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संपूर्ण रामायण पढ़ने का पुण्य फल दिलवाएगा इस एक मंत्र का जाप By वनिता कासनियां पंजाब भारतवासी जहां कहीं भी गए वे संपूर्ण रामायण (Ramayan) को भी साथ ले गए। उनके विश्वास का वृक्ष, रामायण स्थानीय परिवेश में भी फलता-फूलता रहा। प्राकृतिक कारणों से उनकी आकृति में संशोधन और परिवर्तन अवश्य हुआ किन्तु उन्होंने शिला खंडों पर खोद कर जो उनका इतिहास छोड़ा था, वह आज भी उनकी कहानी कह रहा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, रामायण का पाठ करने वाला पुण्य फल पाता है और पापों से कोसों दूर रहता है। बदलते परिवेश में संपूर्ण रामायण का पाठ करना हर किसी के लिए संभव नहीं है। यदि प्रतिदिन एक मंत्र का जाप कर लिया जाए तो संपूर्ण रामायण पढ़ने का पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं। इस चमत्कारी मंत्र को एक श्लोकी रामायण के नाम से भी संबंधित किया जाता है। संपूर्ण रामायण का ज्ञान करने वाला मंत्रआदि राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्। वैदीदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्। पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।रामायण में गृहस्थ जीवन, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पतिव्रत धर्म, आदर्श स्त्री-पुरुष, बालक, वृद्ध और युवा सबके लिए समान उपयोगी एवं सर्वोपरि शिक्षा को प्रस्तुत किया गया हैरामायण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन तथा परम अमृत रूप है अत: सदा भक्ति भाव से उसका श्रवण करना चाअच्छे संस्कारों की स्त्रियां मनुष्य को अनंत और अनादि गहरे मोह से पार कर देती हैं। शास्त्र, गुरु और पुत्र आदि में से कोई भी संसार से पार उतारने में इतना सहायक नहीं है जितनी स्नेह से भरी हुई अच्छे कुलों की स्त्रियां अपने पतियों को पार उतारने में सहायक होती हैं। संस्कारवान स्त्रियां अपने पति की सखा, बंधु, सुहृद, सेवक, गुरु, मित्र, धन, सुख, शास्त्र, मंदिर और दास आदि सभी कुछ होती हैंगुरुजनों की सेवा करने से स्वयं, धन-धान्य, विद्या और सुख कुछ भी प्राप्त होना दुर्लभ नहींपिता की हुई भूल को जो पुत्र सुधार देता है वही उत्तम संतान है। जो ऐसा नहीं करता वह श्रेष्ठ संतान नहीं है। माता और पिता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का धर्म है। पुत्र ‘पुत्’ नामक नरक से पिता का उद्धार करता है, जो पितरों की सब ओर से रक्षा करता है। पिता की सेवा करने से जो कल्याण प्राप्त होता है, वैसा कल्याण न सत्य से न दान से और न पर्याप्त दक्षिणा से प्राप्त होता है। माता-पिता और गुरु के समान अन्य कोई देवता इस पृथ्वी पर नहीं है क्योंकि इनकी सेवा करने से धर्म, अर्थ, काम और तीनों लोकों की प्राप्ति होती हैउत्साह ही बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है। जो व्यक्ति उत्साही है, उसके लिए संसार में कुछ भी प्राप्त करना कठिन नपापी, घृणित और क्रूर लोग ऐश्वर्य को पाकर भी उसी प्रकार सदैव नहीं रह पाते, जैसे खोखली जड़ वाले पेड़ अधिक समय तक खड़े नहीं रहते हैंजिस प्रकार नदी का जल प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार ढलती हुई अवस्था भी पुन: नहीं लौटती। अत: अपनी आत्मा को कल्याण के साधन-भूत धर्म में लगाना ही अभिष्ट है। मनुष्य जो भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसी के फलस्वरूप वह सुख या दुख भोगताजो प्राणियों को संकट में डालने वाला, क्रूर और पापकर्म में रत है, वह यदि तीनों लोकों का ईश्वर हो तो भी अधिक समय तक टिक नहीं सकता। उसे सब लोग सामने आए हुए सर्प की भांति मार डालते शत्रु और विषैले सांपों के साथ रहना पड़े तो रह लें किन्तु शत्रु की सेवा करने वाले मित्र के साथ कभी न रहें। मित्र अमीर हो या गरीब, सुखी हो या दुखी, निर्दोष हो या सदोष वह मित्र के लिए सबसे बड़ा सहायक होता ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिसके करने से कोई मान-सम्मान न हो और जो धर्म विरुद्ध हो। मन की वास्तविक स्थिति एवं स्वरूप का जिन्हें ज्ञान हो गया है, उनका चित्त शांत, सनातन ब्रह्म के रूप में अनुभूत होता ’ है।।हिए।। ।Chanting of this one mantra will get the virtuous fruit of reading the entire Ramayana By Vnita Kasnia Punjab Wherever the Indians went, they also took the entire Ramayana with them. The Tree of His Faith, Ramayana Place,

