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देवर्षि नारद द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के गृहस्थ जीवन का दर्शन!!!!!!!• By वनिता कासनियां पंजाब भगवान की लीलाओं को पढ़ने-सुनने का अभिप्राय यह है कि उनकी भक्ति हमारे हृदय में आये । जैसे सुगंधित चीज को नाक से सूंघने पर, स्वादिष्ट चीज को जीभ से चखने पर और सुंदर चीज को आंखों से देखने पर उससे अपने-आप ही प्रेम हो जाता है; वैसे ही बार-बार भगवान की लीला कथाओं को पढ़ने-सुनने से भगवान से अपने-आप प्रेम हो जाता है । भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक दिव्य लीला के पीछे मानव के कल्याण की ही भावना निहित थी ।श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के उनहत्तरवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण के गृहस्थ जीवन का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया गया है ।श्रीकृष्ण के विवाह तो लोक में प्रसिद्ध हैं । ‘रुक्मिणी जी’ का उन्होंने हरण किया था । स्यमन्तकमणि की खोज में जाम्बवन्त से युद्ध करके उपहारस्वरूप वे ‘जाम्बवती जी’ को ले आए । ‘मणि’ के कारण कलंक लगाने के दोष से लज्जित सत्राजित ने अपनी पुत्री ‘सत्यभामा’ को स्वयं श्रीकृष्ण को प्रदान कर दिया । ‘कालिन्दी जी’ ने उनको तप करके पाया । ‘लक्ष्मणा जी’ के स्वयंवर का मत्स्यभेद करने में दूसरा और कोई समर्थ ही न हो सका । नग्नजित् राजा के सातों साँड़ एक साथ नाथ कर उनकी पुत्री ‘सत्या’ से श्रीकृष्ण ने विवाह किया । ‘मित्रविन्दा जी’ को उन्होंने स्वयं हरण किया । ‘भद्रा जी’ को स्वयं उनके पिता ने श्रीकृष्ण को प्रदान किया । यह तो श्रीकृष्ण की आठ पटरानियां हैं । इनके अलावा पृथ्वीदेवी के पुत्र भौमासुर (नरकासुर) ने सोलह हजार राजकन्याओं को बंदी बना रखा था, उनका भी उद्धार आवश्यक था । श्रीकृष्ण ने भौमासुर को मार कर उन राजकन्याओं को अपना कर उनका उद्धार-कार्य पूरा किया ।गीता में कर्मयोग का उपदेश देने वाले श्रीकृष्ण स्वयं सबसे बड़े कर्मयोगी है । कर्मयोगी कर्म और कर्मफल के साथ सम्बन्ध न रख कर केवल दूसरों के हित के लिए सब कर्म करता है । गीता के अनुसार ‘जो कर्म सब लोगों के उद्धार के लिए, आसक्ति, स्वार्थ और कामना को त्याग कर किया जाता है, वह बांधता नहीं और यह ‘यज्ञ’ है । यही ‘कर्म संन्यास’ है । जैसे सरोवर में कमलपत्र जलराशि से सदैव ऊपर उठे हुए उससे निर्लिप्त व अछूते रहते हैं; वैसे ही श्रीकृष्ण सोलह हजार से अधिक स्त्रियों के स्वामी होकर भी भोगी नहीं वरन् त्यागी हैं, कर्म-संन्यासी हैं ।श्रीकृष्ण एक रूप अनेक!!!!!!!देवर्षि नारद ने जब सुना कि भगवान श्रीकृष्ण ने भौमासुर को मार कर एक ही शरीर से एक ही समय में सोलह हजार राजकुमारियों के साथ विवाह कर लिया है, तो वे अत्यंत उत्सुक होकर भगवान की गृहस्थ लीला देखने के लिए द्वारका आये । द्वारका में श्रीकृष्ण के अंत:पुर में सोलह हजार से भी अधिक बड़े सुंदर कलापूर्ण सुसज्जित महल थे । नारद जी एक महल में गए । वहां रुक्मिणी जी श्रीकृष्ण की चंवर से हवा कर रही थीं । नारद जी को देखते ही भगवान ने उठ कर उनके चरण पखारे, चरणामृत सिर पर चढ़ाया और उनकी ‘क्या सेवा की जाए’, पूछा । नारद जी ने कहा—‘भगवन् ! ऐसी कृपा कीजिए कि आपके चरणकमलों की स्मृति सदा बनी रहे ।’