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मूलाधार चक्र बाल वनिता महिला आश्रमआपका हृदय से बहुत बहुत स्वागत हैं मेरे इस अध्यात्मिक जगत के लेख में. आप कुशल मंगल होंगे यही कामना करती हूँ आज मैं आपके सामने फिर एक नए विषय पर चर्चा करने आयी हूँ और आशा करती हूँ की आपको इस विषय में रूचि लगे खैर ये विषय कोई रूचि लेने जैसा नहीं हैं, पर ये एक ज्ञान हैं जो शायद ही कोई इतने विस्तार से आपको बताएगा।आज में कुण्डलिनी शक्ति के पहले चक्र मूलाधार चक्र पर बात करुँगी और हम मूलाधार चक्र का वर्णन , मूलाधार मंत्र के बारे में विस्तार से और मूलाधार चक्र के संबंध में जानेंगे।मूलाधार चक्र वर्णन यह मूलाधार चक्र मानव शरीर के भीतर स्तित कुण्डलिनी शक्ति ७ चक्रों में से सबसे पहिला मूल चक्र हैं जिसे मूलाधार चक्र कहते हैं। मूलाधार चक्र हमारे शरीर के सबसे निचले हिस्से अनुत्रिक के आधार में स्तित हैं, इस चक्र का लाल रंग हैं और चार पँखुड़ियों का होता हैं। इसके बाएं पंखुड़ि के ऊपर ' सँ ' बीज अक्षर हैं ठीक उसके निचले पँखुड़ि के ऊपर ' षँ ' बीज अक्षर हैं इसी के सामने वाले पँखुड़ि पर ' शँ ' बीज अक्षर हैं और इसके ऊपर मतलब ' सँ ' बीज अक्षर के सामने ' वँ ' बीज अक्षर हैं और इसके ठीक बीच में ' लँ ' बीज अक्षर हैं जो की इस चक्र का मूल मंत्र हैं। इस चक्र में बायीं और डाकिनी और दायीं और शाकिनी विराजमान हैं ये महाकाली देवी के स्वरुप हैं अतः ये महाकाली ही स्तित हैं और यह हमारे कामवासना, प्रार्थना मांगने और पूरी करने की क्षमता और प्रार्थना को जीवन में स्तिर रखने की क्षमता रखती हैं।मतलब इनका यह पृथ्वी तत्व से सम्बंधित हैं इच्छा को पूर्ण करने की क्षमता प्रधान करती हैं।अगर कोई जिव इस चक्र और शक्ति का गलत इस्तेमाल करता हैं तो यहाँ देवी उसकी ज़िन्दगी का विनाश कर देती हैं।जैसे की कामवासना के चलते किसी स्त्री या पुरुष के साथ दुर्व्यवहार करना सम्मान न करना खुद का और दूसरों का भी, दूसरों को खुद के सामने छोटा ,पराया ,गलत, या फिर नींच हिन् भावना रखना, या फिर खुद का सम्मान न करना अपने खुद के या दूसरों के लिंगभेद से परेशान करना चीड़ना, शर्म करना या फिर खुद को या दूसरों को कोसते रहना ये सारी हरकतें करने से माँ कुण्डलिनी शक्ति मतलब महाकाली नाराज़ होकर हमें दंड देती हैं। और हमारा मूलाधार चक्र बंद हो जाता हैं और नतीजा हमें परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। ठीक इस चक्र में सात सूंड वाला हाथी भी हैं जो गणपती को दर्शाता हैं मतलब सुख, शांति, समृद्धि, निरोगी काया, सिद्धि, बुद्धि और मोक्ष प्रदान करते हैं। और ठीक बीच में त्रिकोण में शिवलिंग पिंड हैं जिसपे सर्प साढ़े तीन पेस मारकर निचे ज़मीन की ओर मुँह करके सोया हैं इसे कुण्डलिनी शक्ति भी कहा गया हैं। इस सर्प का जागना मतलब ही कुण्डलिनी शक्ति का जागरूक होना कहते हैं।इसके मंत्र को हमेशा शुद्ध भाव से ही जाप करना चाहिए ऐसा करने से आपको शक्ति का एहसास होगा मन शांत चित्त होगा और वातावरण भी सुगन्धित होता हैं साथ ही बुद्धि में और आयु में वृद्धि होती हैं। Image Source - Google | Image by - shirleytwofeathersBy समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबमूलाधार मंत्र के बारे में विस्तार से ' ल ' का मतलब हैं लय और उसपर जो बिंदु लगाकर ' लं ' संबोधते हैं वो महाकाल को संबोधते हैं ये आप नहीं जानते होंगे ,इसलिए आप कभी भी सोच समझकर ही इस मंत्र का सही तरीके से मार्गदर्शन से उच्चार करें।