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रामायण – मनका 108 images ramayan इस पाठ की एक माला प्रतिदिन करने से मनोकामना पूर्ण होती है, ऎसा माना गया है.रघुपति राघव राजाराम ।पतितपावन सीताराम ।।जय रघुनन्दन जय घनश्याम ।पतितपावन सीताराम ।।भीड़ पड़ी जब भक्त पुकारे ।दूर करो प्रभु दु:ख हमारे ।।दशरथ के घर जन्मे राम ।पतितपावन सीताराम ।। 1 ।।विश्वामित्र मुनीश्वर आये ।दशरथ भूप से वचन सुनाये ।।संग में भेजे लक्ष्मण राम ।पतितपावन सीताराम ।। 2 ।।वन में जाए ताड़का मारी ।चरण छुआए अहिल्या तारी ।।ऋषियों के दु:ख हरते राम ।पतितपावन सीताराम ।। 3 ।।जनक पुरी रघुनन्दन आए ।नगर निवासी दर्शन पाए ।।सीता के मन भाए राम ।पतितपावन सीताराम ।। 4।।रघुनन्दन ने धनुष चढ़ाया ।सब राजो का मान घटाया ।।सीता ने वर पाए राम ।पतितपावन सीताराम ।।5।।परशुराम क्रोधित हो आये ।दुष्ट भूप मन में हरषाये ।।जनक राय ने किया प्रणाम ।पतितपावन सीताराम ।।6।।बोले लखन सुनो मुनि ग्यानी ।संत नहीं होते अभिमानी ।।मीठी वाणी बोले राम ।पतितपावन सीताराम ।।7।।लक्ष्मण वचन ध्यान मत दीजो ।जो कुछ दण्ड दास को दीजो ।।धनुष तोडय्या हूँ मै राम ।पतितपावन सीताराम ।।8।।लेकर के यह धनुष चढ़ाओ ।अपनी शक्ति मुझे दिखलाओ ।।छूवत चाप चढ़ाये राम ।पतितपावन सीताराम ।।9।।हुई उर्मिला लखन की नारी ।श्रुतिकीर्ति रिपुसूदन प्यारी ।।हुई माण्डव भरत के बाम ।पतितपावन सीताराम ।।10।।अवधपुरी रघुनन्दन आये ।घर-घर नारी मंगल गाये ।।बारह वर्ष बिताये राम ।पतितपावन सीताराम ।।11।।गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लीनी ।राज तिलक तैयारी कीनी ।।कल को होंगे राजा राम ।पतितपावन सीताराम ।।12।।कुटिल मंथरा ने बहकाई ।कैकई ने यह बात सुनाई ।।दे दो मेरे दो वरदान ।पतितपावन सीताराम ।।13।।मेरी विनती तुम सुन लीजो ।भरत पुत्र को गद्दी दीजो ।।होत प्रात वन भेजो राम ।पतितपावन सीताराम ।।14।।धरनी गिरे भूप ततकाला ।लागा दिल में सूल विशाला ।।तब सुमन्त बुलवाये राम ।पतितपावन सीताराम ।।15।।राम पिता को शीश नवाये ।मुख से वचन कहा नहीं जाये ।।कैकई वचन सुनयो राम ।पतितपावन सीताराम ।।16।।राजा के तुम प्राण प्यारे ।इनके दु:ख हरोगे सारे ।।अब तुम वन में जाओ राम ।पतितपावन सीताराम ।।17।।वन में चौदह वर्ष बिताओ ।रघुकुल रीति-नीति अपनाओ ।।तपसी वेष बनाओ राम ।पतितपावन सीताराम ।।18।।सुनत वचन राघव हरषाये ।माता जी के मंदिर आये ।।चरण कमल मे किया प्रणाम ।पतितपावन सीताराम ।।19।।माता जी मैं तो वन जाऊं ।चौदह वर्ष बाद फिर आऊं ।।चरण कमल देखूं सुख धाम ।पतितपावन सीताराम ।।20।।सुनी शूल सम जब यह बानी ।भू पर गिरी कौशल्या रानी ।।धीरज बंधा रहे श्रीराम ।पतितपावन सीताराम ।।21।।सीताजी जब यह सुन पाई ।रंग महल से नीचे आई ।।कौशल्या को किया प्रणाम ।पतितपावन सीताराम ।।22।।मेरी चूक क्षमा कर दीजो ।वन जाने की आज्ञा दीजो ।।सीता को समझाते राम ।पतितपावन सीताराम ।।23।।मेरी सीख सिया सुन लीजो ।सास ससुर की सेवा कीजो ।।मुझको भी होगा विश्राम ।पतितपावन सीताराम ।।24।।मेरा दोष बता प्रभु दीजो ।संग मुझे सेवा में लीजो ।।अर्द्धांगिनी तुम्हारी राम ।पतितपावन सीताराम ।।25।।समाचार सुनि लक्ष्मण आये ।धनुष बाण संग परम सुहाये ।।बोले संग चलूंगा राम ।पतितपावन सीताराम ।।26।।राम लखन मिथिलेश कुमारी ।वन जाने की करी तैयारी ।।रथ में बैठ गये सुख धाम ।पतितपावन सीताराम ।।27।।अवधपुरी के सब नर नारी ।समाचार सुन व्याकुल भारी ।।मचा अवध में कोहराम ।पतितपावन सीताराम ।।28।।श्रृंगवेरपुर रघुवर आये ।रथ को अवधपुरी लौटाये ।।गंगा तट पर आये राम ।पतितपावन सीताराम ।।29।।केवट कहे चरण धुलवाओ ।पीछे नौका में चढ़ जाओ ।।पत्थर कर दी, नारी राम ।पतितपावन सीताराम ।।30।।लाया एक कठौता पानी ।चरण कमल धोये सुख मानी ।।नाव चढ़ाये लक्ष्मण राम ।पतितपावन सीताराम ।।31।।उतराई में मुदरी दीनी ।केवट ने यह विनती कीनी ।।उतराई नहीं लूंगा राम ।पतितपावन सीताराम ।।32।।तुम आये, हम घाट उतारे ।हम आयेंगे घाट तुम्हारे ।।तब तुम पार लगायो राम ।पतितपावन सीताराम ।।33।।भरद्वाज आश्रम पर आये ।राम लखन ने शीष नवाए ।।एक रात कीन्हा विश्राम ।पतितपावन सीताराम ।।34।।