संपूर्ण रामायण पढ़ने का पुण्य फल दिलवाएगा इस एक मंत्र का जाप



 
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     भारतवासी जहां कहीं भी गए वे संपूर्ण रामायण (Ramayan) को भी साथ ले गए। उनके विश्वास का वृक्ष, रामायण स्थानीय परिवेश में भी फलता-फूलता रहा। प्राकृतिक कारणों से उनकी आकृति में संशोधन और परिवर्तन अवश्य हुआ किन्तु उन्होंने शिला खंडों पर खोद कर जो उनका इतिहास छोड़ा था, वह आज भी उनकी कहानी कह रहा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, रामायण का पाठ करने वाला पुण्य फल पाता है और पापों से कोसों दूर रहता है। बदलते परिवेश में संपूर्ण रामायण का पाठ करना हर किसी के लिए संभव नहीं है। यदि प्रतिदिन एक मंत्र का जाप कर लिया जाए तो संपूर्ण रामायण पढ़ने का पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं। इस चमत्कारी मंत्र को एक श्लोकी रामायण के नाम से भी संबंधित किया जाता है। 

     

    संपूर्ण रामायण का ज्ञान करने वाला मंत्र


    आदि राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्। वैदीदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।

    बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्। पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।



    रामायण में गृहस्थ जीवन, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पतिव्रत धर्म, आदर्श स्त्री-पुरुष, बालक, वृद्ध और युवा सबके लिए समान उपयोगी एवं सर्वोपरि शिक्षा को प्रस्तुत किया गया है



    रामायण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन तथा परम अमृत रूप है अत: सदा भक्ति भाव से उसका श्रवण करना चा



    अच्छे संस्कारों की स्त्रियां मनुष्य को अनंत और अनादि गहरे मोह से पार कर देती हैं। शास्त्र, गुरु और पुत्र आदि में से कोई भी संसार से पार उतारने में इतना सहायक नहीं है जितनी स्नेह से भरी हुई अच्छे कुलों की स्त्रियां अपने पतियों को पार उतारने में सहायक होती हैं। संस्कारवान स्त्रियां अपने पति की सखा, बंधु, सुहृद, सेवक, गुरु, मित्र, धन, सुख, शास्त्र, मंदिर और दास आदि सभी कुछ होती हैं



    गुरुजनों की सेवा करने से स्वयं, धन-धान्य, विद्या और सुख कुछ भी प्राप्त होना दुर्लभ नहीं



    पिता की हुई भूल को जो पुत्र सुधार देता है वही उत्तम संतान है। जो ऐसा नहीं करता वह श्रेष्ठ संतान नहीं है। माता और पिता की आज्ञा का पालन करना पुत्र का धर्म है। पुत्र ‘पुत्’ नामक नरक से पिता का उद्धार करता है, जो पितरों की सब ओर से रक्षा करता है। पिता की सेवा करने से जो कल्याण प्राप्त होता है, वैसा कल्याण न सत्य से न दान से और न पर्याप्त दक्षिणा से प्राप्त होता है। माता-पिता और गुरु के समान अन्य कोई देवता इस पृथ्वी पर नहीं है क्योंकि इनकी सेवा करने से धर्म, अर्थ, काम और तीनों लोकों की प्राप्ति होती है



    उत्साह ही बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं है। जो व्यक्ति उत्साही है, उसके लिए संसार में कुछ भी प्राप्त करना कठिन न



    पापी, घृणित और क्रूर लोग ऐश्वर्य को पाकर भी उसी प्रकार सदैव नहीं रह पाते, जैसे खोखली जड़ वाले पेड़ अधिक समय तक खड़े नहीं रहते हैं



    जिस प्रकार नदी का जल प्रवाह पीछे नहीं लौटता, उसी प्रकार ढलती हुई अवस्था भी पुन: नहीं लौटती। अत: अपनी आत्मा को कल्याण के साधन-भूत धर्म में लगाना ही अभिष्ट है। मनुष्य जो भी शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसी के फलस्वरूप वह सुख या दुख भोगता