क्यूँकि तंत्र का निर्माण ही शिव शक्ति से हुआ हैं आप उनके इच्छा और कृपा के बिना आप मूलाधार चक्र जागरूक नहीं कर सकते हैं।ये मैं नहीं तंत्र और बड़े बड़े तपस्वी ऋषियों ने कहा हैं।ये चक्र मोह माया से भी संबंध रखता हैं। ये हमारे श्रीर के ७२००० नाड़ियों को वश में रखता हैं और इसी से जुड़कर ३ मुख्य नाड़ियाँ भी जुड़ी हुई रहती हैं वो इस प्रकार हैं, इंगला, पिंगला और सुषुन्मा ये अगर जागरूक हो जाए तो इंसान आम इंसान नहीं रहता वो भी देवता सामान बन जाता हैं उसमे अपार शक्तियाँ आ जाती हैं ,मतलब की उसे सिद्धियाँ हासिल होने लगती हैं।सिद्धियाँ हासिल होने का अर्थ ये हैं की अगर वो साधक कोई साधना करता हैं तो उसमे आम इंसान के मुक़ाबले में की क्षमता ज्यादा होती हैं ,उसमे कोई भी सिद्धि हासिल करने की बहुत अधिक तक क्षमता आ जाती हैं।इसके जागने से बुद्धि में वृद्धि होती हैं।इस चक्र का रंग लाल और काला होता हैं।काला रंग महाकाली को दर्शाता हैं और समय को भी इसे हम ब्लैकहोल भी कहते हैं जो समय से परे होता हैं यानी की साधक समय को अपने अनुसार चीज़ो को ढाल सकता हैं।महाकाली माँ को समय परिवर्तन की देवी भी कहते हैं जो वास्तव में स्तित हैं और जिनपर महाकाली माँ की कृपा हो जाये तो उसको अष्ट सिद्धियाँ हासिल होते हैं।और ये सात्विक साधना से प्राप्त होती हैं तो उसे स्वर्ग की अनुभूति होती हैं ,मगर कोई भी इंसान तामसिक साधना करेगा तो वो नरक ही पायेगा।जो व्यक्ती मोक्ष पाना चाहता हैं तो उसे सात्विक साधना ही करनी चाहिए।इसलिए मूलाधार चक्र को धीमी ध्यान से अथवा मंत्र जाप से ही जागरूक करना चाहिए या फिर किसी योग्य गुरु के निर्देशन से ही इसकी साधना करनी चाहिए। मूलाधार चक्र के संबंध में रंग - लाल ,काला। कमल - चार पंखुड़ियों वाला। मंत्र - 'लं 'तत्त्व - पृथ्वी। इष्ट देवता - पशुपती महादेव, महाकाली, गणेश। प्रतीक - कुंडलिनी , शिवलिंग ,त्रिकोण। ग्रह - मंगल। विशेष गुण - काम ( कामवासना ) .चरित्र - आलस्य। अंग / इंद्रिय - नाक स्थान - मेरुदण्ड में सबसे निचले हिस्से में , लिंग गुदा के बींच स्तित। जागरण होना - कल्पनाओ में रहना , अत्यधिक कामनाये होना , खुद को अलग समझना। चार पंखुड़ियाँ कमल - चार मुख्य नाड़ियाँ होना। संबंध - मोह माया, बुद्धि , मोक्ष। तो यह था मेरा आज का ज्ञान मुझे विश्वास हैं की आपको सही से मेरे ज्ञान और अनुभव से मार्गदर्शन प्राप्त हुआ होगा। आज आपने जाना की मूलाधार चक्र का क्या वर्णन होता हैं । हम अगले लेख में जानेंगे की कैसे इस चक्र को जागरूक करते हैं क्या विधियाँ हैं और क्या खाना चाहिए और भी बहुत कुछ।अब मैं अपने वाणी को विराम और आपके किंमती समय को प्रणाम करते हुए आपसे फिर मिलने की आज्ञा चाहती हूँ। तब तक आप अपना और अपनों का ख्याल रखे मिलती हूँ अगले लेख में तब तक आप भी ध्यान कीजिये और आनंद में रहिये। आप सभी पर प्रभु की कृपा रहें आपके घर में बरकत रहे और आपका जीवन आबाद रहें। 🙏 ,हर हर महादेव🙏