भाई भरत अयोध्या आये ।कैकई को कटु वचन सुनाये ।।क्यों तुमने वन भेजे राम ।पतितपावन सीताराम ।।35।।चित्रकूट रघुनंदन आये ।वन को देख सिया सुख पाये ।।मिले भरत से भाई राम ।पतितपावन सीताराम ।।36।।अवधपुरी को चलिए भाई ।यह सब कैकई की कुटिलाई ।।तनिक दोष नहीं मेरा राम ।पतितपावन सीताराम ।।37।।चरण पादुका तुम ले जाओ ।पूजा कर दर्शन फल पावो ।।भरत को कंठ लगाये राम ।पतितपावन सीताराम ।।38।।आगे चले राम रघुराया ।निशाचरों का वंश मिटाया ।।ऋषियों के हुए पूरन काम ।पतितपावन सीताराम ।।39।।‘अनसूया’ की कुटीया आये ।दिव्य वस्त्र सिय मां ने पाय ।।था मुनि अत्री का वह धाम ।पतितपावन सीताराम ।।40।।मुनि-स्थान आए रघुराई ।शूर्पनखा की नाक कटाई ।।खरदूषन को मारे राम ।पतितपावन सीताराम ।।41।।पंचवटी रघुनंदन आए ।कनक मृग “मारीच“ संग धाये ।।लक्ष्मण तुम्हें बुलाते राम ।पतितपावन सीताराम ।।42।।रावण साधु वेष में आया ।भूख ने मुझको बहुत सताया ।।भिक्षा दो यह धर्म का काम ।पतितपावन सीताराम ।।43।।भिक्षा लेकर सीता आई ।हाथ पकड़ रथ में बैठाई ।।सूनी कुटिया देखी भाई ।पतितपावन सीताराम ।।44।।धरनी गिरे राम रघुराई ।सीता के बिन व्याकुलताई ।।हे प्रिय सीते, चीखे राम ।पतितपावन सीताराम ।।45।।लक्ष्मण, सीता छोड़ नहीं तुम आते ।जनक दुलारी नहीं गंवाते ।।बने बनाये बिगड़े काम ।पतितपावन सीताराम ।।46 ।।कोमल बदन सुहासिनि सीते ।तुम बिन व्यर्थ रहेंगे जीते ।।लगे चाँदनी-जैसे घाम ।पतितपावन सीताराम ।।47।।सुन री मैना, सुन रे तोता ।मैं भी पंखो वाला होता ।।वन वन लेता ढूंढ तमाम ।पतितपावन सीताराम ।।48 ।।श्यामा हिरनी, तू ही बता दे ।जनक नन्दनी मुझे मिला दे ।।तेरे जैसी आँखे श्याम ।पतितपावन सीताराम ।।49।।वन वन ढूंढ रहे रघुराई ।जनक दुलारी कहीं न पाई ।।गृद्धराज ने किया प्रणाम ।पतितपावन सीताराम ।।50।।चख चख कर फल शबरी लाई ।प्रेम सहित खाये रघुराई ।।ऎसे मीठे नहीं हैं आम ।पतितपावन सीताराम ।।51।।विप्र रुप धरि हनुमत आए ।चरण कमल में शीश नवाये ।।कन्धे पर बैठाये राम ।पतितपावन सीताराम ।।52।।सुग्रीव से करी मिताई ।अपनी सारी कथा सुनाई ।।बाली पहुंचाया निज धाम ।पतितपावन सीताराम ।।53।।सिंहासन सुग्रीव बिठाया ।मन में वह अति हर्षाया ।।वर्षा ऋतु आई हे राम ।पतितपावन सीताराम ।।54।।हे भाई लक्ष्मण तुम जाओ ।वानरपति को यूं समझाओ ।।सीता बिन व्याकुल हैं राम ।पतितपावन सीताराम ।।55।।देश देश वानर भिजवाए ।सागर के सब तट पर आए ।।सहते भूख प्यास और घाम ।पतितपावन सीताराम ।।56।।सम्पाती ने पता बताया ।सीता को रावण ले आया ।।सागर कूद गए हनुमान ।पतितपावन सीताराम ।।57।।कोने कोने पता लगाया ।भगत विभीषण का घर पाया ।।हनुमान को किया प्रणाम ।पतितपावन सीताराम ।।58।।अशोक वाटिका हनुमत आए ।वृक्ष तले सीता को पाये ।।आँसू बरसे आठो याम ।पतितपावन सीताराम ।।59।।रावण संग निशिचरी लाके ।सीता को बोला समझा के ।।मेरी ओर तुम देखो बाम ।पतितपावन सीताराम ।।60।।मन्दोदरी बना दूँ दासी ।सब सेवा में लंका वासी ।।करो भवन में चलकर विश्राम ।पतितपावन सीताराम ।।61।।चाहे मस्तक कटे हमारा ।मैं नहीं देखूं बदन तुम्हारा ।।मेरे तन मन धन है राम ।पतितपावन सीताराम ।।62।।ऊपर से मुद्रिका गिराई ।सीता जी ने कंठ लगाई ।।हनुमान ने किया प्रणाम ।पतितपावन सीताराम ।।63।।मुझको भेजा है रघुराया ।सागर लांघ यहां मैं आया ।।मैं हूं राम दास हनुमान ।पतितपावन सीताराम ।।64।।भूख लगी फल खाना चाहूँ ।जो माता की आज्ञा पाऊँ ।।सब के स्वामी हैं श्री राम ।पतितपावन सीताराम ।।65।।सावधान हो कर फल खाना ।रखवालों को भूल ना जाना ।।निशाचरों का है यह धाम ।पतितपावन सीताराम ।।66।।हनुमान ने वृक्ष उखाड़े ।देख देख माली ललकारे ।।मार-मार पहुंचाये धाम ।पतितपावन सीताराम ।।67।।अक्षय कुमार को स्वर्ग पहुंचाया ।इन्द्रजीत को फांसी ले आया ।।ब्रह्मफांस से बंधे हनुमान ।पतितपावन सीताराम ।।68।।सीता को तुम लौटा दीजो ।उन से क्षमा याचना कीजो ।।तीन लोक के स्वामी राम ।पतितपावन सीताराम ।।69।।भगत बिभीषण ने समझाया ।रावण ने उसको धमकाया ।।सनमुख देख रहे रघुराई ।पतितपावन सीताराम ।।70।।रूई, तेल घृत वसन मंगाई ।पूंछ बांध कर आग लगाई ।।पूंछ घुमाई है हनुमान ।।पतितपावन सीताराम ।।71।।