिशार्दूलं सुपर्ण इति मेनिरे। दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशयोजनमायता ॥ ७६
अतिक्रामन्महावेगस्तरङ्गान्गणयन्निव । तस्य वेगसमुद्धृतं जलं सजलदं तदा ॥७३॥ 


एक तो हनुमान जी के वेग से जाने के कारण उत्पन्न वायु और दूसरा मेघों से उत्पन्न हुआ वायु-दोनों ही उस महागर्जन करते हुए समुद्र को तुन्ध कर रहे थे । इस प्रकार वे क्षार समुद्र की लहरों को चीरते हनुमान जी माने आकाश और भूमि को अलगाते हुए चले जाते थे। इसी प्रकार मेरु और मन्दराचल पर्वत की तरह ऊँची ऊँची समुद्र की लहरों को नांघते हुए वे ऐसे उड़े चले जाते थे, मानों वे तरङ्गों को गिनते हुए जाते हों। उस समय कपि के तेजी के साथ जाने के कारण उड़ा हुआ समुद्र का जल ॥ ७० ॥ ७१ ।। ७२ ।। ७३॥ 


अम्बरस्थं विवभ्राज शारदाभ्रमिवाततम् । तिमिनक्रमषाः कूर्मा दृश्यन्ते विकृतास्तदा ॥ ७४॥ 


और मेघ-(दोनों) आकाश में ऐसे शोभायमान जान पड़ते थे जैसे शरत्कालीन मेघ शोभायमान होते हैं । समुद्र में रहने वाले तिमि जाति के मत्स्य, मगर, अन्य प्रकार के मत्स्य तथा कछवे जल के ऊपर देख पड़ते थे अर्थात् जज के ऊपर निकल आये थे ॥ ७४ ॥ 


वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् । प्लवमानं समीक्ष्याथ भुजङ्गाः सागरालयाः॥ ७५ ॥
व्योनि तं कपिशार्दूलं सुपर्ण इति मेनिरे । दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशद्योजनमायता ॥ ७६ ॥

वे जल जन्तु ऐसे जान पड़ते थे जैसे मनुष्य का शरोर कपड़ा उतार लेने पर देख पड़ता है । समुद्र में रहने वाले सर्पो ने हनुमान जी को आकाश में उड़ते देख जाना कि, गरुड़ जी उड़े हुए चले जाते हैं । दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी ।। ७५ ।। ७६ ।। 


छाया वानरसिंहस्य जले चारुतराऽभवत् । का श्वेताम्रधनराजीव वायुपुत्रानुगामिनी ॥ ७७ ॥ 


तस्य सा शुशुभे छाया वितता लवणाम्भसि । शुशुभे स महातेजा महाकायो महाकपिः ॥ ७८॥ हनुमान जी के शरीर की छाया समुद्रजल में अत्यन्त शोभाय मान जान पड़ती थी। पवननन्दन हनुमान जी के शरीर की अनु गामिनी छाया, समुद्र के जल में पड़ने से सफेद रंग के बड़े बादल की तरह मुन्दर जान पड़ती थी। वे महातेजस्वी और विशाल काय महाकपि ।। ७७ ॥ ७८ ।। 

By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब:🥦🌹🙏🙏🌹🥦

सुन्दरकाण्ड सर्ग 1, श्लोक 1-40,

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उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

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