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सम्पूर्ण रामायण चरण स्पर्श करने का वैज्ञानिक रहस्य जान जाओगे तो प्रतिदिन अपने बच्चों को यह सिखा दोंगे!!!!!! By वनिता कासनियां पंजाब प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥भावार्थ:-श्री रघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगर का काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मन में बड़े हर्षित होते हैं॥हैलो हाय कहने से आधुनिक और स्मार्ट होने का कितना ही गर्व महसूस होता हो आपको लेकिन प्रणाम में जैसी आश्वस्तता प्रतीत होती है वह अद्भुत अलौकिक है और लगता है कि भीतर ऊर्जा का उफान उठ रहा है जो भाव, बोध और मस्तिष्क में रहने वाले बुद्धि का अतिक्रमण करते हुए ऊपर ही ऊपर फैलता जा रहा है झुककर या हाथ मिलाकर अथवा गले लगकर किसी का अभिवादन करने से आपसी संबंध तो प्रगाढ़ हो सकते हैं तथा व्यक्ति के सभ्य सुसंस्कृत होने की छवि भी बनती है लेकिन झुककर अभिवादन करने का अलग ही महत्व है-प्रणाम के लिए जब हम गुरुजनों के चरणों में झुकते हैं तो उनकी प्राण ऊर्जा से जुड़ जाते हैं और वह ऊर्जा प्रणाम करने वाले की चेतना को भी ऊपर उठाती है अगर निम्न स्तर के लोगों को प्रणाम किया जाए तो उससे हानि की संभावना ही ज्यादा रहती है क्योंकि उस स्थिति में प्राण प्रवाह उलटी दिशा में बहने लगता है- नमस्ते करने के लिए, दोनो हाथों को अनाहत चक पर रखा जाता है, आँखें बंद की जाती हैं, और सिर को झुकाया जाता है-इस विधि का विस्तार करते हुए हाथों को स्वाधिष्ठान चक्र (भौहों के बीच का चक्र) पर रखकर सिर झुकाकर और हाथों को हृदय के पास लाकर भी नमस्ते किया जा सकता है- जरूरी नहीं कि नमस्ते, नमस्कार या प्रणाम करते हुए ये शब्द बोले भी जाएं- नमस्कार या प्रणाम की भावमुद्रा का अर्थ ही उस भाव की अभिव्यक्ति है। आपने देखा होगा जो वास्तव में उच्चकोटि का तपस्वी या साधक है अपने चरणों का स्पर्श क्यों नहीं करने देता है क्युकि उसकी संचरित प्राण-उर्जा कही आप में न समां जाए क्युकि साधक ने ये उर्जा अपने तप और साधना से अपने अंदर समाहित की है यदि वास्तविक श्रेष्ठ साधक या तपस्वी चाहे तो अपने शिष्य को सिर्फ एक ही पल में शक्तिपाद द्वारा अपने जैसा योग्य बना सकता है और अपने द्वारा प्राप्त की गई सभी सिद्धयो एक पल में दे सकता है –अपने से बड़ों का अभिवादन करने के लिए चरण छूने की परंपरा सदियों से रही है सनातन धर्म में अपने से बड़े के आदर के लिएचरण स्पर्श उत्तम माना गया है प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर चरण स्पर्श के कई फायदे हैंचरण छूने का मतलब है पूरी श्रद्धा के साथ किसी के आगे नतमस्तक होना-इससे विनम्रताआती है और मन को शांति मिलती है साथ ही चरण छूने वाला दूसरों को भी अपने आचरण से प्रभावित करने में कामयाब होता है-हर रोज बड़ों के अभि‍वादन से आयु, विद्या, यश और बल में बढ़ोतरी होती है-माना जाता है कि पैर के अंगूठे से भी शक्ति का संचार होता है मनुष्य के पांव के अंगूठे में भी ऊर्जा प्रसारित करने की शक्ति होती है-मान्यता है कि बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श नियमित तौर पर करने से कई प्रतिकूल ग्रहभी अनुकूल हो जाते हैं-प्रणाम करने का एक फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है. इन्हीं कारणों से बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया है-जब हम किसी आदरणीय व्यक्ति के चरण छूते हैं, तो आशीर्वाद के तौर पर उनका हाथ हमारे सिर के उपरी भाग को और हमारा हाथ उनके चरण को स्पर्श करता है ऐसी मान्यता है कि इससे उस पूजनीय व्यक्ति की पॉजिटिव एनर्जी आशीर्वाद के रूप में हमारे शरीर में प्रवेश करती है इससे हमारा आध्यात्मिक तथा मानसिक विकास होता है।