सब लंका में आग लगाई ।सागर में जा पूंछ बुझाई ।।ह्रदय कमल में राखे राम ।पतितपावन सीताराम ।।72।।सागर कूद लौट कर आये ।समाचार रघुवर ने पाये ।।दिव्य भक्ति का दिया इनाम ।पतितपावन सीताराम ।।73।।वानर रीछ संग में लाए ।लक्ष्मण सहित सिंधु तट आए ।।लगे सुखाने सागर राम ।पतितपावन सीताराम ।।74।।सेतू कपि नल नील बनावें ।राम-राम लिख सिला तिरावें ।।लंका पहुँचे राजा राम ।पतितपावन सीताराम ।।75।।अंगद चल लंका में आया ।सभा बीच में पांव जमाया ।।बाली पुत्र महा बलधाम ।पतितपावन सीताराम ।।76।।रावण पाँव हटाने आया ।अंगद ने फिर पांव उठाया ।।क्षमा करें तुझको श्री राम ।पतितपावन सीताराम ।।77।।निशाचरों की सेना आई ।गरज तरज कर हुई लड़ाई ।।वानर बोले जय सिया राम ।पतितपावन सीताराम ।।78।।इन्द्रजीत ने शक्ति चलाई ।धरनी गिरे लखन मुरझाई ।।चिन्ता करके रोये राम ।पतितपावन सीताराम ।।79।।जब मैं अवधपुरी से आया ।हाय पिता ने प्राण गंवाया ।।वन में गई चुराई बाम ।पतितपावन सीताराम ।।80।।भाई तुमने भी छिटकाया ।जीवन में कुछ सुख नहीं पाया ।।सेना में भारी कोहराम ।पतितपावन सीताराम ।।81।जो संजीवनी बूटी को लाए ।तो भाई जीवित हो जाये ।।बूटी लायेगा हनुमान ।पतितपावन सीताराम ।।82।।जब बूटी का पता न पाया ।पर्वत ही लेकर के आया ।।काल नेम पहुंचाया धाम ।पतितपावन सीताराम ।।83।।भक्त भरत ने बाण चलाया ।चोट लगी हनुमत लंगड़ाया ।।मुख से बोले जय सिया राम ।पतितपावन सीताराम ।।84।।बोले भरत बहुत पछताकर ।पर्वत सहित बाण बैठाकर ।।तुम्हें मिला दूं राजा राम ।पतितपावन सीताराम ।।85।।बूटी लेकर हनुमत आया ।लखन लाल उठ शीष नवाया ।।हनुमत कंठ लगाये राम ।पतितपावन सीताराम ।।86।।कुंभकरन उठकर तब आया ।एक बाण से उसे गिराया ।।इन्द्रजीत पहुँचाया धाम ।पतितपावन सीताराम ।।87।।दुर्गापूजन रावण कीनो ।नौ दिन तक आहार न लीनो ।।आसन बैठ किया है ध्यान ।पतितपावन सीताराम ।।88।।रावण का व्रत खंडित कीना ।परम धाम पहुँचा ही दीना ।।वानर बोले जय श्री राम ।पतितपावन सीताराम ।।89।।सीता ने हरि दर्शन कीना ।चिन्ता शोक सभी तज दीना ।।हँस कर बोले राजा राम ।पतितपावन सीताराम ।।90।।पहले अग्नि परीक्षा पाओ ।पीछे निकट हमारे आओ ।।तुम हो पतिव्रता हे बाम ।पतितपावन सीताराम ।।91।।करी परीक्षा कंठ लगाई ।सब वानर सेना हरषाई ।।राज्य बिभीषन दीन्हा राम ।पतितपावन सीताराम ।।92।।फिर पुष्पक विमान मंगाया ।सीता सहित बैठे रघुराया ।।दण्डकवन में उतरे राम ।पतितपावन सीताराम ।।93।।ऋषिवर सुन दर्शन को आये ।स्तुति कर मन में हर्षाये ।।तब गंगा तट आये राम ।पतितपावन सीताराम ।।94।।नन्दी ग्राम पवनसुत आये ।भाई भरत को वचन सुनाए ।।लंका से आए हैं राम ।पतितपावन सीताराम ।।95।।कहो विप्र तुम कहां से आए ।ऎसे मीठे वचन सुनाए ।।मुझे मिला दो भैया राम ।पतितपावन सीताराम ।।96।।अवधपुरी रघुनन्दन आये ।मंदिर-मंदिर मंगल छाये ।।माताओं ने किया प्रणाम ।पतितपावन सीताराम ।।97।।भाई भरत को गले लगाया ।सिंहासन बैठे रघुराया ।।जग ने कहा, “हैं राजा राम” ।पतितपावन सीताराम ।।98।।सब भूमि विप्रो को दीनी ।विप्रों ने वापस दे दीनी ।।हम तो भजन करेंगे राम ।पतितपावन सीताराम ।।99।।धोबी ने धोबन धमकाई ।रामचन्द्र ने यह सुन पाई ।।वन में सीता भेजी राम ।पतितपावन सीताराम ।।100।।बाल्मीकि आश्रम में आई ।लव व कुश हुए दो भाई ।।धीर वीर ज्ञानी बलवान ।पतितपावन सीताराम ।।101।।अश्वमेघ यज्ञ किन्हा राम ।सीता बिन सब सूने काम ।।लव कुश वहां दीयो पहचान ।पतितपावन सीताराम ।।102।।सीता, राम बिना अकुलाई ।भूमि से यह विनय सुनाई ।।मुझको अब दीजो विश्राम ।पतितपावन सीताराम ।।103।।सीता भूमि में समाई ।देखकर चिन्ता की रघुराई ।।बार बार पछताये राम ।पतितपावन सीताराम ।।104।।राम राज्य में सब सुख पावें ।प्रेम मग्न हो हरि गुन गावें ।।दुख कलेश का रहा न नाम ।पतितपावन सीताराम ।।105।।ग्यारह हजार वर्ष परयन्ता ।राज कीन्ह श्री लक्ष्मी कंता ।।फिर बैकुण्ठ पधारे धाम ।पतितपावन सीताराम ।।106।।अवधपुरी बैकुण्ठ सिधाई ।नर नारी सबने गति पाई ।।शरनागत प्रतिपालक राम ।पतितपावन सीताराम ।।107।।“श्याम सुंदर” ने लीला गाई ।मेरी विनय सुनो रघुराई ।।भूलूँ नहीं तुम्हारा नाम ।पतितपावन सीताराम ।।108।।