         मूलाधार चक्र   
बाल वनिता महिला आश्रम
आपका हृदय से बहुत बहुत स्वागत हैं मेरे इस अध्यात्मिक जगत के लेख में. आप कुशल मंगल होंगे यही कामना करती हूँ आज मैं आपके सामने फिर एक नए विषय पर चर्चा करने आयी हूँ और आशा करती हूँ की आपको इस विषय में रूचि लगे खैर ये विषय कोई रूचि लेने जैसा नहीं हैं, पर ये एक ज्ञान हैं जो शायद ही कोई इतने विस्तार से आपको बताएगा।आज में कुण्डलिनी शक्ति के पहले चक्र मूलाधार चक्र पर बात करुँगी और हम मूलाधार चक्र का वर्णन , मूलाधार मंत्र के बारे में विस्तार से और मूलाधार चक्र के संबंध में जानेंगे।
मूलाधार चक्र वर्णन  
यह मूलाधार चक्र मानव शरीर के भीतर स्तित कुण्डलिनी शक्ति ७ चक्रों में से सबसे पहिला मूल चक्र हैं जिसे मूलाधार चक्र कहते हैं। मूलाधार चक्र हमारे शरीर के सबसे निचले हिस्से अनुत्रिक के आधार में स्तित हैं, इस चक्र का लाल रंग हैं और चार पँखुड़ियों का होता हैं। इसके बाएं पंखुड़ि के ऊपर ' सँ ' बीज अक्षर हैं ठीक उसके निचले पँखुड़ि के ऊपर ' षँ ' बीज अक्षर हैं इसी के सामने वाले पँखुड़ि पर ' शँ ' बीज अक्षर हैं और इसके ऊपर मतलब ' सँ ' बीज अक्षर के सामने ' वँ ' बीज अक्षर हैं और इसके ठीक बीच में ' लँ ' बीज अक्षर हैं जो की इस चक्र का मूल मंत्र हैं। इस चक्र में बायीं और डाकिनी और दायीं और शाकिनी विराजमान हैं ये महाकाली देवी के स्वरुप हैं अतः ये महाकाली ही स्तित हैं और यह हमारे कामवासना, प्रार्थना मांगने और पूरी करने की क्षमता और प्रार्थना को जीवन में स्तिर रखने की क्षमता रखती हैं।मतलब इनका यह पृथ्वी तत्व से सम्बंधित हैं इच्छा को पूर्ण करने की क्षमता प्रधान करती हैं।अगर कोई जिव इस चक्र और शक्ति का गलत इस्तेमाल करता हैं तो यहाँ देवी उसकी ज़िन्दगी का विनाश कर देती हैं।जैसे की कामवासना के चलते किसी स्त्री या पुरुष के साथ दुर्व्यवहार करना सम्मान न करना खुद का और दूसरों का भी, दूसरों को खुद के सामने छोटा ,पराया ,गलत, या फिर नींच हिन् भावना रखना, या फिर खुद का सम्मान न करना अपने खुद के या दूसरों के लिंगभेद से परेशान करना चीड़ना, शर्म करना या फिर खुद को या दूसरों को कोसते रहना ये सारी हरकतें करने से माँ कुण्डलिनी शक्ति मतलब महाकाली नाराज़ होकर हमें दंड देती हैं। और हमारा मूलाधार चक्र बंद हो जाता हैं और नतीजा हमें परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। ठीक इस चक्र में सात सूंड वाला हाथी भी हैं जो गणपती को दर्शाता हैं मतलब सुख, शांति, समृद्धि, निरोगी काया, सिद्धि, बुद्धि और मोक्ष प्रदान करते हैं। और ठीक बीच में त्रिकोण में शिवलिंग पिंड हैं जिसपे सर्प साढ़े तीन पेस मारकर निचे ज़मीन की ओर मुँह करके सोया हैं इसे कुण्डलिनी शक्ति भी कहा गया हैं। इस सर्प का जागना मतलब ही कुण्डलिनी शक्ति का जागरूक होना कहते हैं।इसके मंत्र को हमेशा शुद्ध भाव से ही जाप करना चाहिए ऐसा करने से आपको शक्ति का एहसास होगा मन शांत चित्त होगा और वातावरण भी सुगन्धित होता हैं साथ ही बुद्धि में और आयु में वृद्धि होती हैं। 