वैज्ञानिक पक्ष : न्यूटन के नियम के अनुसार, दुनिया में सभी चीजें गुरुत्वाकर्षण के नियम से बंधी हैं साथ ही गुरुत्व भार सदैव आकर्षित करने वाले की तरफ जाता है हमारे शरीर पर भी यही नियम लागू होता है सिर को उत्तरी ध्रुव और पैरों को दक्षिणी ध्रुव माना गया है।इसका मतलब यह हुआ कि गुरुत्व ऊर्जा या चुंबकीय ऊर्जा हमेशा उत्तरी ध्रुव से प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव की ओर प्रवाहित होकर अपना चक्र पूरा करती है- यानी शरीर में उत्तरी ध्रुव (सिर) से सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव (पैरों) की ओर प्रवाहित होती है दक्षिणी ध्रुव पर यह ऊर्जा असीमित मात्रा में स्थिर हो जाती है- पैरों की ओर ऊर्जा का केंद्र बन जाता है-पैरों से हाथों द्वारा इस ऊर्जा के ग्रहण करने को ही हम ‘चरण स्पर्श’ कहते हैंमानव शरीर पंच तत्वों से निर्मित है जो सजातीय तत्वों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है- मित्रता, स्नेह , ममता व प्रेम इसी आकर्षण की उपज है- यह आकर्षण या खिंचाव एक चुम्बकीय गुण है- प्रत्येक जीवधारी में एक ही समय में तीन वैज्ञानिक सिध्दांत एक साथ कार्य करते रहते हैं।चुम्बकीय शक्ति,तात्विक गुण,वुद्युतीय उर्जा।हम अगर चिन्तन मनन करे तो पाते है की प्रतिदिन हम अनेक लोगों से मिलते है , उनमें से कुछ को हम याद नहीं रखते और कुछ के साथ हमारा मित्रता का भाव प्रकट हो जाता है और उनसे ये लगाव,मित्रता या खिंचाव उस व्यक्ति विशेष में समाहित चुम्बकीय गुण के कारण होता है जो सजातीय गुण वाले व्यक्ति को अपनी और आकर्षित करता है –आपके शरीर की उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति में पहुंचती है- श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर उर्जा में मौजूद नकारात्मक तत्व नष्ट हो जाता है- सकारात्मक उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति से आशीर्वाद के माध्यम से वापस मिल जाती है- इससे जिन उद्देश्यों को मन में रखकर आप बड़ों को प्रणाम करते हैं उस लक्ष्य को पाने का बल मिलता है-पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है- यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है- पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है- पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं- पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम- झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है- दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है-इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है- प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है- किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है- इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया-प्रत्येक रोज़ प्रातकाल में और किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले हमें अपने घर के बड़े बुजर्गों के ,माता पिता के चरण स्पर्श अवश्य करने चाहिए ,इससे हमारे कार्य में सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है , हमारा मनोबल बढ़ता है और सकारात्मक उर्जा मिलती है नकारात्मक शक्ति घटती है।Sampoorna RamayanaIf you know the scientific secret of touching feet, then you will teach this to your children everyday!!!!!!By Vnita Kasnia PunjabWake up in the morning, Raghunatha. Mother Father Guru Naahim Mathaaisu magi