रामायण – मनका 108






images ramayanइस पाठ की एक माला प्रतिदिन करने से 

मनोकामना पूर्ण होती है, ऎसा माना गया है.

रघुपति राघव राजाराम ।
पतितपावन सीताराम ।।
जय रघुनन्दन जय घनश्याम ।
पतितपावन सीताराम ।।


भीड़ पड़ी जब भक्त पुकारे ।
दूर करो प्रभु दु:ख हमारे ।।
दशरथ के घर जन्मे राम ।
पतितपावन सीताराम ।। 1 ।।

विश्वामित्र मुनीश्वर आये ।

दशरथ भूप से वचन सुनाये ।।
संग में भेजे लक्ष्मण राम ।
पतितपावन सीताराम ।। 2 ।।

वन में जाए ताड़का मारी ।

चरण छुआए अहिल्या तारी ।।
ऋषियों के दु:ख हरते राम ।
पतितपावन सीताराम ।। 3 ।।

जनक पुरी रघुनन्दन आए ।

नगर निवासी दर्शन पाए ।।
सीता के मन भाए राम ।
पतितपावन सीताराम ।। 4।।

रघुनन्दन ने धनुष चढ़ाया ।

सब राजो का मान घटाया ।।
सीता ने वर पाए राम ।
पतितपावन सीताराम ।।5।।

परशुराम क्रोधित हो आये ।

दुष्ट भूप मन में हरषाये ।।
जनक राय ने किया प्रणाम ।
पतितपावन सीताराम ।।6।।


बोले लखन सुनो मुनि ग्यानी ।
संत नहीं होते अभिमानी ।।
मीठी वाणी बोले राम ।
पतितपावन सीताराम ।।7।।