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मूलाधार मंत्र के बारे में विस्तार से 
    ' ल ' का मतलब हैं लय और उसपर जो बिंदु लगाकर ' लं ' संबोधते हैं वो महाकाल को संबोधते हैं ये आप नहीं जानते होंगे ,इसलिए आप कभी भी सोच समझकर ही इस मंत्र का सही तरीके से मार्गदर्शन से उच्चार करें।क्यूँकि तंत्र का निर्माण ही शिव शक्ति से हुआ हैं आप उनके इच्छा और कृपा के बिना आप मूलाधार चक्र जागरूक नहीं कर सकते हैं।ये मैं नहीं तंत्र और बड़े बड़े तपस्वी ऋषियों ने कहा हैं।ये चक्र मोह माया से भी संबंध रखता हैं। ये हमारे श्रीर के ७२००० नाड़ियों को वश में रखता हैं और इसी से जुड़कर ३ मुख्य नाड़ियाँ भी जुड़ी हुई रहती हैं वो इस प्रकार हैं, इंगला, पिंगला और सुषुन्मा ये अगर जागरूक हो जाए तो इंसान आम इंसान नहीं रहता वो भी देवता सामान बन जाता हैं उसमे अपार शक्तियाँ आ जाती हैं ,मतलब की उसे सिद्धियाँ हासिल होने लगती हैं।सिद्धियाँ हासिल होने का अर्थ ये हैं की अगर वो साधक कोई साधना करता हैं तो उसमे आम इंसान के मुक़ाबले में की क्षमता ज्यादा होती हैं ,उसमे कोई भी सिद्धि हासिल करने की बहुत अधिक तक क्षमता आ जाती हैं।इसके जागने से बुद्धि में वृद्धि होती हैं।इस चक्र का रंग लाल और काला होता हैं।काला रंग महाकाली को दर्शाता हैं और समय को भी इसे हम ब्लैकहोल भी कहते हैं जो समय से परे होता हैं यानी की साधक समय को अपने अनुसार चीज़ो को ढाल सकता हैं।महाकाली माँ को समय परिवर्तन की देवी भी कहते हैं जो वास्तव में स्तित हैं और जिनपर महाकाली माँ की कृपा हो जाये तो उसको अष्ट सिद्धियाँ हासिल होते हैं।और ये सात्विक साधना से प्राप्त होती हैं तो उसे स्वर्ग की अनुभूति होती हैं ,मगर कोई भी इंसान तामसिक साधना करेगा तो वो नरक ही पायेगा।जो व्यक्ती मोक्ष पाना चाहता हैं तो उसे सात्विक साधना ही करनी चाहिए।इसलिए मूलाधार चक्र को धीमी ध्यान से अथवा मंत्र जाप से ही जागरूक करना चाहिए या फिर किसी योग्य गुरु के निर्देशन से ही इसकी साधना करनी चाहिए। 
मूलाधार चक्र के संबंध में 
रंग - लाल ,काला। 
कमल - चार पंखुड़ियों वाला। 
मंत्र - 'लं '
तत्त्व - पृथ्वी। 
इष्ट देवता - पशुपती महादेव, महाकाली, गणेश। 
प्रतीक - कुंडलिनी , शिवलिंग ,त्रिकोण। 
ग्रह - मंगल। 
विशेष गुण - काम ( कामवासना ) .
चरित्र - आलस्य। 
अंग / इंद्रिय - नाक 
स्थान - मेरुदण्ड में सबसे निचले हिस्से में , लिंग गुदा के बींच स्तित। 
जागरण होना - कल्पनाओ में रहना , अत्यधिक कामनाये होना , खुद को अलग समझना। 
चार पंखुड़ियाँ कमल - चार मुख्य नाड़ियाँ होना। 
संबंध - मोह माया, बुद्धि , मोक्ष। 
तो यह था मेरा आज का ज्ञान मुझे विश्वास हैं की आपको सही से मेरे ज्ञान और अनुभव से मार्गदर्शन प्राप्त हुआ होगा। आज आपने जाना की मूलाधार चक्र का क्या वर्णन होता हैं । हम अगले लेख में जानेंगे की कैसे इस चक्र को जागरूक करते हैं क्या विधियाँ हैं और क्या खाना चाहिए और भी बहुत कुछ।अब मैं अपने वाणी को विराम और आपके किंमती समय को प्रणाम करते हुए आपसे फिर मिलने की आज्ञा चाहती हूँ। तब तक आप अपना और अपनों का ख्याल रखे मिलती हूँ अगले लेख में तब तक आप भी ध्यान कीजिये और आनंद में रहिये। आप सभी पर प्रभु की कृपा रहें आपके घर में बरकत रहे और आपका जीवन आबाद रहें।  

                    🙏 ,हर हर महादेव🙏 

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मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य 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जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

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*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

राम राम जी

जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही क्यों तोड़ दिया था? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//          🌹🌹🙏🙏🌹🌹 वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने राम सेतु का निर्माण रावण के वध हेतु लंका जाने के लिए करवाया था। समुद्र पर बने इस पुल का निर्माण वानरों, रीछ और नल नील भाइयों की निगरानी में हुआ था। नल नील विश्वकर्मा के पुत्र थे और उस समय के महान वास्तुविद माने जाते थे। बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि रामसेतु को भगवान श्री राम ने स्वयं तोड़ा था। पद्म पुराण के सृष्टि खंड में इसकी कथा विस्तारपूर्वक मिलती है। पदम पुराण के मुताबिक जब श्री राम रावण का वध करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो गया था, तब एक दिन उनके मन में विभीषण से मिलने का विचार आया। उन्होंने सोचा कि रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं! ऐसा विचार मन में आने के बाद जब श्री राम लंका जाने की सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्री राम ने उन्हे...