    जो प्राणियों को संकट में डालने वाला, क्रूर और पापकर्म में रत है, वह यदि तीनों लोकों का ईश्वर हो तो भी अधिक समय तक टिक नहीं सकता। उसे सब लोग सामने आए हुए सर्प की भांति मार डालते 



    शत्रु और विषैले सांपों के साथ रहना पड़े तो रह लें किन्तु शत्रु की सेवा करने वाले मित्र के साथ कभी न रहें। मित्र अमीर हो या गरीब, सुखी हो या दुखी, निर्दोष हो या सदोष वह मित्र के लिए सबसे बड़ा सहायक होता 



    ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिसके करने से कोई मान-सम्मान न हो और जो धर्म विरुद्ध हो। मन की वास्तविक स्थिति एवं स्वरूप का जिन्हें ज्ञान हो गया है, उनका चित्त शांत, सनातन ब्रह्म के रूप में अनुभूत होता ’ है।।हिए।। ।



    Chanting of this one mantra will get the virtuous fruit of reading the entire Ramayana By Vnita Kasniya PunjabWherever the Indians went, they also took the entire Ramayana with them. The Tree of His Faith, Ramayana Place

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    राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By वनिता कासनियां पंजाब श्रीगणेश के अवतारहम सबने भगवान विष्णु के दशावतार और भगवान शंकर के १९ अवतारों के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे "अष्टरूप" कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं।वक्रतुंड: मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड वाले "वक्रतुंड" अवतार लिया और मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश 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था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

    राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

    *विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

    *विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

    *हनुमानजी की दिव्य उधारी!!!!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान 🙏🙏❤️*पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।* *रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!**अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।**माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!**कछुक दिवस जननी धरु धीरा।**कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।**निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।**तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥**मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए,आप किसी और से बुलवा लो।**अब बारी आई लक्षमण जी की तो लक्ष्मण जी ने कहा, मै तो लंका के रणभूमि में वैसे ही मरणासन्न अवस्था में पड़ा था, पूरा रामदल विलाप कर रहा था।**प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।**आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।**ये जो खड़ा है ना , वो हनुमानजी का लक्ष्मण है। मै कैसे बोलूं, किस मुंह से बोलूं कि हनुमानजी अयोध्या से चले जाएं!**अब बारी आई भरत जी की, अरे! भरत जी तो इतना रोए, कि रामजी को अयोध्या से निकलवाने का कलंक तो वैसे ही लगा है मुझ पर, हनुमान जी का सब मिलके और लगवा दो!**और दूसरी बात ये कि...!**बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना।* *अधम कवन जग मोहि समाना॥**मैंने तो नंदीग्राम में ही अपनी चिता लगा ली थी, वो तो हनुमानजी थे जिन्होंने आकर ये खबर दी कि...!**रिपु रन जीति सुजस सुर गावत।**सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥**मैं तो बिल्कुल न बोलूं हनुमानजी से अयोध्या छोड़कर चले जाओ, आप किसी और से बुलवा लो।**अब बचा कौन..? सिर्फ शत्रुघ्न भैया। जैसे ही सब ने उनकी तरफ देखा, तो शत्रुघ्न भैया बोल पड़े मैंने तो पूरी रामायण में कहीं नहीं बोला, तो आज ही क्यों बुलवा रहे हो, और वो भी हनुमानजी को अयोध्या से निकालने के लिए, जिन्होंने ने माता सीता, लक्षमण भैया, भरत भैया सब के प्राणों को संकट से उबारा हो! किसी अच्छे काम के लिए कहते तो बोल भी देता। मै तो बिल्कुल भी न बोलूं।**अब बचे तो मेरे राघवेन्द्र सरकार,* *माता सीता ने कहा प्रभु! आप तो तीनों लोकों ये स्वामी है, और देखती हूं आप हनुमानजी से सकुचाते है।और आप खुद भी कहते हो कि...!**प्रति उपकार करौं का तोरा।* *सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥**आखिर आप के लिए क्या अदेय है प्रभु! राघवजी ने कहा देवी कर्जदार जो हूं, हनुमान जी का, इसीलिए तो**सनमुख होइ न सकत मन मोरा**देवी! हनुमानजी का कर्जा उतारना आसान नहीं है, इतनी सामर्थ्य राम में नहीं है, जो "राम नाम" में है। क्योंकि कर्जा उतारना भी तो बराबरी का ही पड़ेगा न...! यदि सुनना चाहती हो तो सुनो हनुमानजी का कर्जा कैसे उतारा जा सकता है।**पहले हनुमान विवाह करें*,*लंकेश हरें इनकी जब नारी।**मुदरी लै रघुनाथ चलै,निज पौरुष लांघि अगम्य जे वारी।**अायि कहें, सुधि सोच हरें, तन से, मन से होई जाएं उपकारी।**तब रघुनाथ चुकायि सकें, ऐसी हनुमान की दिव्य उधारी।।**देवी! इतना आसान नहीं है, हनुमान जी का कर्जा चुकाना। मैंने ऐसे ही नहीं कहा था कि...!**"सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"**मैंने बहुत सोच विचार कर कहा था। लेकिन यदि आप कहती हो तो कल राज्य सभा में बोलूंगा कि हनुमानजी भी कुछ मांग लें।**दूसरे दिन राज्य सभा में सब एकत्र हुए,सब बड़े उत्सुक थे कि हनुमानजी क्या मांगेंगे, और रामजी क्या देंगे।**रामजी ने हनुमान जी से कहा! सब लोगों ने मेरी बहुत सहायता की और मैंने, सब को कोई न कोई पद दे दिया। विभीषण और सुग्रीव को क्रमशः लंका और किष्कन्धा का राजपद,अंगद को युवराज पद। तो तुम भी अपनी इच्छा बताओ...?**हनुमानजी बोले! प्रभु आप ने जितने नाम गिनाए, उन सब को एक एक पद मिला है, और आप कहते हो...!**"तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना"**तो फिर यदि मै दो पद मांगू तो..?**सब लोग सोचने लगे बात तो हनुमानजी भी ठीक ही कह रहे हैं। रामजी ने कहा! ठीक है, मांग लो, सब लोग बहुत खुश हुए कि आज हनुमानजी का कर्जा चुकता हुआ।**हनुमानजी ने कहा! प्रभु जो पद आप ने सबको दिए हैं, उनके पद में राजमद हो सकता है, तो मुझे उस तरह के पद नहीं चाहिए, जिसमे राजमद की शंका हो, तो फिर...! आप को कौन सा पद चाहिए...?**हनुमानजी ने रामजी के दोनों चरण पकड़ लिए, प्रभु ..! हनुमान को तो बस यही दो पद चाहिए।**हनुमत सम नहीं कोउ बड़भागी।**नहीं कोउ रामचरण अनुरागी।।**जानकी जी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राघवजी बोले, लो उतर गया हनुमानजी का कर्जा!**और अभी तक जिसको बोलना था, सब बोल चुके है, अब जो मै बोलता हूं उसे सब सुनो, रामजी भरत भैया की तरफ देखते हुए बोले...!*#Vnita🙏🙏❤️*"हे! भरत भैया' कपि से उऋण हम नाही"*........*हम चारों भाई चाहे जितनी बार जन्म लेे लें, #हनुमानजी से उऋण नही हो सकते।* *जय #श्री #हनुमान जी #महाराज की जय*

    *हनुमानजी की दिव्य उधारी!!!!!!!! #बाल #वनिता #महिला #वृद्ध #आश्रम की #अध्यक्ष #श्रीमती #वनिता_कासनियां #पंजाब #संगरिया #राजस्थान🙏🙏❤️ *पढ़ कर आनन्द ही आनन्द होगा जी,*सब पर कर्जा हनुमान जी का,सब ऋणी हनुमानजी महाराज के।*  *रामजी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो, भगवान ने विभीषण जी, जामवंत जी, अंगद जी, सुग्रीव जी सब को अयोध्या से विदा किया। तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में बिदा करेंगे, लेकिन रामजी ने हनुमानजी को विदा ही नहीं किया,अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात सब गए हनुमानजी नहीं गए अयोध्या से!* *अब दरबार में काना फूसी शुरू हुई कि हनुमानजी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमानजी चले जाएं।* *माता सीता बोलीं मैं तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक एक दिन एक एक कल्प के समान बीत रहा था, वो तो हनुमानजी थे,जो प्रभु मुद्रिका लेके गए, और धीरज बंधवाया कि...!* *कछुक दिवस जननी धरु धीरा।* *कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।* *निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।* *तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥* *मै तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जान...