लक्ष्मण वचन ध्यान मत दीजो ।

जो कुछ दण्ड दास को दीजो ।।
धनुष तोडय्या हूँ मै राम ।
पतितपावन सीताराम ।।8।।

लेकर के यह धनुष चढ़ाओ ।

अपनी शक्ति मुझे दिखलाओ ।।
छूवत चाप चढ़ाये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।9।।

हुई उर्मिला लखन की नारी ।

श्रुतिकीर्ति रिपुसूदन प्यारी ।।
हुई माण्डव भरत के बाम ।
पतितपावन सीताराम ।।10।।


अवधपुरी रघुनन्दन आये ।
घर-घर नारी मंगल गाये ।।
बारह वर्ष बिताये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।11।।

गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लीनी ।

राज तिलक तैयारी कीनी ।।
कल को होंगे राजा राम ।
पतितपावन सीताराम ।।12।।

कुटिल मंथरा ने बहकाई ।
कैकई ने यह बात सुनाई ।।
दे दो मेरे दो वरदान ।
पतितपावन सीताराम ।।13।।

मेरी विनती तुम सुन लीजो ।
भरत पुत्र को गद्दी दीजो ।।
होत प्रात वन भेजो राम ।
पतितपावन सीताराम ।।14।।

धरनी गिरे भूप ततकाला ।
लागा दिल में सूल विशाला ।।
तब सुमन्त बुलवाये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।15।।

राम पिता को शीश नवाये ।
मुख से वचन कहा नहीं जाये ।।
कैकई वचन सुनयो राम ।
पतितपावन सीताराम ।।16।।

राजा के तुम प्राण प्यारे ।
इनके दु:ख हरोगे सारे ।।
अब तुम वन में जाओ राम ।
पतितपावन सीताराम ।।17।।

वन में चौदह वर्ष बिताओ ।
रघुकुल रीति-नीति अपनाओ ।।
तपसी वेष बनाओ राम ।
पतितपावन सीताराम ।।18।।

सुनत वचन राघव हरषाये ।
माता जी के मंदिर आये ।।
चरण कमल मे किया प्रणाम ।
पतितपावन सीताराम ।।19।।

माता जी मैं तो वन जाऊं ।
चौदह वर्ष बाद फिर आऊं ।।
चरण कमल देखूं सुख धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।20।।

सुनी शूल सम जब यह बानी ।
भू पर गिरी कौशल्या रानी ।।
धीरज बंधा रहे श्रीराम ।
पतितपावन सीताराम ।।21।।

सीताजी जब यह सुन पाई ।
रंग महल से नीचे आई ।।
कौशल्या को किया प्रणाम ।
पतितपावन सीताराम ।।22।।

मेरी चूक क्षमा कर दीजो ।
वन जाने की आज्ञा दीजो ।।
सीता को समझाते राम ।
पतितपावन सीताराम ।।23।।

मेरी सीख सिया सुन लीजो ।
सास ससुर की सेवा कीजो ।।
मुझको भी होगा विश्राम ।
पतितपावन सीताराम ।।24।।

मेरा दोष बता प्रभु दीजो ।
संग मुझे सेवा में लीजो ।।
अर्द्धांगिनी तुम्हारी राम ।
पतितपावन सीताराम ।।25।।

समाचार सुनि लक्ष्मण आये ।
धनुष बाण संग परम सुहाये ।।
बोले संग चलूंगा राम ।
पतितपावन सीताराम ।।26।।

राम लखन मिथिलेश कुमारी ।
वन जाने की करी तैयारी ।।
रथ में बैठ गये सुख धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।27।।

अवधपुरी के सब नर नारी ।
समाचार सुन व्याकुल भारी ।।
मचा अवध में कोहराम ।
पतितपावन सीताराम ।।28।।

श्रृंगवेरपुर रघुवर आये ।
रथ को अवधपुरी लौटाये ।।
गंगा तट पर आये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।29।।

केवट कहे चरण धुलवाओ ।
पीछे नौका में चढ़ जाओ ।।
पत्थर कर दी, नारी राम ।
पतितपावन सीताराम ।।30।।

लाया एक कठौता पानी ।
चरण कमल धोये सुख मानी ।।
नाव चढ़ाये लक्ष्मण राम ।
पतितपावन सीताराम ।।31।।

उतराई में मुदरी दीनी ।
केवट ने यह विनती कीनी ।।
उतराई नहीं लूंगा राम ।
पतितपावन सीताराम ।।32।।

तुम आये, हम घाट उतारे ।
हम आयेंगे घाट तुम्हारे ।।
तब तुम पार लगायो राम ।
पतितपावन सीताराम ।।33।।

भरद्वाज आश्रम पर आये ।
राम लखन ने शीष नवाए ।।
एक रात कीन्हा विश्राम ।
पतितपावन सीताराम ।।34।।

भाई भरत अयोध्या आये ।
कैकई को कटु वचन सुनाये ।।
क्यों तुमने वन भेजे राम ।
पतितपावन सीताराम ।।35।।

चित्रकूट रघुनंदन आये ।
वन को देख सिया सुख पाये ।।
मिले भरत से भाई राम ।
पतितपावन सीताराम ।।36।।

अवधपुरी को चलिए भाई ।
यह सब कैकई की कुटिलाई ।।
तनिक दोष नहीं मेरा राम ।
पतितपावन सीताराम ।।37।।