इसके बाद नारद जी एक-एक करके सभी रानियों के महल में गए । सभी जगह भगवान श्रीकृष्ण ने उनका स्वागत-सत्कार किया । नारद जी ने देखा—कहीं श्रीकृष्ण गृहस्थी के कार्य कर रहे हैं, कहीं वे अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को दुलार रहे हैं, कहीं स्नान करने की तैयारी कर रहे हैं, कहीं हवन कर रहे हैं, कहीं पंच-महायज्ञों से देवताओं का आराधन कर रहे हैं, कहीं ब्राह्मण-भोजन करा रहे हैं, कहीं यज्ञ के बाद अवशेष भोजन कर रहे हैं, कहीं संध्या तो कहीं मौन होकर गायत्री का जप कर रहे हैं, कहीं ब्राह्मणों को वस्त्र-आभूषन व गौएं दान कर रहे हैं, कहीं एकांत में बैठ कर प्रकृति से अतीत पुराण-पुरुष का ध्यान कर रहे हैं, कहीं शयन कर रहे हैं तो कहीं ढाल-तलवार लेकर उनको चलाने के पैंतरे बदल रहे हैं, कहीं उद्धव आदि के साथ गंभीर विचार-विमर्श कर रहे हैं, तो कहीं धन-संग्रह और धन-वृद्धि के कार्य में लगे हैं । कहीं गुरुजनों की सेवा-शुश्रुषा कर रहे हैं, तो कहीं देवताओं का पूजन, तो कहीं धर्म का संपादन कर रहे हैं । नारद जी ने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण किसी के साथ युद्ध की बातें कर रहें तो किसी के साथ संधि की । कहीं पुत्रों और कन्याओं का विवाह कर रहे हैं तो कहीं घर से कन्याओं को विदा कर रहे हैं, तो कहीं उन्हें बुलाने की तैयारी में लगे हैं । इस प्रकार श्रीकृष्ण सब जगह वर्णाश्रम-धर्म के अनुकूल कार्य करने व धर्म-साधन करने में लगे हैं ।मनुष्य की-सी लीला करते हुए योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया का वैभव देख कर नारद जी ने मुसकराते हुए कहा—‘योगेश्वर ! यद्यपि आपकी योगमाया ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े मायावियों के लिए भी अगम्य है; तथापि आपके चरणों की सेवा करने के कारण यह हमारे सामने प्रकट हो गई है ।’भगवान ने कहा—‘नारद ! मैं ही धर्म का उपदेशक, पालन करने वाला और उसका अनुष्ठान करने वाला हूँ । मेरे आचरण से लोगों को शिक्षा मिलेगी; इसलिए मैं स्वयं धर्म का आचरण करता हूँ । तुम मेरी माया से मोहित न होना ।’प्रभु की गृहस्थ लीला से शिक्षा!!!!!!!पूज्य श्रीरामचन्द्र डोंगरे जी महाराज ने भगवान की इस लीला के सम्बन्ध में लिखा है—संसार में कुल ८४ लाख योनियां हैं और उन सबमें श्रीकृष्ण की चेतना व्याप्त है । श्रीकृष्ण हर शरीर में घटित होने वाली हर बात को जानते हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने नारद जी को यह दिखा दिया कि इतना बड़ा परिवार होने पर भी वे सबको प्रसन्न रखते हैं । वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि घर के लोग दु:खी न हों और सब आनंद में रहें । इस लीला में श्रीकृष्ण ने गृहस्थ धर्म समझाया है । वे सभी रानियों से बाह्य रूप से समान प्रेम प्रकट करते हैं; किंतु अंदर से उनमें वैराग्य है । वे किसी भी रानी में आसक्त नहीं है । मनुष्य को भी घर के सभी लोगों को समान रूप से बाह्य प्रेम करना चाहिए; किंतु अंदर से प्रेम भगवान से ही होना चाहिए । भगवान ने इस लीला के द्वारा यही शिक्षा दी है कि पति-पत्नी शुद्ध भाव से प्रेम करें; किन्तु शरीर में आसक्त न हों; आत्मदृष्टि से प्रेम करें न कि देह दृष्टि से । गृहस्थाश्रम भक्ति में बाधक नहीं है बल्कि संसार-सागर से तारने वाला है ।भगवान श्रीकृष्ण ने जो लीलाएं की हैं, उन्हें दूसरा कोई नहीं कर सकता है । परमात्मा श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए दिव्य लीला शरीर धारण किया और उसके अनुरूप अनेकों अद्भुत चरित्रों का अभिनय किया । उनका एक-एक कर्म स्मरण करने वालों के कर्म-बंधनों को काट डालने वाला है । जिनको भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा का अधिकार चाहिए; उन्हें उनकी लीलाओं को अवश्य पढ़ना या सुनना चाहिए ।