चरण स्पर्श करने का वैज्ञानिक रहस्य जान जाओगे तो प्रतिदिन अपने बच्चों को यह सिखा दोंगे!!!!!!

By वनिता कासनियां पंजाब

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगर का काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मन में बड़े हर्षित होते हैं॥

हैलो हाय कहने से आधुनिक और स्मार्ट होने का कितना ही गर्व महसूस होता हो आपको लेकिन प्रणाम में जैसी आश्वस्तता प्रतीत होती है वह अद्भुत अलौकिक है और लगता है कि भीतर ऊर्जा का उफान उठ रहा है जो भाव, बोध और मस्तिष्क में रहने वाले बुद्धि का अतिक्रमण करते हुए ऊपर ही ऊपर फैलता जा रहा है झुककर या हाथ मिलाकर अथवा गले लगकर किसी का अभिवादन करने से आपसी संबंध तो प्रगाढ़ हो सकते हैं तथा व्यक्ति के सभ्य सुसंस्कृत होने की छवि भी बनती है लेकिन झुककर अभिवादन करने का अलग ही महत्व है-

प्रणाम के लिए जब हम गुरुजनों के चरणों में झुकते हैं तो उनकी प्राण ऊर्जा से जुड़ जाते हैं और वह ऊर्जा प्रणाम करने वाले की चेतना को भी ऊपर उठाती है अगर निम्न स्तर के लोगों को प्रणाम किया जाए तो उससे हानि की संभावना ही ज्यादा रहती है क्योंकि उस स्थिति में प्राण प्रवाह उलटी दिशा में बहने लगता है- नमस्ते करने के लिए, दोनो हाथों को अनाहत चक पर रखा जाता है, आँखें बंद की जाती हैं, और सिर को झुकाया जाता है-

इस विधि का विस्तार करते हुए हाथों को स्वाधिष्ठान चक्र (भौहों के बीच का चक्र) पर रखकर सिर झुकाकर और हाथों को हृदय के पास लाकर भी नमस्ते किया जा सकता है- जरूरी नहीं कि नमस्ते, नमस्कार या प्रणाम करते हुए ये शब्द बोले भी जाएं- नमस्कार या प्रणाम की भावमुद्रा का अर्थ ही उस भाव की अभिव्यक्ति है। 

आपने देखा होगा जो वास्तव में उच्चकोटि का तपस्वी या साधक है अपने चरणों का स्पर्श क्यों नहीं करने देता है क्युकि उसकी संचरित प्राण-उर्जा कही आप में न समां जाए क्युकि साधक ने ये उर्जा अपने तप और साधना से अपने अंदर समाहित की है यदि वास्तविक श्रेष्ठ साधक या तपस्वी चाहे तो अपने शिष्य को सिर्फ एक ही पल में शक्तिपाद द्वारा अपने जैसा योग्य बना सकता है और अपने द्वारा प्राप्त की गई सभी सिद्धयो एक पल में दे सकता है –

अपने से बड़ों का अभिवादन करने के लिए चरण छूने की परंपरा सदियों से रही है सनातन धर्म में अपने से बड़े के आदर के लिएचरण स्पर्श उत्तम माना गया है प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर चरण स्पर्श के कई फायदे हैं

चरण छूने का मतलब है पूरी श्रद्धा के साथ किसी के आगे नतमस्तक होना-इससे विनम्रताआती है और मन को शांति मिलती है साथ ही चरण छूने वाला दूसरों को भी अपने आचरण से प्रभावित करने में कामयाब होता है-हर रोज बड़ों के अभि‍वादन से आयु, विद्या, यश और बल में बढ़ोतरी होती है-

माना जाता है कि पैर के अंगूठे से भी शक्ति का संचार होता है मनुष्य के पांव के अंगूठे में भी ऊर्जा प्रसारित करने की शक्ति होती है-

मान्यता है कि बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श नियमित तौर पर करने से कई प्रतिकूल ग्रहभी अनुकूल हो जाते हैं-

प्रणाम करने का एक फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है. इन्हीं कारणों से बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया है-

जब हम किसी आदरणीय व्यक्ति के चरण छूते हैं, तो आशीर्वाद के तौर पर उनका हाथ हमारे सिर के उपरी भाग को और हमारा हाथ उनके चरण को स्पर्श करता है ऐसी मान्यता है कि इससे उस पूजनीय व्यक्ति की पॉजिटिव एनर्जी आशीर्वाद के रूप में हमारे शरीर में प्रवेश करती है इससे हमारा आध्यात्मिक तथा मानसिक विकास होता है।

वैज्ञानिक पक्ष : न्यूटन के नियम के अनुसार, दुनिया में सभी चीजें गुरुत्वाकर्षण के नियम से बंधी हैं साथ ही गुरुत्व भार सदैव आकर्षित करने वाले की तरफ जाता है हमारे शरीर पर भी यही नियम लागू होता है सिर को उत्तरी ध्रुव और पैरों को दक्षिणी ध्रुव माना गया है।