चरण पादुका तुम ले जाओ ।
पूजा कर दर्शन फल पावो ।।
भरत को कंठ लगाये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।38।।

आगे चले राम रघुराया ।
निशाचरों का वंश मिटाया ।।
ऋषियों के हुए पूरन काम ।
पतितपावन सीताराम ।।39।।

‘अनसूया’ की कुटीया आये ।
दिव्य वस्त्र सिय मां ने पाय ।।
था मुनि अत्री का वह धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।40।।

मुनि-स्थान आए रघुराई ।
शूर्पनखा की नाक कटाई ।।
खरदूषन को मारे राम ।
पतितपावन सीताराम ।।41।।

पंचवटी रघुनंदन आए ।
कनक मृग “मारीच“ संग धाये ।।
लक्ष्मण तुम्हें बुलाते राम ।
पतितपावन सीताराम ।।42।।

रावण साधु वेष में आया ।
भूख ने मुझको बहुत सताया ।।
भिक्षा दो यह धर्म का काम ।
पतितपावन सीताराम ।।43।।

भिक्षा लेकर सीता आई ।
हाथ पकड़ रथ में बैठाई ।।
सूनी कुटिया देखी भाई ।
पतितपावन सीताराम ।।44।।

धरनी गिरे राम रघुराई ।
सीता के बिन व्याकुलताई ।।
हे प्रिय सीते, चीखे राम ।
पतितपावन सीताराम ।।45।।

लक्ष्मण, सीता छोड़ नहीं तुम आते ।
जनक दुलारी नहीं गंवाते ।।
बने बनाये बिगड़े काम ।
पतितपावन सीताराम ।।46 ।।

कोमल बदन सुहासिनि सीते ।
तुम बिन व्यर्थ रहेंगे जीते ।।
लगे चाँदनी-जैसे घाम ।
पतितपावन सीताराम ।।47।।

सुन री मैना, सुन रे तोता ।
मैं भी पंखो वाला होता ।।
वन वन लेता ढूंढ तमाम ।
पतितपावन सीताराम ।।48 ।।

श्यामा हिरनी, तू ही बता दे ।
जनक नन्दनी मुझे मिला दे ।।
तेरे जैसी आँखे श्याम ।
पतितपावन सीताराम ।।49।।

वन वन ढूंढ रहे रघुराई ।
जनक दुलारी कहीं न पाई ।।
गृद्धराज ने किया प्रणाम ।
पतितपावन सीताराम ।।50।।

चख चख कर फल शबरी लाई ।
प्रेम सहित खाये रघुराई ।।
ऎसे मीठे नहीं हैं आम ।
पतितपावन सीताराम ।।51।।

विप्र रुप धरि हनुमत आए ।
चरण कमल में शीश नवाये ।।
कन्धे पर बैठाये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।52।।

सुग्रीव से करी मिताई ।
अपनी सारी कथा सुनाई ।।
बाली पहुंचाया निज धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।53।।

सिंहासन सुग्रीव बिठाया ।
मन में वह अति हर्षाया ।।
वर्षा ऋतु आई हे राम ।
पतितपावन सीताराम ।।54।।

हे भाई लक्ष्मण तुम जाओ ।
वानरपति को यूं समझाओ ।।
सीता बिन व्याकुल हैं राम ।
पतितपावन सीताराम ।।55।।

देश देश वानर भिजवाए ।
सागर के सब तट पर आए ।।
सहते भूख प्यास और घाम ।
पतितपावन सीताराम ।।56।।

सम्पाती ने पता बताया ।
सीता को रावण ले आया ।।
सागर कूद गए हनुमान ।
पतितपावन सीताराम ।।57।।

कोने कोने पता लगाया ।
भगत विभीषण का घर पाया ।।
हनुमान को किया प्रणाम ।
पतितपावन सीताराम ।।58।।

अशोक वाटिका हनुमत आए ।
वृक्ष तले सीता को पाये ।।
आँसू बरसे आठो याम ।
पतितपावन सीताराम ।।59।।

रावण संग निशिचरी लाके ।
सीता को बोला समझा के ।।
मेरी ओर तुम देखो बाम ।
पतितपावन सीताराम ।।60।।

मन्दोदरी बना दूँ दासी ।
सब सेवा में लंका वासी ।।
करो भवन में चलकर विश्राम ।
पतितपावन सीताराम ।।61।।

चाहे मस्तक कटे हमारा ।
मैं नहीं देखूं बदन तुम्हारा ।।
मेरे तन मन धन है राम ।
पतितपावन सीताराम ।।62।।

ऊपर से मुद्रिका गिराई ।
सीता जी ने कंठ लगाई ।।
हनुमान ने किया प्रणाम ।
पतितपावन सीताराम ।।63।।

मुझको भेजा है रघुराया ।
सागर लांघ यहां मैं आया ।।
मैं हूं राम दास हनुमान ।
पतितपावन सीताराम ।।64।।

भूख लगी फल खाना चाहूँ ।
जो माता की आज्ञा पाऊँ ।।
सब के स्वामी हैं श्री राम ।
पतितपावन सीताराम ।।65।।

सावधान हो कर फल खाना ।
रखवालों को भूल ना जाना ।।
निशाचरों का है यह धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।66।।

हनुमान ने वृक्ष उखाड़े ।
देख देख माली ललकारे ।।
मार-मार पहुंचाये धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।67।।