देवर्षि नारद द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के गृहस्थ जीवन का दर्शन!!!!!!!•
भगवान की लीलाओं को पढ़ने-सुनने का अभिप्राय यह है कि उनकी भक्ति हमारे हृदय में आये । जैसे सुगंधित चीज को नाक से सूंघने पर, स्वादिष्ट चीज को जीभ से चखने पर और सुंदर चीज को आंखों से देखने पर उससे अपने-आप ही प्रेम हो जाता है; वैसे ही बार-बार भगवान की लीला कथाओं को पढ़ने-सुनने से भगवान से अपने-आप प्रेम हो जाता है । भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक दिव्य लीला के पीछे मानव के कल्याण की ही भावना निहित थी ।
श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के उनहत्तरवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण के गृहस्थ जीवन का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया गया है ।

श्रीकृष्ण के विवाह तो लोक में प्रसिद्ध हैं । ‘रुक्मिणी जी’ का उन्होंने हरण किया था । स्यमन्तकमणि की खोज में जाम्बवन्त से युद्ध करके उपहारस्वरूप वे ‘जाम्बवती जी’ को ले आए । ‘मणि’ के कारण कलंक लगाने के दोष से लज्जित सत्राजित ने अपनी पुत्री ‘सत्यभामा’ को स्वयं श्रीकृष्ण को प्रदान कर दिया । ‘कालिन्दी जी’ ने उनको तप करके पाया । ‘लक्ष्मणा जी’ के स्वयंवर का मत्स्यभेद करने में दूसरा और कोई समर्थ ही न हो सका । नग्नजित् राजा के सातों साँड़ एक साथ नाथ कर उनकी पुत्री ‘सत्या’ से श्रीकृष्ण ने विवाह किया । ‘मित्रविन्दा जी’ को उन्होंने स्वयं हरण किया । ‘भद्रा जी’ को स्वयं उनके पिता ने श्रीकृष्ण को प्रदान किया । यह तो श्रीकृष्ण की आठ पटरानियां हैं । इनके अलावा पृथ्वीदेवी के पुत्र भौमासुर (नरकासुर) ने सोलह हजार राजकन्याओं को बंदी बना रखा था, उनका भी उद्धार आवश्यक था । श्रीकृष्ण ने भौमासुर को मार कर उन राजकन्याओं को अपना कर उनका उद्धार-कार्य पूरा किया ।

गीता में कर्मयोग का उपदेश देने वाले श्रीकृष्ण स्वयं सबसे बड़े कर्मयोगी है । कर्मयोगी कर्म और कर्मफल के साथ सम्बन्ध न रख कर केवल दूसरों के हित के लिए सब कर्म करता है । गीता के अनुसार ‘जो कर्म सब लोगों के उद्धार के लिए, आसक्ति, स्वार्थ और कामना को त्याग कर किया जाता है, वह बांधता नहीं और यह ‘यज्ञ’ है । यही ‘कर्म संन्यास’ है । जैसे सरोवर में कमलपत्र जलराशि से सदैव ऊपर उठे हुए उससे निर्लिप्त व अछूते रहते हैं; वैसे ही श्रीकृष्ण सोलह हजार से अधिक स्त्रियों के स्वामी होकर भी भोगी नहीं वरन् त्यागी हैं, कर्म-संन्यासी हैं ।

श्रीकृष्ण एक रूप अनेक!!!!!!!