इसका मतलब यह हुआ कि गुरुत्व ऊर्जा या चुंबकीय ऊर्जा हमेशा उत्तरी ध्रुव से प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव की ओर प्रवाहित होकर अपना चक्र पूरा करती है- यानी शरीर में उत्तरी ध्रुव (सिर) से सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर दक्षिणी ध्रुव (पैरों) की ओर प्रवाहित होती है दक्षिणी ध्रुव पर यह ऊर्जा असीमित मात्रा में स्थिर हो जाती है- पैरों की ओर ऊर्जा का केंद्र बन जाता है-पैरों से हाथों द्वारा इस ऊर्जा के ग्रहण करने को ही हम ‘चरण स्पर्श’ कहते हैं

मानव शरीर पंच तत्वों से निर्मित है जो सजातीय तत्वों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है- मित्रता, स्नेह , ममता व प्रेम इसी आकर्षण की उपज है- यह आकर्षण या खिंचाव एक चुम्बकीय गुण है- प्रत्येक जीवधारी में एक ही समय में तीन वैज्ञानिक सिध्दांत एक साथ कार्य करते रहते हैं।

चुम्बकीय शक्ति,तात्विक गुण,वुद्युतीय उर्जा।

हम अगर चिन्तन मनन करे तो पाते है की प्रतिदिन हम अनेक लोगों से मिलते है , उनमें से कुछ को हम याद नहीं रखते और कुछ के साथ हमारा मित्रता का भाव प्रकट हो जाता है और उनसे ये लगाव,मित्रता या खिंचाव उस व्यक्ति विशेष में समाहित चुम्बकीय गुण के कारण होता है जो सजातीय गुण वाले व्यक्ति को अपनी और आकर्षित करता है –

आपके शरीर की उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति में पहुंचती है- श्रेष्ठ व्यक्ति में पहुंचकर उर्जा में मौजूद नकारात्मक तत्व नष्ट हो जाता है- सकारात्मक उर्जा चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति से आशीर्वाद के माध्यम से वापस मिल जाती है- इससे जिन उद्देश्यों को मन में रखकर आप बड़ों को प्रणाम करते हैं उस लक्ष्य को पाने का बल मिलता है-

पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है- यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है- पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है- पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं- पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम- झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है- दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है-

इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है- प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है- किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है- इसलिए बड़ों को प्रणाम करने की परंपरा को नियम और संस्कार का रूप दे दिया गया-

प्रत्येक रोज़ प्रातकाल में और किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले हमें अपने घर के बड़े बुजर्गों के ,माता पिता के चरण स्पर्श अवश्य करने चाहिए ,इससे हमारे कार्य में सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है , हमारा मनोबल बढ़ता है और सकारात्मक उर्जा मिलती है नकारात्मक शक्ति घटती है।

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राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By वनिता कासनियां पंजाब श्रीगणेश के अवतारहम सबने भगवान विष्णु के दशावतार और भगवान शंकर के १९ अवतारों के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे "अष्टरूप" कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं।वक्रतुंड: मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड वाले "वक्रतुंड" अवतार लिया और मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

*विधि का विधान* भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक। और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया- *सुनहु भरत भावी प्रबल* *बिलखि कहेहूं मुनिनाथ* *हानि लाभ जीवन-मरण* *यश-अपयश विधि हाथ* अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा। *ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है। *ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।* #रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके। ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं। #वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा *मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।* ...

राम राम जी

जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही क्यों तोड़ दिया था? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//          🌹🌹🙏🙏🌹🌹 वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने राम सेतु का निर्माण रावण के वध हेतु लंका जाने के लिए करवाया था। समुद्र पर बने इस पुल का निर्माण वानरों, रीछ और नल नील भाइयों की निगरानी में हुआ था। नल नील विश्वकर्मा के पुत्र थे और उस समय के महान वास्तुविद माने जाते थे। बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि रामसेतु को भगवान श्री राम ने स्वयं तोड़ा था। पद्म पुराण के सृष्टि खंड में इसकी कथा विस्तारपूर्वक मिलती है। पदम पुराण के मुताबिक जब श्री राम रावण का वध करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो गया था, तब एक दिन उनके मन में विभीषण से मिलने का विचार आया। उन्होंने सोचा कि रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं! ऐसा विचार मन में आने के बाद जब श्री राम लंका जाने की सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्री राम ने उन्हे...