अक्षय कुमार को स्वर्ग पहुंचाया ।
इन्द्रजीत को फांसी ले आया ।।
ब्रह्मफांस से बंधे हनुमान ।
पतितपावन सीताराम ।।68।।

सीता को तुम लौटा दीजो ।
उन से क्षमा याचना कीजो ।।
तीन लोक के स्वामी राम ।
पतितपावन सीताराम ।।69।।

भगत बिभीषण ने समझाया ।
रावण ने उसको धमकाया ।।
सनमुख देख रहे रघुराई ।
पतितपावन सीताराम ।।70।।

रूई, तेल घृत वसन मंगाई ।
पूंछ बांध कर आग लगाई ।।
पूंछ घुमाई है हनुमान ।।
पतितपावन सीताराम ।।71।।

सब लंका में आग लगाई ।
सागर में जा पूंछ बुझाई ।।
ह्रदय कमल में राखे राम ।
पतितपावन सीताराम ।।72।।

सागर कूद लौट कर आये ।
समाचार रघुवर ने पाये ।।
दिव्य भक्ति का दिया इनाम ।
पतितपावन सीताराम ।।73।।

वानर रीछ संग में लाए ।
लक्ष्मण सहित सिंधु तट आए ।।
लगे सुखाने सागर राम ।
पतितपावन सीताराम ।।74।।

सेतू कपि नल नील बनावें ।
राम-राम लिख सिला तिरावें ।।
लंका पहुँचे राजा राम ।
पतितपावन सीताराम ।।75।।

अंगद चल लंका में आया ।
सभा बीच में पांव जमाया ।।
बाली पुत्र महा बलधाम ।
पतितपावन सीताराम ।।76।।

रावण पाँव हटाने आया ।
अंगद ने फिर पांव उठाया ।।
क्षमा करें तुझको श्री राम ।
पतितपावन सीताराम ।।77।।

निशाचरों की सेना आई ।
गरज तरज कर हुई लड़ाई ।।
वानर बोले जय सिया राम ।
पतितपावन सीताराम ।।78।।

इन्द्रजीत ने शक्ति चलाई ।
धरनी गिरे लखन मुरझाई ।।
चिन्ता करके रोये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।79।।

जब मैं अवधपुरी से आया ।
हाय पिता ने प्राण गंवाया ।।
वन में गई चुराई बाम ।
पतितपावन सीताराम ।।80।।

भाई तुमने भी छिटकाया ।
जीवन में कुछ सुख नहीं पाया ।।
सेना में भारी कोहराम ।
पतितपावन सीताराम ।।81।

जो संजीवनी बूटी को लाए ।
तो भाई जीवित हो जाये ।।
बूटी लायेगा हनुमान ।
पतितपावन सीताराम ।।82।।

जब बूटी का पता न पाया ।
पर्वत ही लेकर के आया ।।
काल नेम पहुंचाया धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।83।।

भक्त भरत ने बाण चलाया ।
चोट लगी हनुमत लंगड़ाया ।।
मुख से बोले जय सिया राम ।
पतितपावन सीताराम ।।84।।

बोले भरत बहुत पछताकर ।
पर्वत सहित बाण बैठाकर ।।
तुम्हें मिला दूं राजा राम ।
पतितपावन सीताराम ।।85।।

बूटी लेकर हनुमत आया ।
लखन लाल उठ शीष नवाया ।।
हनुमत कंठ लगाये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।86।।

कुंभकरन उठकर तब आया ।
एक बाण से उसे गिराया ।।
इन्द्रजीत पहुँचाया धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।87।।

दुर्गापूजन रावण कीनो ।
नौ दिन तक आहार न लीनो ।।
आसन बैठ किया है ध्यान ।
पतितपावन सीताराम ।।88।।

रावण का व्रत खंडित कीना ।
परम धाम पहुँचा ही दीना ।।
वानर बोले जय श्री राम ।
पतितपावन सीताराम ।।89।।

सीता ने हरि दर्शन कीना ।
चिन्ता शोक सभी तज दीना ।।
हँस कर बोले राजा राम ।
पतितपावन सीताराम ।।90।।

पहले अग्नि परीक्षा पाओ ।
पीछे निकट हमारे आओ ।।
तुम हो पतिव्रता हे बाम ।
पतितपावन सीताराम ।।91।।

करी परीक्षा कंठ लगाई ।
सब वानर सेना हरषाई ।।
राज्य बिभीषन दीन्हा राम ।
पतितपावन सीताराम ।।92।।

फिर पुष्पक विमान मंगाया ।
सीता सहित बैठे रघुराया ।।
दण्डकवन में उतरे राम ।
पतितपावन सीताराम ।।93।।

ऋषिवर सुन दर्शन को आये ।
स्तुति कर मन में हर्षाये ।।
तब गंगा तट आये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।94।।

नन्दी ग्राम पवनसुत आये ।
भाई भरत को वचन सुनाए ।।
लंका से आए हैं राम ।
पतितपावन सीताराम ।।95।।

कहो विप्र तुम कहां से आए ।
ऎसे मीठे वचन सुनाए ।।
मुझे मिला दो भैया राम ।
पतितपावन सीताराम ।।96।।