देवर्षि नारद ने जब सुना कि भगवान श्रीकृष्ण ने भौमासुर को मार कर एक ही शरीर से एक ही समय में सोलह हजार राजकुमारियों के साथ विवाह कर लिया है, तो वे अत्यंत उत्सुक होकर भगवान की गृहस्थ लीला देखने के लिए द्वारका आये । द्वारका में श्रीकृष्ण के अंत:पुर में सोलह हजार से भी अधिक बड़े सुंदर कलापूर्ण सुसज्जित महल थे । 

नारद जी एक महल में गए । वहां रुक्मिणी जी श्रीकृष्ण की चंवर से हवा कर रही थीं । नारद जी को देखते ही भगवान ने उठ कर उनके चरण पखारे, चरणामृत सिर पर चढ़ाया और उनकी ‘क्या सेवा की जाए’, पूछा । नारद जी ने कहा—‘भगवन् ! ऐसी कृपा कीजिए कि आपके चरणकमलों की स्मृति सदा बनी रहे ।’

इसके बाद नारद जी एक-एक करके सभी रानियों के महल में गए । सभी जगह भगवान श्रीकृष्ण ने उनका स्वागत-सत्कार किया । नारद जी ने देखा—कहीं श्रीकृष्ण गृहस्थी के कार्य कर रहे हैं, कहीं वे अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को दुलार रहे हैं, कहीं स्नान करने की तैयारी कर रहे हैं, कहीं हवन कर रहे हैं, कहीं पंच-महायज्ञों से देवताओं का आराधन कर रहे हैं, कहीं ब्राह्मण-भोजन करा रहे हैं, कहीं यज्ञ के बाद अवशेष भोजन कर रहे हैं, कहीं संध्या तो कहीं मौन होकर गायत्री का जप कर रहे हैं, कहीं ब्राह्मणों को वस्त्र-आभूषन व गौएं दान कर रहे हैं, कहीं एकांत में बैठ कर प्रकृति से अतीत पुराण-पुरुष का ध्यान कर रहे हैं, कहीं शयन कर रहे हैं तो कहीं ढाल-तलवार लेकर उनको चलाने के पैंतरे बदल रहे हैं, कहीं उद्धव आदि के साथ गंभीर विचार-विमर्श कर रहे हैं, तो कहीं धन-संग्रह और धन-वृद्धि के कार्य में लगे हैं । कहीं गुरुजनों की सेवा-शुश्रुषा कर रहे हैं, तो कहीं देवताओं का पूजन, तो कहीं धर्म का संपादन कर रहे हैं । 

नारद जी ने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण किसी के साथ युद्ध की बातें कर रहें तो किसी के साथ संधि की । कहीं पुत्रों और कन्याओं का विवाह कर रहे हैं तो कहीं घर से कन्याओं को विदा कर रहे हैं, तो कहीं उन्हें बुलाने की तैयारी में लगे हैं । इस प्रकार श्रीकृष्ण सब जगह वर्णाश्रम-धर्म के अनुकूल कार्य करने व धर्म-साधन करने में लगे हैं ।

मनुष्य की-सी लीला करते हुए योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया का वैभव देख कर नारद जी ने मुसकराते हुए कहा—‘योगेश्वर ! यद्यपि आपकी योगमाया ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े मायावियों के लिए भी अगम्य है; तथापि आपके चरणों की सेवा करने के कारण यह हमारे सामने प्रकट हो गई है ।’

भगवान ने कहा—‘नारद ! मैं ही धर्म का उपदेशक, पालन करने वाला और उसका अनुष्ठान करने वाला हूँ । मेरे आचरण से लोगों को शिक्षा मिलेगी; इसलिए मैं स्वयं धर्म का आचरण करता हूँ । तुम मेरी माया से मोहित न होना ।’

प्रभु की गृहस्थ लीला से शिक्षा!!!!!!!

पूज्य श्रीरामचन्द्र डोंगरे जी महाराज ने भगवान की इस लीला के सम्बन्ध में लिखा है—संसार में कुल ८४ लाख योनियां हैं और उन सबमें श्रीकृष्ण की चेतना व्याप्त है । श्रीकृष्ण हर शरीर में घटित होने वाली हर बात को जानते हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने नारद जी को यह दिखा दिया कि इतना बड़ा परिवार होने पर भी वे सबको प्रसन्न रखते हैं । वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि घर के लोग दु:खी न हों और सब आनंद में रहें । 