अवधपुरी रघुनन्दन आये ।
मंदिर-मंदिर मंगल छाये ।।
माताओं ने किया प्रणाम ।
पतितपावन सीताराम ।।97।।

भाई भरत को गले लगाया ।
सिंहासन बैठे रघुराया ।।
जग ने कहा, “हैं राजा राम” ।
पतितपावन सीताराम ।।98।।

सब भूमि विप्रो को दीनी ।
विप्रों ने वापस दे दीनी ।।
हम तो भजन करेंगे राम ।
पतितपावन सीताराम ।।99।।

धोबी ने धोबन धमकाई ।
रामचन्द्र ने यह सुन पाई ।।
वन में सीता भेजी राम ।
पतितपावन सीताराम ।।100।।

बाल्मीकि आश्रम में आई ।
लव व कुश हुए दो भाई ।।
धीर वीर ज्ञानी बलवान ।
पतितपावन सीताराम ।।101।।

अश्वमेघ यज्ञ किन्हा राम ।
सीता बिन सब सूने काम ।।
लव कुश वहां दीयो पहचान ।
पतितपावन सीताराम ।।102।।

सीता, राम बिना अकुलाई ।
भूमि से यह विनय सुनाई ।।
मुझको अब दीजो विश्राम ।
पतितपावन सीताराम ।।103।।

सीता भूमि में समाई ।
देखकर चिन्ता की रघुराई ।।
बार बार पछताये राम ।
पतितपावन सीताराम ।।104।।

राम राज्य में सब सुख पावें ।
प्रेम मग्न हो हरि गुन गावें ।।
दुख कलेश का रहा न नाम ।
पतितपावन सीताराम ।।105।।

ग्यारह हजार वर्ष परयन्ता ।
राज कीन्ह श्री लक्ष्मी कंता ।।
फिर बैकुण्ठ पधारे धाम ।
पतितपावन सीताराम ।।106।।

अवधपुरी बैकुण्ठ सिधाई ।
नर नारी सबने गति पाई ।।
शरनागत प्रतिपालक राम ।
पतितपावन सीताराम ।।107।।

“श्याम सुंदर” ने लीला गाई ।
मेरी विनय सुनो रघुराई ।।
भूलूँ नहीं तुम्हारा नाम ।
पतितपावन सीताराम ।।108।।

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उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश 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जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश 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*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

*हनुमानजी की दिव्य उधारी!!!!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान 🙏🙏❤️*पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।* *रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!**अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।**माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!**कछुक दिवस जननी धरु धीरा।**कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।**निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।**तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥**मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए,आप किसी और से बुलवा लो।**अब बारी आई लक्षमण जी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था।**प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।**आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।**ये जो खड़ा है ना , वो हनुमानजी का लक्ष्मण है। मै कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमानजी अयोध्या से चले जाएं!**अब बारी आई भरत जी की, अरे! भरत जी तो इतना रोए, कि रामजी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पर, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो!**और दूसरी बात ये कि...!**बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।* *अधम कवन जग मोहि समाना॥**मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमानजी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!**रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।**सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥**मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमानजी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।**अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमानजी को अयोध्या से निकालने के लिए, जिन्होंने ने माता सीता, लक्षमण भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो! किसी अच्छे काम के लिए कहते तो बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।**अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार,* *माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों ये स्वामी है, और देखती हूं आप हनुमानजी से सकुचाते है।और आप खुद भी कहते हो कि...!**प्रति उपकार करौं का तोरा।* *सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥**आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु! राघवजी ने कहा देवी कर्जदार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो**सनमुख होइ न सकत मन मोरा**देवी! हनुमानजी का कर्जा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ्य राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है। क्योंकि कर्जा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो हनुमानजी का कर्जा कैसे उतारा जा सकता है।**पहले हनुमान विवाह करें*,*लंकेश हरें इनकी जब नारी।**मुदरी लै रघुनाथ चलै,निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।**अायि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।**तब रघुनाथ चुकायि सकें, ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।**देवी! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्जा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!**"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"**मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमानजी भी कुछ मांग लें।**दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए,सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमानजी क्या मांगेंगे, और रामजी क्या देंगे।**रामजी ने हनुमान जी से कहा! सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद,अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?**हनुमानजी बोले! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!**"तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना"**तो फिर यदि मै दो पद मांगू तो..?**सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमानजी भी ठीक ही कह रहे हैं। रामजी ने कहा! ठीक है, मांग लो, सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमानजी का कर्जा चुकता हुआ।**हनुमानजी ने कहा! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमे राजमद की शंका हो, तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए...?**हनुमानजी ने रामजी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।**हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।**नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।**जानकी जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राघवजी बोले, लो उतर गया हनुमानजी का कर्जा!**और अभी तक जिसको बोलना था, सब बोल चुके है, अब जो मै बोलता हूं उसे सब सुनो, रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले...!*#Vnita🙏🙏❤️*"हे! भरत भैया' कपि से उऋण हम नाही"*........*हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म लेे लें, #हनुमानजी से उऋण नही हो सकते।* *जय #श्री #हनुमान जी #महाराज की जय*

*हनुमानजी की दिव्य उधारी!!!!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️ *पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।*  *रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!* *अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।* *माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!* *कछुक दिवस जननी धरु धीरा।* *कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।* *निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।* *तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥* *मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जान...