इस लीला में श्रीकृष्ण ने गृहस्थ धर्म समझाया है । वे सभी रानियों से बाह्य रूप से समान प्रेम प्रकट करते हैं; किंतु अंदर से उनमें वैराग्य है । वे किसी भी रानी में आसक्त नहीं है । मनुष्य को भी घर के सभी लोगों को समान रूप से बाह्य प्रेम करना चाहिए; किंतु अंदर से प्रेम भगवान से ही होना चाहिए । भगवान ने इस लीला के द्वारा यही शिक्षा दी है कि पति-पत्नी शुद्ध भाव से प्रेम करें; किन्तु शरीर में आसक्त न हों; आत्मदृष्टि से प्रेम करें न कि देह दृष्टि से । गृहस्थाश्रम भक्ति में बाधक नहीं है बल्कि संसार-सागर से तारने वाला है ।

भगवान श्रीकृष्ण ने जो लीलाएं की हैं, उन्हें दूसरा कोई नहीं कर सकता है । परमात्मा श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए दिव्य लीला शरीर धारण किया और उसके अनुरूप अनेकों अद्भुत चरित्रों का अभिनय किया । उनका एक-एक कर्म स्मरण करने वालों के कर्म-बंधनों को काट डालने वाला है । जिनको भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा का अधिकार चाहिए; उन्हें उनकी लीलाओं को अवश्य पढ़ना या सुनना चाहिए ।

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*विधि का विधान*भगवान श्री राम जी का विवाह और राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त देख कर ही किया गया था, फिर भी ना वैवाहिक जीवन सफल हुआ और ना ही राज्याभिषेक।और मुनि वशिष्ठ जी ने तो साफ कह दिया-*सुनहु भरत भावी प्रबल**बिलखि कहेहूं मुनिनाथ**हानि लाभ जीवन-मरण**यश-अपयश विधि हाथ*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।*ना भगवान श्री राम जी के जीवन को बदला जा सका और ना ही भगवान श्री कृष्ण जी के। ना ही भगवान शिव, सती की मृत्यु को टाल सके,* जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आह्वान करता है।*ना श्री #गुरु #अर्जुन देव जी, ना श्री गुरु तेग बहादुर जी और ना ही दशमेश पिता श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे।*#रामकृष्ण परमहंस जी भी अपने #कैंसर को ना टाल सके।ना रावण अपने जीवन को बदल पाया और ना ही #कंस, जबकि दोनों के पास समस्त #शक्तियां थीं।#वनिता #कासनियां #पंजाब द्वारा*मानव अपने जन्म के साथ ही #जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश और स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है।**इसलिए सरल रहें, सहज रहें, मन कर्म और वचन से सद्कर्म में लीन रहें।*

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राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By वनिता कासनियां पंजाब श्रीगणेश के अवतारहम सबने भगवान विष्णु के दशावतार और भगवान शंकर के १९ अवतारों के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे "अष्टरूप" कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं।वक्रतुंड: मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड वाले "वक्रतुंड" अवतार लिया और 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का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

राम राम जी

जब श्रीराम विभीषण से मिलने दोबारा लंका गए, तब उन्होंने रामसेतु का एक हिस्सा स्वयं ही क्यों तोड़ दिया था? By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब//          🌹🌹🙏🙏🌹🌹 वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम ने राम सेतु का निर्माण रावण के वध हेतु लंका जाने के लिए करवाया था। समुद्र पर बने इस पुल का निर्माण वानरों, रीछ और नल नील भाइयों की निगरानी में हुआ था। नल नील विश्वकर्मा के पुत्र थे और उस समय के महान वास्तुविद माने जाते थे। बहुत से लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि रामसेतु को भगवान श्री राम ने स्वयं तोड़ा था। पद्म पुराण के सृष्टि खंड में इसकी कथा विस्तारपूर्वक मिलती है। पदम पुराण के मुताबिक जब श्री राम रावण का वध करके लक्ष्मण और सीता के साथ अयोध्या लौट आए थे और उनका राज्याभिषेक हो गया था, तब एक दिन उनके मन में विभीषण से मिलने का विचार आया। उन्होंने सोचा कि रावण की मृत्यु के बाद विभीषण किस तरह लंका का शासन कर रहे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं! ऐसा विचार मन में आने के बाद जब श्री राम लंका जाने की सोच रहे थे, उसी समय वहां भरत भी आ गए। भरत के पूछने पर श्री राम ने उन्हे...